शुक्रवार, अक्तूबर 10, 2008

दादा का सन्यास

बन्द हुए सब रास्ते, डिगा आत्मविश्वास ।
कन्दुक क्रीड़ा से हुआ, दादा का सन्यास ।
दादा का सन्यास, बडी घटना क्रिकेट की ।
मज़ेदार थी कथा, गेंद बल्ले विकेट की ।
विवेक सिंह यों कहें निराश न हों महाराजा ।
कभी न कभी तो बजता है सबका ही बाजा ॥

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! वाह!
    बहुत खूब. कंदुक क्रीड़ा पढ़कर खूब हँसी आई 'शिष्य'....:-)

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  2. Vivekji, Kaka hathrasi ki yaad diladi. Laga vivek hathrasi ke hath (Kalam) ka ras koi kam nahi. wah saheb, maza aagaya.

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  3. वाह विवेक जी
    त्वरित काव्य टिप्पणी पढ़ कर मजा आया

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  4. बहुत खूब. बाजा तो सब का बजना है एक न एक दिन, पर राजनीति के दादाओं का बाजा

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