बुधवार, जनवरी 07, 2009

कौए से भेदभाव

बच्चे को होश सँभालते ही बता दिया जाता है कि कौआ बुरा होता है क्योंकि यह काँव काँव करता है . और कोयल अच्छी है क्योंकि यह कुहू कुहू की मीठी आवाज सुनाती है . पर अगर इतने पर भी हमें कौए से नफरत न हो तो इसमें हमारी क्या गलती ? हमें तो उसकी काँव काँव कोयल की कुहू कुहू से मधुर लगती है . यह कोई जरूरी तो नहीं कि जो सबको अच्छा लगे वही हमें भी अच्छा लगे .
कौआ बेचारा कितना परिश्रम करता है ! इसकी प्रतिभा को हमारे ऋषि मुनियों ने बहुत पहले ही पहचान लिया था . इसीलिए तो लिख गए -
काक चेष्टा, वको ध्यानं, श्वान निद्रा तथैव च .
अल्पाहारी, गृह त्यागी विद्यार्थी पंच लक्षणम् ..

मगर हम ऋषियों की वाणी को भूलकर कौए के सद्गुणों को पहचान न सके . हमने उसे आलसी समझकर 'कौए और गिलहरी' की मनगढंत कहानी रच ली . कौए ने हालाँकि पानी में कंकड डालकर पानी पिया और अपनी चतुराई को सिद्ध करने का भरसक प्रयास किया . लेकिन हमें उसमें भी उसकी कोई चाल दिखाई दी . और हमने कौए के साथ भेदभाव जारी रखा .

उधर कोयल को मुफ्त में सम्मान की गठरियाँ सप्लाई किए जारहे हैं क्योंकि वह तथाकथित मीठा बोलती है . मान लिया बोलती होगी मीठा . पर आजकल मीठा बोलने से कोई काम होता है क्या ?

किसी ऑफिस में चले जाइए . क्लर्क से कोई काम कराना हो तो मीठी आवाज में कहिए ," सर ! प्लीज मेरी फाइल आगे बढा दें " खडे खडे रिश्वत की डिमाण्ड कर बैठेगा . और अगर आपने जाते ही उसको हडका दिया तो हो सकता है घुडकी में आकर आपको दादा समझ ले और आपका काम हो जाय . इसीलिए तो फोन पर लोग यूँ ही दूसरों को हडकाते देखे जाते हैं . कोई अपने को विधायक बताकर थानेदार को हडका देता है , कोई मुख्यमंत्री बनकर सचिव को हडका देता है और कोई प्रणव मुखर्जी बनकर जरदारी को हडका देता है . मीठी आवाज का मार्केट अब लगातार निचले स्तरों को छूरहा है . इसको जितनी जल्दी मान लिया जाय उतना अच्छा रहेगा .

हमने सभी जानवरों और पक्षियों को उनकी जीवन संगिनियों के साथ माना , जैसे मोर के साथ मोरनी तथा गधे के साथ गधी , पर बेचारे कौए को यहाँ भी भेदभाव का शिकार होना पडा . कौए की कौवी को अब तक मान्यता नहीं दी गई . इस मामले में महिला आयोग भी कुछ नहीं कहता .

हम कौए को शातिर बताते हैं पर उससे ज्यादा शातिर तो हम खुद हैं . वैसे तो साल भर उसे बुरा बुरा कहते रहेंगे . लेकिन श्राद्धपक्ष में स्वर्गीय पूर्वजों को भोजन भेजना हो तो कौए को ही बुलाएंगे . अब बताइए कौन मौकापरस्त हुआ ?

अक्सर एक तुकबंदी भी सुनने में आती है :

रामचन्द्र कह गए सिया से कलयुग ऐसा आयेगा

हंस चुगेगा दाना तिनका कौआ मोती खाएगा

पहली बात तो हमें कोई यह बताए कि रामचन्द्र ने ऐसा कहा था इसका प्रमाण क्या है ? और अगर कोई प्रमाण है भी तो इस बात का क्या सुबूत है कि यह प्रमाण निराधार नहीं है ? हमने रामकथा कई बार सुनी है . उसमें कहीं नहीं कहा गया कि रामचन्द्र सीता जी को छोडकर कहीं चले गए थे . हाँ, इतनी गुंजाइश अवश्य है कि सब्जी वगैरह लेने चले जाते हों , पर उसके लिए लक्ष्मण जी थे .

चलो उन्होंने ऐसा कह भी दिया होगा तो उनकी बात कौन सुन रहा था वहाँ . उस जमाने में आजकल की भाँति टीवी चैनल तो थे नहीं जो उन्होंने संवाददाता सम्मेलन बुलाकर यह बात कही हो . जाहिर है संवाददाता सम्मेलन बुलाते तो संवाददाताओं से कहते सीता जी से क्यों कहते ? और सीता जी से ही कहना था तो संवाददाता सम्मेलन क्यों बुलाया ?

इन सब अकाट्य तर्कों के बावजूद यदि हम यह मान भी लें कि यह बात रामचन्द्र जी ने सीता जी से कही होगी तो इसमें बुरा क्या है ? क्या हंस को मोती खाने का सर्टिफिकेट मिला हुआ है कि भाई तू मोती ही खाएगा . अगर वह मेहनत न करे तो आज के समय में उसे दाना तिनका भी न मिलेगा . और मिलना भी नहीं चाहिए .

कौआ अगर अपनी मेहनत से मोती कमाकर खाता है तो कौन सा पहाड टूट पडेगा ? उसे क्या सिर्फ इसलिए मोती नहीं खाना चाहिए कि वह कौआ है ? बताइए कौए के कौआ होने में कौए की क्या गलती है ?

अगर कोई इस आधार पर कलयुग को बुरा समझे तो हम उससे यही कहेंगे कि अभी कलयुग आया ही नहीं . क्योंकि हमने अभी तक कौए को मोती खाते हुए नहीं देखा है . और हंस को तो देखा ही नहीं . कौआ बेचारा पेट की खातिर दर दर भटक रहा है . मेहनत के बावजूद उसे मोती नहीं मिल रहे . हंस बिना मेहनत के ही मोती उडा रहा है . जल्दी से कलयुग आ जाए तो कौए को भी मोती मिलें . और हमें शांति !

21 टिप्‍पणियां:

  1. विवेक रचित कौवा पुराण ने कौवों का दिल जीत लिया होगा . जैसे कुत्ते और गधे मेनका गाँधी का सम्मान करते है वैसे ही कौवों को अपना रहनुमा मिल गया है विवेक के रूप मे .
    वैसे यह मजाक है बहुत अच्छा लेख काक चेष्ठा तो होनी ही चाहिए कुछ भी लक्ष्य प्राप्त करने के लिए

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  2. आपने सही बात कह दी। बेचारे कौवों की कोई सुध ही नहीं लेता। जरा ऐसा ही कुछ लोमड़ियों के बारे में भी लिख मारिए वे बेचारी भी जमाने की बुरी नजर की शिकार हैं। मेरा ब्लाग- http://babloobachpan.blogspot.com/

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  3. बिल्कुल सही लिखा है आपने लक्ष्य प्राप्त करना है तो काक चेष्ठा तो होनी ही चाहिए ! इतनी अच्छी शिक्षा दे रहा है बेचारा कौवा फ़िर भी उसके साथ भेदभाव !

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  4. काकभुसुण्डि जी सम्माननीय चरित्र हैं, मानस के - उन्हें प्रणाम।
    हां जयन्त भी है रामायण में जो अपनी कुटिलता के कारण आंख गंवाता है। दोनो ही विपरीत ध्रुव के काक चरित के।

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  5. bade hi sateek dhang se kawwe ka dard saamne rakha hai..

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  6. अब और कौन सा कलयुग आना बाकी है ? चारों तरफ़ कौए ही कौए मोती चुग रहे हैं । ज़रा नज़र घुमाकर तो देखिए । आपके यहां का पता नहीं हमारे मध्य प्रदेश में तो कौओं की खूब बन आई है । काले कौए सफ़ेद वस्त्रों में प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण इमारत में विराज चुके हैं ।

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  7. बिलकुल ही जनवादी स्वर की रचना लिख गये आप.
    सर्वहारा की बात कह दी. धन्यवाद.

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  8. बहुत सटिक कौवा पुराण है. वैसे शायद कलियुग की शुरुआत हो चली है, आजकल कौवों की भी चांदी होने लगी है कभी कभी.

    रामराम.

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  9. accha laga padh kar aapka kauwa puraan...sateek visleshan hai..

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  10. अरे नहीं विवेक भाई..........अपन वैसे नहीं हैं...........सच तो यह है......कि अपन भी कौवे की तरह कर्कश हैं.....कांव-कांव करते करते रहते हैं.....जीवन में भी....और ब्लॉग में भी....मगर आपने जनाब कौवे की याद दिला कर अच्छा किया....लोगों को हकीकत में लौटा दिया....!!

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  11. कौवो को भी सड़कों पर आना होगा.. नारे लगाने होगें.."नहीं चलेगी, नहीं ्चलेगी......" वगैरह.. ..

    बहुत अच्छा व्यंग्य लिखा..मजा आ गया..

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  12. जैसे जैसे काग विवेक से काम लेते जा रहे हैं, उनके कार्कष्य में भी मिठास घुलने लगी है. विवेक भाई, आप वाक़ई एक सधे हुए व्यंगकार बन चले. इस शुभ-पथ पर शुभकामनाओं और बधाई सहित.

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  13. विवेक जी नमस्कार,
    क्या बात है आज आपने शायरी छोड़ कर "काक पुराण" लिख डाला. चलिए जी हम भी ट्राई मारते हैं कोई पुराण लिखने की.
    चलो, काकी (कौवी) पुराण लिखेंगे.

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  14. कलियुग तो आ के चला भी गया शायद. काक-वार्ता अच्छी लगी!

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  15. काकभुसुण्डि जी तो अपने भी फ़ेवरेट है..

    कौओ क़ी व्यथा लिखकर आपने हमारी आँखो में आँसू ला दिए.. मन कर रहा है क़ी पंख लगाकर आसमान में उड़ जाऊ और जाकर कौवी क़ी पप्पी ले लू...

    और मस्त गगन में कौवा बनकर कांव कांव करता रहू...

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  16. कौन कहता है कि कौवे का "विवेक" नही होता है ?

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  17. विवेक जी, मेरे विचार से आपकी चेष्टा अवश्य रंग लाएगी. केवल आप ही हैं जो कि इस बेचारे काग का खोया सम्मान उसे वापिस लौटा सकते हैं.इस विषय में शास्त्रों मे वर्णित एक श्लोक मुझे याद आ रहा है कि
    सन्त एव सतां नित्यमापदुद्धरणक्षमा:।
    गजानां पड्कमग्नानां गजा एव धुरंधरा:।।
    अर्थात जिस प्रकार कीचड में फंसे हाथी को एक हाथी हि निकालने में समर्थ होता है, उसी प्रकार किसी सज्जन के खोए सम्मान को कोई सज्जन ही वापिस ला सकता है.
    अत: लगे रहिए, हम सब आपके साथ है.इसके लिए अगर कहीं अनशन/धरना-प्रदर्शन इत्यादी भी करना पडे तो अवश्य याद कीजिएगा.

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  18. कौवी वाली बात सही है। लेख शानदार है। कुश कौवी की पप्पी लेकर आये कि नहीं अभी तक!

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  19. ohh is topic par to maine ek lambi si kavita likh rakhi hai, ab jaldi hi post karungi

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  20. आपने मेरे ब्लाग पर नजर डाली, धन्यवाद. वैसे हिन्दी में आपकी तरह शानदार लिखने वालों और इतनी वेराइटी देख कर फीलगुड का मन कर रहा है. आगे भी बात होगी, मुलाकात होगी.

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