शनिवार, जून 27, 2009

मेरे हाथों मर जाओगे


मेरी तुमसे न थी शत्रुता, फ़िर भी तुमने वार किया ।
मेरे ही घर आकर तुमने, मुझ पर अत्याचार किया ॥

मैं सोया तुमने शोर किया, मैंने समझा उसको लोरी ।
मैं करता रहा क्षमा तुमको, तुम समझे मेरी कमजोरी ॥

मैं चला अहिंसा के पथ पर, इसलिए न तुमको कष्ट दिया ।
पर तुमने उकसा उकसाकर, आखिर मुझको पथभ्रष्ट किया ॥

तुम रक्त-पिपासा के कारण ही, फ़िदायीन बन पाते हो ।
पर जैविक हमले करके तो, सब हदें पार कर जाते हो ॥

मैंने माना तुम क्षुद्र जीव, तुम तीसमारखाँ बनते हो ।
जितना अनदेखा करता हूँ, तुम और ऐंठकर तनते हो ॥

मुझमें कितनी है शक्ति, तुम्हें शायद इसका अहसास नहीं ।
यदि फ़ूँकूँ तो उड़ जाओगे, छू दूँ तो लोगे साँस नहीं ॥

सारा घर तुमको सौंप दिया, यह जगह चुनी अनजानी सी ।
तुम किन्तु यहां भी आ पहुँचे, यह बात लगी बेमानी सी ॥

मच्छर ! तुम बच न सकोगे अब, मेरे हाथों मर जाओगे ।
पर देकर अपनी जान हाय, हिंसक मुझको कर जाओगे ॥

सूचना : हर्ष का विषय है कि श्री समीर लाल जी 'उडनतश्तरी' वाले स्वप्नलोक पर टिप्पणियों का अर्धशतक ठोकने में कामयाब रहे हैं । उन्हें कम्पनी की ओर से बहुत बहुत बधाइयाँ !

32 टिप्‍पणियां:

  1. मेरी तुमसे न थी शत्रुता, फ़िर भी तुमने वार किया ....
    सब के सब लाइनें उम्दा हैं .

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  2. वाह वाह मच्छर की जगह "घरवाली" कर दें तो कविता में ओर ज्यादा जान आ जायेगी।

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  3. किसको संबोधित है यह क्या केवल क्षुद्र मच्छर को ?

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  4. मजा आ गया.. एसे मच्छर चालिसा लिखा जा सकता है..

    समीर जी को कम्पनी के शुभचिंतकों की और से भी शुभकामनाऐं..

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  5. आज कल मच्छर विरोधी सेना ओडोनिल लगा कर सोई हुई है।

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  6. मच्छर की जगह………ये दूसरे वाले विवेक भैया क्या कह रहे हैं?अपन तो खैर इस मामले मे बोलने की मिनिमम क्वालिफ़िकेशन रखते ही नही हैं इसलिये चुप ही रहेंगे।समीर भाई को और आपको हमारी भी बधाई।

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  7. विवेक जी अब इन्हें क्षमा करने का समय नहीं रहा.

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  8. मेरी तुमसे न थी शात्रुता, फिर भी....


    सही है...५० पूरे हुए और अब पुण्य शुभ अंक ५१ अर्पित है.

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  9. बिचारा मच्छर ha ha ha ha ..

    regards

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  10. लगता है आपके नाम राशिः अग्रवाल साहब घरवाली से काफी त्रस्त हैं , इन्हें उन कवि से संपर्क करना हो ' घरवाली को केंद्र बना कर सारी कविताएँ करते हैं |

    वैसे मजा आ गया और देवानंद वाली सी आई डी याद आगई ' कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना ' इंस्पेक्टर अब तक ५६ ने सही कहा है ' एक मच्छर आदमीं को हि ..........ही ही ही ,बनादेता है '

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  11. विवेक जी,
    अब तो आप जबरदस्त वापसी कर रहे हो.

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  12. बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति, बधाई ।

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  13. वाह! वाह! वाह!

    बहुत बेहतरीन भाई. कई बार लगा कि 'इंसानों' के लिए लिखा है. वो तो बाद में पता चला कि मच्छर के लिए लिखी है यह कविता. लेकिन जो भी है, शानदार है. वापसी पर कवि बहुत घातक सिद्ध हो रहा है. मच्छरों के लिए....:-)

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  14. हमारी २१ वी प्रतिक्रिया ले लो...दो खाली अनुराग के नाम से भी है ....

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  15. अभी तो गर्मी बहुत है, ये फिदायीन जी हमारे घर आये नहीं हैं।

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  16. बहुत जबरदस्त लिखा भाई.

    रामराम.

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  17. वाह विवेक जी............ क्या बात कही है.......... वाकई इन मछरों को अब मसल देना चाहिए

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  18. विवेक भाई आपने बडे ही गहरे खींचा है। समीर भाई की तो सेन्चुरियां लगती ही रहती हैं

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  19. अब मच्छर मार दवाई के लिये इस कविता भस्म काम करेगी! समीरलालजी को पचासा पूरा करने के लिये बधाई!

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  20. वाकई कभी कभी कुछ ऐसा किया जाय कि ये मच्छ्रर मसले जा सके .....खुबसूरत अभिव्यकति

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  21. "सारा घर तुमको सौंप दिया, यह जगह चुनी अनजानी सी ।
    तुम किन्तु यहां भी आ पहुँचे, यह बात लगी बेमानी सी ॥ "

    कितना कुछ कह गये न आप !

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  22. वाह जी वाह, दर्द है कि‍ दहला देता है:)

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  23. पहले तो मै समझा यह डवलपुरियों का चक्कर होगा लेकिन मच्छर का मामला निकला

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  24. :-) क्या खूब लिखा है विवेक भाई


    --
    - लावण्या

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  25. संकेतों ही संकेतों में कह गए गहरी बात
    कछु करने तैयार खड़े करने तुम पर घात
    करने तुम पर घात सोचते सृजन रुकेगा
    स्वपन दर्शी का सपन में भी ह्रदय दुखेगा
    मित्र तुम्हारे साथ है कविता-शक्ति अपार
    फिर भी करना नहीं कभी पहला वार !
    कभी न पहला वार कुंठाएँ मिट जाएँगी
    चालबाजों की चाल पल में पिट जाएँगी

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  26. वाह जी...

    ठीक ही कहते हैं... 'जहाँ न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि'

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  27. अर्धशतक बाद भी यही कहते हैं-
    मेरी तुमसे न थी शत्रुता, फ़िर भी तुमने वार किया ।
    मेरे ही घर आकर तुमने, मुझ पर अत्याचार किया ॥
    वाह! भई वाह!!

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  28. मच्छर राजा जरा थम के...ठहरो
    विवेक जी सो न पाए जम के घहरो....
    हा हा हा हा

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