मेरी तुमसे न थी शत्रुता, फ़िर भी तुमने वार किया ।
मेरे ही घर आकर तुमने, मुझ पर अत्याचार किया ॥
मैं सोया तुमने शोर किया, मैंने समझा उसको लोरी ।
मैं करता रहा क्षमा तुमको, तुम समझे मेरी कमजोरी ॥
मैं चला अहिंसा के पथ पर, इसलिए न तुमको कष्ट दिया ।
पर तुमने उकसा उकसाकर, आखिर मुझको पथभ्रष्ट किया ॥
तुम रक्त-पिपासा के कारण ही, फ़िदायीन बन पाते हो ।
पर जैविक हमले करके तो, सब हदें पार कर जाते हो ॥
मैंने माना तुम क्षुद्र जीव, तुम तीसमारखाँ बनते हो ।
जितना अनदेखा करता हूँ, तुम और ऐंठकर तनते हो ॥
मुझमें कितनी है शक्ति, तुम्हें शायद इसका अहसास नहीं ।
यदि फ़ूँकूँ तो उड़ जाओगे, छू दूँ तो लोगे साँस नहीं ॥
सारा घर तुमको सौंप दिया, यह जगह चुनी अनजानी सी ।
तुम किन्तु यहां भी आ पहुँचे, यह बात लगी बेमानी सी ॥
मच्छर ! तुम बच न सकोगे अब, मेरे हाथों मर जाओगे ।
पर देकर अपनी जान हाय, हिंसक मुझको कर जाओगे ॥
सूचना : हर्ष का विषय है कि श्री समीर लाल जी 'उडनतश्तरी' वाले स्वप्नलोक पर टिप्पणियों का अर्धशतक ठोकने में कामयाब रहे हैं । उन्हें कम्पनी की ओर से बहुत बहुत बधाइयाँ !