शनिवार, मार्च 06, 2010

ब्लॉग-शहर में गंगाराम

जब गंगाराम पटेल ने बुलाकी नाई के सवाल का संतोषजनक जवाब दे दिया तो बुलाकी नाई के पास उनके साथ ठहरने के सिवाय और कोई चारा न बचा । अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही गंगाराम पटेल और बुलाकी नाई अपनी मंजिल की ओर रवाना हो गये । दिन भर चलते रहने के बाद जब शाम हो गई तो उन्होंने एक शहर के पास पड़ाव डाल दिया ।
आज बुलाकी जल्दी जल्दी शहर गया और सब सामान लेकर लौट ही रहा था कि शहर के बाहर एक मैदान से कुछ शोर सुनाई दिया । उसने जिज्ञासावश उधर जाकर देखा तो देखता ही रह गया । एक ओर मर्द थे और दूसरी ओर औरतें थीं । दोनों ओर से दे दनादन पत्थर एक दूसरे पर फ़ेंके जा रहे थे ।
बुलाकी जल्दी जल्दी पड़ाव की ओर चल दिया । उसे ऐसा सवाल मिल गया था जिसका जवाब देना गंगाराम पटेल के लिए उसके विचार से असंभव था । घर लौटने की कल्पना करके ही उसकी बाँछें खिल रहीं थीं ।
पड़ाव पर पहुँचकर सब काम निपटाया और सवाल दागने का वक्त आ ही गया । बुलाकी ने शहर का सब हाल कह सुनाया और उसका रहस्य पूछा ।
गंगाराम पटेल बोले, " यह शहर कोई साधारण शहर नहीं है । इसे ब्लॉग-शहर के नाम से जाना जाता है । जब इस शहर की स्थापना हुई थी तो यहाँ भी नर-नारी आपस में बड़े प्रेम से ब्लॉगिंग करते हुए टाइम पास करते थे । उनको भ्रम था कि वे हिन्दी की सेवा कर रहे हैं किन्तु असल में वे सब टाइम-पास करते थे ।
जैसा कि शास्त्रों में लिखा है 'एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है' । इस शहर में कुछ स्वयंभू नेताओं का प्रवेश हो गया । इनमें कुछ नारियाँ थीं जिन्हें स्वयं के सम्पूर्ण नारी जाति का प्रतिनिधि होने का गुमान हो गया था । ऐसे ही कुछ पुरुष भी अपने को संस्कृति का ठेकेदार समझने लगे थे । धीरे-धीरे ये सब अपने आस-पास के ब्लॉगरों में नर-नारी के बीच नफ़रत फैलाने लगे । और आज हालत यह है कि यहाँ नर-नारी गुटों के अलावा कोई तीसरा गुट ही नहीं है ।
यहाँ अब न उच्च जाति और निम्न जाति का भेद है और न हिन्दू और मुसलमान का । सब भेदभाव खत्म हो गया । भेद है तो केवल नारी और पुरुष का जो एक दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते । अगर तुमने गौर किया हो तो देखा होगा कि इस शहर में कोई बच्चा नहीं है ।
अब बुलाकी तुम्हीं कहो कि यह अच्छा हुआ या बुरा ?"
बुलाकी कुछ न बोल पाया उसे घर न जा सकने का दु:ख था ।

12 टिप्‍पणियां:

  1. भाई यह भेद तो बनाये ही रखिये चाहे ब्लोगनगरी हो या ---

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  2. बड़ी पुरानी मगर सामयिक चीज लेकर आये.

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  3. कथा के माध्यम से बहुत कुछ कह गए !
    अपनी बात कहने का यह तरीका बेहद अच्छा लगा !
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    आभार

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  4. गंगा राम की समझ मै ना आये, बस गंगा राम से बोलॊ इस टेली फ़ोन वाली का फ़ोन इस के सर पर मारे, ताकि यह दुसरो का घर तो बसने दे, अपना तो नही बसा पाई..... जो फ़ोन कर के दुसरो को भडकाती है, ओर इस के चमचे भी खुब है जो आग मे घी का काम करते है

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  5. गज़ब लिखे हैं भाई साहब। सबसे मजेदार तो यह है कि इस नगरी में कोई बच्चा नहीं है। तो क्या अब हम अपने को बड़ा मान लें?

    अजी सुनती हो... कमाल हो गया... अब हम बड़े हो गये हैं।

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  6. आपने सही कहा है.ब्लॉगिंग में आजकल लोग कमेन्ट के जरिये कुत्ते-बिल्ली की तरह झगड रहे हैं.

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  7. अब बुलाकी बोले भी तो क्या बोले ?

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  8. आज पढ़े हैं, सो आज ही लिख रहे हैं.. एक सवाल मन में आया है.. फिर अगले दिन क्या हुआ?

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