बुधवार, अगस्त 19, 2009

ठेला-ठेली में समाज का आईना

ब्लॉग-जगत को लोग अक्सर आभासी विश्व की संज्ञा देते हैं । पर इस आभासी विश्व में वास्तविक विश्व के कमोवेश सभी तत्व मौजूद हैं । आइये देखते हैं कैसा है हमारा आभासी विश्व !

ब्लॉग-जगत में जब किसी नये चिट्ठाकार का आगमन होता है तो कुछ लोग जो बधाई गाने के लिए पहले से ही तैयार बैठे रहते हैं जाकर बधाई गा आते हैं . जैसे बच्चा पैदा होते ही दूसरी दुनिया के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाता और अपनी ही धुन में रोता रहता है, वैसे ही नया ब्लॉगर ब्लॉग-जगत की रैरै-खैंखैं से अनजान अपनी ही धुन में मस्त पोस्ट लिख-लिखकर ठेलता रहता है . लेकिन उड़न तश्तरी की पहली टिप्पणी मिलते ही उसके टिप्पणी के मायाजाल में उलझने की शुरूआत हो जाती है . और इस मायाजाल में एकबार फँसने के बाद कुछ भाग्यशाली ब्लॉगर ही इससे बाहर निकलने में कामयाब हो पाते हैं, जिन पर ईश्वर की असीम कृपा होती है .

जैसे सभी मनुष्यों का स्वभाव अलग-अलग होता है वैसे ही सभी ब्लॉगरों का स्वभाव भी एक जैसा नहीं होता . कुछ सुस्त टाइप के ब्लॉगर कुम्भकर्ण की भाँति सोते रहते हैं . कभी-कभार जागते हैं तो एक ठो पोस्ट ठेलकर फिर से सो जाते हैं . ऐसे आलसी ब्लॉगरजन एक पोस्ट ठेलने से ही बुरी तरह ठिलावट के शिकार हो जाते हैं . इनके परिचित लोग जब इनसे सुस्ती का कारण पूछते हैं तो इनका जवाब होता है," भाई, पिछले हफ्ते जनता की भारी डिमाण्ड पर एक पोस्ट ठेलनी पड़ गयी . अब तक अंग-अंग दुख रहा है . "

कुछ ब्लॉगर गाँव के उस बिगड़ैल बच्चे के समान होते हैं जो खेल में कभी पूरे मन से शामिल नहीं होता है, वह खेलते हुए भी किसी अवसर की ताक में रहता है . जैसे ही अवसर हाथ लगता है वह खेल का कोई सामान लेकर या किसी साथी को घूँसा मारकर भाग जाता है . ऐसे ब्लॉगरों की पोस्ट आती है और किसी न किसी साथी ब्लॉगर की शान्ति भंग कर जाती है . बाद में खूब लकीर पीटी जाती है , हाय तौबा मचती है लेकिन इनका कहीं अता-पता नहीं होता . भूमिगत हो चुके होते हैं .

कुछ संजीदा टाइप ब्लॉगर जिनके कंधों पर ब्लॉग-जगत की सारी चिंताओं का भार रखा रहता है, हमेशा गंभीर मुद्रा का लबादा ओढ़े रहते हैं . अगर इनको कहीं हँसी-मजाक होता दिख जाए तो ये फौरन हा हा-ठी ठी का झूठा केस बना देते हैं . हँसने मुस्कराने वाले लोगों से इन्हें सख्त नफरत होती है . ऐसे लोगों को देखते ही इनके तन-बदन में वैसे ही आग लग जाती है जैसे राम जी के हाथों शिव जी का धनुष टूट जाने पर मुनि परशुराम के शरीर में लग गई थी .

कुछ ब्लॉगर दुकानदार टाइप होते हैं . ये किसी को भी नाराज किये बिना जैसे-तैसे अपनी दुकान चलाने में विश्वास रखते हैं . इनके चेहरे पर ऊपरी तौर पर तो हमेशा हल्की हल्की बनावटी मुस्कराहट खेलती रहती है . लेकिन मन में हमेशा चिन्ता लगी रहती है कि कहीं ऐसा न हो कि कोई भाई टाइप ब्लॉगर आकर दुकान पर बखेड़ा खड़ा कर दे . इनका यह भय सर्वथा निर्मूल नहीं होता . ब्लॉग-जगत में ऐसे भाई ब्लॉगर भी मौजूद हैं जिनका काम मौज लेने के नाम पर ऐसे दुकानदार टाइप ब्लॉगरों को दौड़ाने का होता है . यदि भाई ब्लॉगर इन्हें कभी दौड़ा ले तो ये चुपचाप बिना गलती पूछे माफी माँगने में ही अपनी भलाई समझते हैं और आगे से बिना माँगे ही टाइम-टू-टाइम हफ्ता भाई ब्लॉगर के ब्लॉग पर उचित मात्रा में तारीफों के रूप में पहुँचाते रहते हैं . ताकि दुकान चलती रहे . ये यदा-कदा भाई के नाम पर पोस्ट ठेलकर भी भाई को संतुष्ट रखने के लिए प्रयासरत रहते हैं .

भाई भी किसी न किसी बहाने इनसे ज्यादा मौज लेने से बचते रहते हैं ताकि हफ्ता मिलता रहे . आखिर वे भी आपनी पोल नहीं खुलवाना चाहते क्योंकि रुस्तम का भय जो काम कर सकता है वह काम रुस्तम नहीं कर सकता .

कुछ बुजुर्ग टाइप ब्लॉगर बात बात पर अपने बुजुर्ग होने की दुहाई देते नहीं थकते . ये लोग सठियाई हुई बातें करके अपने अनुभव का हवाला देकर अन्य ब्लॉगरों की सहमति प्राप्त करना चाहते हैं . जैसे वास्तविक विश्व में बूढ़े लोग बच्चों को "हमारे जमाने में- हमारे जमाने में" बोल बोलकर उलझाए रहते हैं वैसे ही इनकी भी आदत होती है । इसी तर्ज़ पर चंद महिला ब्लॉगर हर बात को अपने महिला होने से जोड़ने के लिए प्रयासरत रहते हैं । भगवान जाने ये वास्तव में महिला हैं भी कि नहीं ।

कुछ ब्लॉगर हीरो बनने की छटपटाहट में उल्टे सीधे कार्य करते रहते हैं . इसी श्रंखला में कभी-कभी कोई न कोई इन्हें हड़काता रहता है . फिर ये टंकी पर चढ़कर नौटंकी करते हैं किन्तु टिप्पणियों की याद आते ही नीचे आ जाते हैं .

टिप्पणी का मोह छोड़ पाना कुछ संन्यासी टाइप ब्लॉगरों के ही वश में होता है . अन्यथा ब्लॉग-जगत में टिप्पणी की तुलना लक्ष्मी जी से की गई है . इसके लिए ब्लॉगरजन एडवांस में ही धन्यवाद आदि देते देखे जाते हैं . जैसे वास्तविक जगत में लोग लक्ष्मी जी की पूजा करते हैं वैसे ही यहाँ ब्लॉगर टिप्पणी कमाने की फिक्र में लगे रहते हैं . जैसे पैसे से पैसा कमाया जाता है वैसे ही टिप्पणी से टिप्पणी कमाने का प्रचलन है .

कुछ लोग इस माया के प्रति इतने उदासीन हो जाते हैं कि कि ठेलने की गोली खा खाकर पोस्ट ठेलने में लगे रहते हैं . पोस्ट ठेलने में ये अपने को इतना व्यस्त कर लेते हैं कि टिप्पणी क्या है यही भूल जाते हैं . यह ऐसा ही है जैसे कोई संन्यासी मायामोह को भूलने के लिए भाँग पीने लगे .

कुछ सच्चे संन्यासी ब्लॉगर होते हैं जो बिना ब्लॉग लिखे ही केवल टिप्पणी बाँटते रहते हैं . ये माया के सम्पर्क में रहकर भी माया से दूर होते हैं .

हालांकि यहाँ किसी के अस्तित्व को पूरी तरह प्रमाणित नहीं किया जा सकता, फिर भी जिन ब्लॉगरों ने अपने बारे में बताते हुए संज्ञा शब्दों के स्थान पर सर्वनाम शब्दों का प्रयोग किया होता है उन्हें पहचान छिपाने वाला बताकर उपहास किया जाता है । ऐसे ब्लॉगरों को कुछ लोग हेय दृष्टि से देखते पाये गये हैं ।

सारी बातें अभी लिख देंगे तो बाद के लिए कुछ न बचेगा इसलिए अब यहीं विराम देते हैं । जय ब्लॉग-जगत !

22 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सटीक अवलोकन कर अभाषी ब्लागरो की तरह तरह की क्वालिटी बताने के लिए आभार. आनंद आ गया पर इसमें आप यह लिखने में चूक गए की कुछ ब्लागरो को टंकी पर चढाने उतारने का काम बखूबी संपादित कर रहे है तनिक उनका भी जिक्र हो जाता तो हंड्रेड परसेंट पोस्ट हो जाती है . अभी एक बार पढ़ा है कल फिर पढूंगा .शुभरात्रि

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सटीक अवलोकन कर अभाषी ब्लागरो की तरह तरह की क्वालिटी बताने के लिए आभार. आनंद आ गया पर इसमें आप यह लिखने में चूक गए की कुछ ब्लागरो को टंकी पर चढाने उतारने का काम बखूबी संपादित कर रहे है तनिक उनका भी जिक्र हो जाता तो हंड्रेड परसेंट पोस्ट हो जाती है . अभी एक बार पढ़ा है कल फिर पढूंगा .शुभरात्रि

    उत्तर देंहटाएं
  3. कुछ ब्लॉगर हीरो बनने की छटपटाहट में उल्टे सीधे कार्य करते रहते हैं . इसी श्रंखला में कभी-कभी कोई न कोई इन्हें हड़काता रहता है . फिर ये टंकी पर चढ़कर नौटंकी करते हैं किन्तु टिप्पणियों की याद आते ही नीचे आ जाते हैं .

    सारी यह नहीं पढ़ पाया था सखेद

    उत्तर देंहटाएं
  4. हा हा विवे....................क। चुप चुप चुप। सबको इतने ज़ोर से गुदगुदा कर ही छोड़ेंगे क्यों ? है ना बोलो बोलो। इतना हँसा दिया है आपने के टिपियाते भी नहीं बन रहा ठीक से हा हा। बड़े वो हैं आप। हाँ नहीं तो।

    उत्तर देंहटाएं
  5. विवेक जी आज फिर बहुत बढ़िया ठेल पोस्ट ठेल दी !
    मजा आ गया पढ़कर |

    उत्तर देंहटाएं
  6. कुंभकर्ण, बिगडैल, दुकानदार, भाई, बुजुर्ग, सन्यासी, हीरो
    टाईप के ब्लॉगरों का हाल पढ़ते पढ़ते आनंद आ गया।
    निश्चित तौर पर यह स्वप्नलोक तो नहीं था :-)

    उत्तर देंहटाएं
  7. अभी कुछ और बकिया रह गया क्या?

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  8. -- shukr है आज बात दूर ......तक नहीं गयी..अपने विषय के चारों और ही रही..]

    --हंसने हसाने की पूरी सामग्री है इस लेख में.
    --संग्रहणीय पोस्ट है..जब कभी ब्लॉगजगत
    के बारे में ग़लतफ़हमी[खुशफहमी] होने लगेगी इस लेख को पढ़ लिया करेंगे..
    [कॉपीराइट करवा लें नहींतो कोई और अपने नाम से कल-परसों के अखबार में इसे शर्तिया छपवा ही देगा..]

    उत्तर देंहटाएं
  9. इस ठेलम-ठेली से सिद्ध होता है कि हम जो सिंहासन भेजे थे अल्पनाजी के कहने पर वो मिल गया है। इस पोस्ट को उदाहरण सहित लिखते तो ज्यादा समझ में आती बात और थोड़ा -बहुत हड़काई भी होती! ब्लागिंग की इतनी सब बातें पता चल गयीं तुमको इससे लगता है कि भाई टाइप ब्लागर तुम बनने ही वाले हो। शास्त्रीजी ने कुछ दिन पहले ही तुम्हारी तारीफ़ की है। :)

    उत्तर देंहटाएं
  10. भई हम तो यही विचार नहीं कर पा रहे हैं कि हम किस श्रेणी में फिट बैठते हैं:)

    उत्तर देंहटाएं
  11. कल और भी .. और भी प्रकार हैं क्‍या .. इतने तो वास्‍तविक दुनिया में भी नहीं !!

    उत्तर देंहटाएं
  12. तुम कैसे हो..यह नहीं बताये!!


    कहीं तो केटेगराईज़ करो अपने आप को!! हा हा!!

    दुकानदार टाईप??

    उत्तर देंहटाएं
  13. एक प्रकार लगता हैं जल्दी मे छुट गया
    चमचा टाइप ब्लॉगर जो जैसे ही ब्लॉग जगत मे
    आते हैं पुराने ब्लॉग पर चर्चा शुरू करते हैं फिर
    पुराने ब्लॉगर के पाँव लगते हैं , चमचा न कह कर
    अपने को शिष्य कहते हैं और जल्दी जल्दी चमचा
    गिरी करके के चर्चा के मंच पर पहुचते हैं .

    उत्तर देंहटाएं
  14. समझ मे नही आ रहा है कि अपुन किस कैटेगिरी मे फ़ित बैठ रहे है?शानदार लिखा आपने,बधाई आपको।

    उत्तर देंहटाएं
  15. भाई आपने सभी दुकानदारों , महिलाओं ,सन्यासियों , सठियाये हुए बुजुर्ग टाइप ब्लोगर , आलसी और सुस्त ब्लोगर , ठेले जाने वाले , बिगडैल बच्चे की भांति वाले , बनावटी हंसी वाले , हर ब्लॉग पर जाकर बधाई देने वाले , संजीदा टाइप ब्लोगर ....सभी की व्याख्या अच्छी की है ...पर अपने बारे में नहीं बताया ...आप यहाँ इस जगत में किसलिए हैं ....किस केटेगरी के ब्लोगर हैं आप ...
    वैसे आपने सही फ़रमाया है ...यही ब्लॉग जगत की माया है ....

    उत्तर देंहटाएं
  16. “(उड़न तश्तरी की पहली टिप्पणी मिलते ही उसके टिप्पणी के मायाजाल में उलझने की शुरूआत हो जाती है . और इस मायाजाल में एकबार फँसने के बाद कुछ भाग्यशाली ब्लॉगर ही इससे बाहर निकलने में कामयाब हो पाते हैं, जिन पर ईश्वर की असीम कृपा होती है )“.

    विवेकभाई, आप तो जादूगर हो !!!! आपने जो ब्लोगेरिया के रोगो के लिए कारण चाहिए थे वो लिखे. और पक्के तोर पर मुझे भी पहली टिप्पणी उड़न तश्तरी की ही आई थी और लग गया ब्लोगिग का मयाजाल!!! वाह गुरुदेव!!! आप सर्वविग्य हो!!!! आप सब कुछ जानते हो. बस आपकी पैनी नजर लगी रहे हम बच्चो की “‘ठेलम ठा“ पर ( बुजर्गो पर नही).....
    -शुक्रिया
    हे प्रभू द्वारा शुभ मगल!
    आभार
    मुम्बई टाईगर
    हे प्रभू यह तेरापन्थ

    उत्तर देंहटाएं
  17. विश्लेषण अभी बाकी है मेरे दोस्त । प्रयोगशाला में ब्लॉगर प्रजाति के नए - नए प्रकारों की खोज का काम जारी रखिये । अनुसंधान के ताज़ातरीन नतीजों से हमें अवगत कराते रहें । राम भली करें ।

    उत्तर देंहटाएं
  18. haa haa और कुछ इस टाइप के होते है... कि बता नहीं सकते किस टाइप के...

    उत्तर देंहटाएं

मित्रगण