शुक्रवार, नवंबर 28, 2008

ना मूर्खों के सींग



विदेशियों को सौंपकर, अपने तीर-कमान ।
उनसे आशा कर रहे, रखें हमारा ध्यान ।
रखें हमारा ध्यान, धन्य हैं भारतवासी ।
साध्वी का अपमान, न दें फजल को फाँसी ।
विवेक सिंह यों कहें, प्रसन्न उदार कहाते ।
ना मूर्खों के सींग, युँही पहचाने जाते ॥

11 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल विवेक जी, ये तुष्टिकरण की राजनीती पता नहीं क्या करके छोडेगी? चंद वोटों के लिए ये लोग देश हित में जीरो नहीं नेगेटिव कार्य कर रहे हैं. अब नेगेटिव से तो जीरो ही अच्छा होता.

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  2. ना मूर्खों के सींग, युँही पहचाने जाते ॥

    सही बात कही भाई विवेक सिंह जी ! आज तो सब्र का बाँध टूट ही गया समझिये ! अगर कुछ ठोस नही हुआ तो बहुत मुश्किल होगा अब ! रामराम !

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  3. संतो को न सताइए जाकी मोटी हाय
    मुई खाल की साँस सो सार भस्म हो जाए

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  4. विवेक जी, सही मे आज जरुरत है एक ऐसे दृड़ इच्छाशक्तियुक्त नेतृत्व की,जो कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कठोर निर्णय ले सके.अन्यथा इस देश का भगवान ही मालिक है (शायद वो भी ईंकार कर दे)
    बहरहाल बधाई स्वीकार करे.

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  5. SADHWI KA APMAN...? KUCH KAHNA ABHI JALDI HAI N? HAQUIQAT HAI KYA..ABHI TO YAHI ABUJH HAI...!

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  6. स्वप्निला जी आपको पूरा अधिकार है कि जो आपको सही लगता वह कहें . अपनी बात खुल कर कहने का धन्यवाद . पर मेरा यही मत है कि यह सब सोचे समझे षडयन्त्र के तहत हो रहा है . असल उद्देश्य तो षडयन्त्रकारी ही जानें . वैसे इतिहास ऐसी गलतियों से भरा पडा है जिनके बाद पछताने के अलावा कुछ नहीं मिला . अब भी हम इन अविश्वसनीय नेताओं का भरोसा करके गलती ही कर रहे हैं .

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  7. आज तो सब्र का बाँध टूट ही गया समझिये ! अगर कुछ ठोस नही हुआ तो बहुत मुश्किल होगा |
    सही कहा ताऊ ने मगर यहाँ कभी कुछ ठोस ही नही होता वरना यह नोबत ही नही आती |

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