इस निबंध को हिन्दी दिवस के अवसर पर नगर स्तरीय निबंध प्रतियोगिता के लिए लिखा गया था । जब इसे प्रथम पुरस्कार मिल गया तो जनता की भारी माँग पर इसे यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है ।
स्वप्नलोक
संभव है कि इस ब्लॉग पर लिखी बातें मेरी विचारधारा का प्रतिनिधित्व न करती हों । यहाँ लिखी बातें विभिन्न दृष्टिकोणों से सोचने का परिणाम हैं । कृपया किसी प्रकार का पूर्वाग्रह न रखें ।
Tuesday, February 21, 2012
Monday, October 03, 2011
ताजगी अक्टूबर का मास
ताजगी अक्टूबर का मास
दूर दूर तक नहीं कहीं पर
गरमी का आभास
ताजगी अक्टूबर का मास
धरती जैसे हुई पुष्पमय
नभ ने कहा शरद ऋतु की जय
अब न उमस का है कोई भय
यत्र तत्र सर्वत्र, दिखाई
देता बस उल्लास
ताजगी अक्टूबर का मास
त्यौहारों की चहल पहल है
खेतों में धान की फसल है
लगता है ज्यों पवन नवल है
शीतल स्वच्छ प्राणवायु पा
नई हुई हर साँस
ताजगी अक्टूबर का मास
दूर दूर तक नहीं कहीं पर गरमी का आभास
ताजगी अक्टूबर का मास
Wednesday, September 07, 2011
शर्म मँगाओ
शर्म मँगाओ !
संसद के गलियारों में है इसकी किल्लत
शर्म मँगाओ !
बम फूटे हौसला न टूटे,
मंत्रालय न हाथ से जाए ।
चाहे पड़े झेलनी जिल्लत
पर मंत्रीपद को न गँवाओ
शर्म मँगाओ !
बिना शर्म के नहीं चलेगा
कुछ उपाय कुछ बात करो
करो देश में ही वसूल
या बाहर से आयात कराओ
शर्म मँगाओ !
संसद के गलियारों में है इसकी किल्लत
शर्म मँगाओ !
Thursday, September 01, 2011
मेरा तुझे प्रणाम सितम्बर
धूप-छावँ का नाम सितम्बर
कोई उजली शाम सितम्बर
वसुधा तृप्त हुई जल पीकर
हरियारी फैली धरती पर
धरती का गुलफ़ाम सितम्बर
कोई उजली शाम सितम्बर
वर्षा सारा जहाँ धो गई
लेकिन अब कुछ मंद हो गई
इसका अल्प विराम सितम्बर
कोई उजली शाम सितम्बर
बादल थककर वापस जाते
बचाकुचा पानी बरसाते
देता कुछ आराम सितम्बर
कोई उजली शाम सितम्बर
लगती ताजा हवा भली सी
धूप कुरकुरी तली तली सी
तलता है बेदाम सितम्बर
कोई उजली शाम सितम्बर
खेतों में झूमते धान हैं
इन पर लट्टू सब किसान हैं
खुशियों का पैगाम सितम्बर
कोई उजली शाम सितम्बर
वर्ष यहाँ से ढलान पर है
नदियाँ कुछ कम उफान पर हैं
नदी किनारे ग्राम सितम्बर
कोई उजली शाम सितम्बर
देख शरद ऋतु खड़ी द्वार पर
मस्ती सी छायी बयार पर
मेरा तुझे प्रणाम सितम्बर
कोई उजली शाम सितम्बर
धूप-छावँ का नाम सितम्बर
कोई उजली शाम सितम्बर
Wednesday, August 24, 2011
डाक्टर अमर कुमार को श्रद्धांजलि !
आज इस टिप्पणीकार की तमाम टिप्पणियाँ रह रहकर याद आ रहीं हैं । हम जहाँ डॉक्टर साहब से मौज लेने के अवसर तलाशते रहते थे वहीं उनसे थोड़ा सा डरते भी थे कि कहीं हम कुछ ऐसा न लिखें जिससे उन्हें टोकना पड़े । यहाँ काफी कुछ मन में घुमड़ रहा है लेकिन अब लिखा न जाएगा ।
आज डॉक्टर अमर कुमार शरीर से हमारे बीच नहीं हैं । लेकिन वे हमारे मन में हमेशा बने रहेंगे । मेरी उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि !
आज डॉक्टर अमर कुमार शरीर से हमारे बीच नहीं हैं । लेकिन वे हमारे मन में हमेशा बने रहेंगे । मेरी उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि !
Tuesday, August 23, 2011
पतली गली से निकल जा
तेरा दावा है कि तू भारत का पूत है ।
मुझको लगता है कि तू दुश्मन का दूत है ॥
अक्ल से तू एकदम कंगाल हो गया ।
माना कि तेरे पास में दौलत अकूत है
मेरी माने तो अब आबरू बचा ले तू ।
पब्लिक खड़ी है देख ले हाथों में जूत है ॥
खींच ली जाएगी लंगोटी तेरी ।
सबको लगता है कि तू भागता भूत है ॥
Sunday, July 10, 2011
आया, मानसून आया
आज काफी दिनों के बाद ब्लाग पर आने का समय मिला है । असल में पड़ौस के बच्चों को स्कूल के लिए मौसम पर कविता लिखकर ले जानी थी । उनकी डिमाण्ड पर एक कविता लिखी तो सोचा इसे क्यों न ब्लॉग पर भी डाल दिया जाय जिससे इसका सूखा भी समाप्त हो सके । एक बार गरमी से परेशान होकर एक कविता लिखी थी "गर्मी की सरकार निरंकुश" । आज उसी श्रृंखला में यह कविता भी है ।
गर्मी की सरकार गिराने,
आया, मानसून आया ।
पड़े धूप के तेवर ढीले,
हुई बादलों की छाया ॥
भर उमंग में लगीं फुदकने,
चिड़ियाँ सब डाली-डाली ।
मधुर स्वरों में लगी बोलने,
कुहू-कुहू कोयल काली ॥
देख धरा पर चहल-पहल,
बूँदों का भी जी ललचाया ।
टप-टप गिरने लगीं भूमि पर,
मोर-नृत्य उनको भाया ॥
बारिश के देवता इंद्र ने,
इंद्रधनुष जब तान लिया ।
सूर्यदेव भी सहम गए,
चुप, पश्चिम को प्रस्थान किया ॥
धरती पर उत्साह, बाग में
फूल और हरियाली ।
सब कीचड़ बह गया,
साफ हो गयीं गावँ की नाली ॥
गर्मी की सरकार गिराने,
आया, मानसून आया ।
पड़े धूप के तेवर ढीले,
हुई बादलों की छाया ॥
भर उमंग में लगीं फुदकने,
चिड़ियाँ सब डाली-डाली ।
मधुर स्वरों में लगी बोलने,
कुहू-कुहू कोयल काली ॥
देख धरा पर चहल-पहल,
बूँदों का भी जी ललचाया ।
टप-टप गिरने लगीं भूमि पर,
मोर-नृत्य उनको भाया ॥
बारिश के देवता इंद्र ने,
इंद्रधनुष जब तान लिया ।
सूर्यदेव भी सहम गए,
चुप, पश्चिम को प्रस्थान किया ॥
धरती पर उत्साह, बाग में
फूल और हरियाली ।
सब कीचड़ बह गया,
साफ हो गयीं गावँ की नाली ॥
Monday, December 20, 2010
सचिन की उम्र
सचिन को शतकों के अर्धशतक की बधाई । इस अवसर पर मैं सरकार को एक मुफ्त की सलाह देना चाहता हूँ कि वह सचिन की उम्र के बारे में बात करने को दण्डनीय अपराध घोषित करने के लिए एक कानून बनाए । इसके लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया जाय । फिर देखें कौन रोकता है संसद को चलने से ?
Friday, December 10, 2010
खूब किया सत्कार
मेहमानों का आपने, खूब किया सत्कार ।
गर्दन नीची हो गई, पहन-पहनकर हार ।।
पहन-पहनकर हार, फिरें कीवी इतराते ।
क्लीन स्वीप कर मेजबान भी दाँत दिखाते ।।
विवेक सिंह यों कहें, कर्ज यह ऐहसानों का ।
चुके जल्द से जल्द, फर्ज है मेहमानों का ।।
गर्दन नीची हो गई, पहन-पहनकर हार ।।
पहन-पहनकर हार, फिरें कीवी इतराते ।
क्लीन स्वीप कर मेजबान भी दाँत दिखाते ।।
विवेक सिंह यों कहें, कर्ज यह ऐहसानों का ।
चुके जल्द से जल्द, फर्ज है मेहमानों का ।।
Wednesday, November 10, 2010
अब खड़ाऊँ शत्रुघ्न के हवाले
जब राम जी को वनवास के दौरान यह खबर मिली कि अयोध्या में घोटाला हुआ है तो वे न तो उदास हुए और न अपनी प्रसन्नता ही उन्होंने लक्ष्मण जी को जाहिर होने दी । पर जो लोग यह दावा करते थे कि वे खत का मजमून भाँप लेते हैं लिफ़ाफ़ा देखकर, उन्होंने यह दावा किया कि राम जी को खुशी हुई थी क्योंकि घोटाले का ठीकरा भरत जी के सिर फूट रहा था और रामजी की खड़ाऊँ साफ बच निकली थीं ।
भरत को वन में आने के आदेश दिये गए । भरत आए । साथ में सफाई भी लाए । इतनी सफाई लाए कि जंगल के पेड़ पौधे साफ़ हो गए और जंगल में मंगल हो गया । उन्होंने कहा, " भैया ! होनी को कौन टाल सकता है ? घोटाला तो होना था सो गया । पर आप इसका पॉजीटिव पक्ष भी तो देखिए । आपके राज में घोटाला भी हुआ तो आदर्श !"
किन्तु राम जी न पसीजे । उन्होंने लक्ष्मण को मामले की जाँच करके रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया । लक्ष्मण तो इसी ताक में थे । उन्होंने जाँच करके रिपोर्ट दी कि अब भरत को वन में बुला लिया जाय ताकि यह अपना आदर्श कार्य बड़े स्तर पर कर सकें । खड़ाऊँ शत्रुघ्न के हवाले कर दी जाएं ।
जब यह खबर अयोध्या वासियों को मिली तो वे राम की जय जयकार करने लगे ।
( कलयुग की रामायण से )
भरत को वन में आने के आदेश दिये गए । भरत आए । साथ में सफाई भी लाए । इतनी सफाई लाए कि जंगल के पेड़ पौधे साफ़ हो गए और जंगल में मंगल हो गया । उन्होंने कहा, " भैया ! होनी को कौन टाल सकता है ? घोटाला तो होना था सो गया । पर आप इसका पॉजीटिव पक्ष भी तो देखिए । आपके राज में घोटाला भी हुआ तो आदर्श !"
किन्तु राम जी न पसीजे । उन्होंने लक्ष्मण को मामले की जाँच करके रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया । लक्ष्मण तो इसी ताक में थे । उन्होंने जाँच करके रिपोर्ट दी कि अब भरत को वन में बुला लिया जाय ताकि यह अपना आदर्श कार्य बड़े स्तर पर कर सकें । खड़ाऊँ शत्रुघ्न के हवाले कर दी जाएं ।
जब यह खबर अयोध्या वासियों को मिली तो वे राम की जय जयकार करने लगे ।
( कलयुग की रामायण से )
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