रविवार, अप्रैल 18, 2010

कोंपल की करुण कहानी


















शाखा में छिप सर्दी काटी,
लम्बा समय बिताया ।
कोंपल ने जब बाहर देखा,
उसका मन हरषाया ॥

जाड़ा मिला नदारद उसको,
बसन्त का मौसम था ।
दिन में कुछ गरमाया सा था,
रातों को कुछ नम था ॥

अवसर यह अनुकूल जान,
उसने बाहर आने का ।
किया पैक सामान सभी,
इस दुनिया में लाने का ॥

परमीशन पेढ़ से माँगकर,
कोंपल बाहर आयी ।
आसपास की शाखाओं ने,

भेजी उसे बधाई ॥

उसका सपना था, बढ़कर वह,
डाली एक बनेगी ।
किसी धूप से त्रस्त पथिक के,
ऊपर कभी तनेगी ॥

करके पर-उपकार, लक्ष्य
जीवन का मिल जाएगा ।
होगा जीना व्यर्थ, किसी के
काम न यदि आयेगा ॥

किन्तु हाय वह क्या जाने,
उसका जीवन अब कम था ।
समझा जिसे बसन्त, असल में
गरमी का मौसम था ।

अत्याचारी लू ने,

बेचारी को आ धमकाया ।
प्राण पखेरू उड़े, रह गयी,
केवल नश्वर काया ॥

देख देखकर मृत शरीर,
कोंपल का सूखा-सूखा ।
आज रो दिया कौआ भी,
जो था कुछ रूखा-रूखा ॥

हमने अपनी आँखों से,
देखी यह करुण कहानी ।
अपनी भी आँखों में आया
मामूली  सा पानी ॥

9 टिप्‍पणियां:

  1. waah sir ek kopal ki karun kahani waah...
    bahut khoob
    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  2. badi anuthi rachna hai :-)
    konpal ne bahar aane ka saman bhi pack kiya
    aur bichara garmi mein mara gaya

    kya karen insaan mar raha hai waha ped kaise bache ........

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  3. हमने अपनी आँखों से,
    देखी यह करुण कहानी ।
    अपनी भी आँखों में आया
    मामूली सा पानी ॥

    bahut khub


    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

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  4. इतनी सह्रदयता कि कोंपल का मन झांक कर देख आये विवेक !
    शुभकामनाये !

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  5. अनमोल रचना। प्रकृति‍ और मनुष्‍य के बीच ऐसे संवाद कम ही देखने में आ रहे हैं।

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