
आज फुरसतिया की ओर टहलने चले गए तो पता चला कि वे कविता का मसौदा लेकर बैठे हैं । हमें अपने आशुकवि होने पर बड़ी लाज आयी । हालांकि हम लाज के मारे लाल तो नहीं हुए पर सोच में अवश्य पड़ गए कि ऐसे लम्बे लम्बे झिलाऊ लेख लिखने वाले लोग कविता लिख रहे हैं तो हम क्यों नहीं लिख सकते ? बस बैठे और गौरैया के नाम दस मिनट कर ही दिये आज के । कविता हाज़िर है:
एक बार फिर आ गौरैया
तेरी बहुत याद आती है
यूँ तो रूठ न जा गौरैया
बचपन की यादों में शामिल
तेरे बिन वे यादें बोझिल
तेरे दर्शन को बेकल दिल
सूरत जरा दिखा गौरैया
एक बार फिर आ गौरैया
तेरे पीछे धमाचौकड़ी
कतना के नीचे रख लकड़ी
एक बार धोखे से पकड़ी
अब वह खता भुला गौरैया
एक बार फिर आ गौरैया
देख प्रदूषण मत हो शक्की
एक बात है बिल्कुल पक्की
हमने काफी करी तरक्की
तू भी खुश हो गा गौरैया
एक बार फिर आ गौरैया
दिन यह तेरे नाम कर दिया
बहुत बड़ा यह काम कर दिया
तुझको आज सलाम कर दिया
पंख जरा फैला गौरैया
एक बार फिर आ गौरैया
तेरी बहुत याद आती है
यूँ तो रूठ न जा गौरैया
एक बार फिर आ गौरैया !
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