गुरुवार, जुलाई 30, 2009

फ़ुरसत मिले ढेर सारी तो...

रूठ गयी हैं देवि सरस्वति,

देव आइडिया भी रूठे ।

कुछ विचार थे अधकचरे से,

मुई व्यस्तता ने लूटे ॥

यह जीवन की दौड़ धूप सी,

हमको रास नहीं आती ।

व्यस्त देखकर देवि कल्पना,

भी, अब पास नहीं आती ॥

मिले ढेर सारी फ़ुरसत तो,

संग कल्पना के डोलें ।

सच को दूर भगाकर कुछ दिन,

झूठ हर समय बस बोलें ॥

यारों के संग ताश खेलकर,

खुलकर हँसने की बारी ।

अट्टहास कर शोर मचायें,

होती हो ज्यों बमबारी ॥

19 टिप्‍पणियां:

  1. यारों के संग ताश खेलकर,
    खुलकर हँसने की बारी ।
    अट्टहास कर शोर मचायें,
    होती हो ज्यों बमबारी ||

    विवेक भाई आपने दोस्तों की याद दिला दी | यार वो रात-रात भर ताश खेलना ...

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  2. इत्ते खतरनाक आइडिया हैं इसीलिये फ़ुरसत देव आपको फ़ुरसत प्रदान नहीं करते!

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  3. बहुत बढ़िया |

    फुरसत देव से आपको फुरसत देने की प्रार्थना करेंगे |

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  4. जब बिना फ़ुरसत ये हाल हैं तो फ़ुरसत के समय क्या होगा?

    रामराम.

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  5. यारों के संग ताश खेलकर,

    खुलकर हँसने की बारी ।

    अट्टहास कर शोर मचायें,

    होती हो ज्यों बमबारी


    --काश!! ऐसे मौके मिल पाते.. वैसे बिना फुरसत भी कम नहीं आंका जा सकता. :)

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  6. जी बजा फरमाया -दिल चाहता है फिर वही फुरसत के चार दिन !

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  7. फुर्सत देव ने जैसे छोडा कि कल्‍पना देवी हाजिर .. क्‍या बात है !!

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  8. यह तो फुरसतिया महाराज ही आपको बता सकते हैं कि आपको फुर्सत कब मिलेगी.

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  9. हमारी व्यथा लिख दी मित्र

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  10. हां जी, हमार इंटरनेटवा भी रूठे बैठा था, सो देर से टिपिया रहन:)

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  11. बैठे रहे तसव्वुरे-जानां किये हुये...

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