सोमवार, जुलाई 13, 2009

होती बड़ी फ़ज़ीहत है

बाथरूम में फ़िसल गया कल,

गिरा फ़र्श पर धड़ाम से ।

बाहर से आवाजें आयीं,

"क्या करते हो ? आराम से !"

किन्तु मुझे आराम कहाँ था,

रगड़ाई में व्यस्त हुआ ।

ऐसा रगड़ा बदन घिस गया,

हाय दर्द से त्रस्त हुआ ॥

हफ़्ते भर में बजन घट गया,

मोटा था, अब दुबला हूँ ।

मानो काया पलट हो गयी,

महाबली था, अबला हूँ ॥

इसी तरह यदि हुआ नहाना,

जल्दी ही चुक जाऊँगा ।

मेरे जैसे और मिलेंगे,

किन्तु न फिर मैं आऊँगा ॥

नहाने का साबुन हूँ तो क्या,

मेरी भी तो इज़्ज़त है ।

जाने कहाँ-कहाँ घिसते हैं,

होती बड़ी फ़जीहत है ॥

34 टिप्‍पणियां:

  1. लोगो के पास पीने को पानी नही, तुम नहाते हो? लोगो के पास साबुन लगाने के लिये तो साबून को भी रगडते हो.... भाई बडॆ फ़जुल खर्ची हो, इन्कम टेक्स वालो को पता चल गया तो??

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  2. ख्याल रखिये भाई,
    बारिश के मौसम में फिसलन बहुत होती है....:)))

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  4. Saboon ke dard ko dhyan mein rakh kar hi 'Shower gel' ..ko market mein laya gaya hai!

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  5. अथ श्री साबुन गाथा संपुरणम. बहुत सुंदर लिखी जी, बधाई. बिचारा साबुन भी निहाल हुआ.शायद साबुन की पीडा पहली बार किसी सरल हृदय कवि ने सुनाई है किसी को.

    रामराम.

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  6. उपर अथ श्री साबुन गाथा संपुरणम को अथ श्री साबुन गाथा प्रारंभम पढें.:)

    रामराम

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  7. वाह वाह साबुन का दर्द बयां कर दिया आपने.. लगे हाथ शैम्पू की त्रासदी पर भी प्रकाश डाल देते

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  8. साबुन से बदन साफ करते हैं, मगर साबुन गि‍र जाए तो उसे कि‍स चीज से साफ करते हैं:)
    बहुत सुंदर हास्‍य कवि‍ता:)

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  9. बहुत ही अच्‍छा लिखा ।

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  10. लक्स होते तो ऐसा न कहते!! :)

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  11. saboon ke dublepan kee chinta hai to ise paani se bachaakar rakhe yah dubla nahi hoga.

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  12. Wah! Apne to sabun ki atma ko jinda kar diya.umda !! Kabhi hamare yahan bhi ayen to khushi hogi.

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  13. साबुन की व्यथा का हमें तो आज ही पता चला

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  14. थोडा भाई बारिश में फिसलन तो होती ही है भाई संभल कर चला करे. . आपकी दैनिक कार्य डायरी को कविता के रूप में पढ़ा तो अच्छा लगा

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  15. साबुन की व्यथा बहुत दारुण है...आँखें गीली हो गयीं...बिचारा साबुन...सारी जिंदगी घिस घिस कर बिता दी...
    नीरज

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  16. साबुन का पैर फिसला !!! कोई बात नहीं। किसी महिला का पैर फिसलता तो फ़ज़ीहत हो जाती ना....:-)

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  17. बहुत बढिया रचना है .. सबका दर्द महसूस करना मामूली बात नहीं !

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  18. कवि विवेक जी कर रहे साबुन से स्नान।
    गिरा फिसलकर जमीं पर, कविता करे बखान॥

    कविता करे बखान, हुई रगड़ाई इसकी।
    पानी-पानी हुआ, मैल तन की तब खिसकी॥

    कह साबुन कुम्हलाय, सफाई का कारज है नेक।
    भली फजीहत कर गये,कह कविता कवि विवेक॥

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  21. जो मचलता-फिसलता है, वही धड़ाम होता है। मैं सेनसेक्स के बारे में नहीं कह रहा!

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  22. नहाने का साबुन हूँ तो क्या,

    मेरी भी तो इज़्ज़त है ।

    जाने कहाँ-कहाँ घिसते हैं,

    होती बड़ी फ़जीहत है ॥
    achchha likha hai aapne!

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  23. नहाने का साबुन हूँ तो क्या,
    मेरी भी तो इज़्ज़त है ।
    जाने कहाँ-कहाँ घिसते हैं,
    होती बड़ी फ़जीहत है ॥


    वाह वाह....साबुन के दर्द पर पहली बार कविता पढ़ी ....बहुत खूब.....!!

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  24. सुन्दर, साहित्यिक रचना....:-)
    साबुन ने अपनी बेचारगी से कवि को जगाया, इसके लिए साबुन बधाई का पात्र है.

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  25. क्या बात है, कोई तो मिला जिसने साबुन की पीड़ा को समझा।
    बहुत सुन्दर

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