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सोमवार, जुलाई 13, 2009

होती बड़ी फ़ज़ीहत है

बाथरूम में फ़िसल गया कल,

गिरा फ़र्श पर धड़ाम से ।

बाहर से आवाजें आयीं,

"क्या करते हो ? आराम से !"

किन्तु मुझे आराम कहाँ था,

रगड़ाई में व्यस्त हुआ ।

ऐसा रगड़ा बदन घिस गया,

हाय दर्द से त्रस्त हुआ ॥

हफ़्ते भर में बजन घट गया,

मोटा था, अब दुबला हूँ ।

मानो काया पलट हो गयी,

महाबली था, अबला हूँ ॥

इसी तरह यदि हुआ नहाना,

जल्दी ही चुक जाऊँगा ।

मेरे जैसे और मिलेंगे,

किन्तु न फिर मैं आऊँगा ॥

नहाने का साबुन हूँ तो क्या,

मेरी भी तो इज़्ज़त है ।

जाने कहाँ-कहाँ घिसते हैं,

होती बड़ी फ़जीहत है ॥

मित्रगण