बाथरूम में फ़िसल गया कल,
गिरा फ़र्श पर धड़ाम से ।
बाहर से आवाजें आयीं,
"क्या करते हो ? आराम से !"
किन्तु मुझे आराम कहाँ था,
रगड़ाई में व्यस्त हुआ ।
ऐसा रगड़ा बदन घिस गया,
हाय दर्द से त्रस्त हुआ ॥
हफ़्ते भर में बजन घट गया,
मोटा था, अब दुबला हूँ ।
मानो काया पलट हो गयी,
महाबली था, अबला हूँ ॥
इसी तरह यदि हुआ नहाना,
जल्दी ही चुक जाऊँगा ।
मेरे जैसे और मिलेंगे,
किन्तु न फिर मैं आऊँगा ॥
नहाने का साबुन हूँ तो क्या,
मेरी भी तो इज़्ज़त है ।
जाने कहाँ-कहाँ घिसते हैं,
होती बड़ी फ़जीहत है ॥