शनिवार, अक्तूबर 31, 2009

मठाधीश बाबा के आश्रम में

कल रात तबियत कुछ अच्छी महसूस नहीं हो रही थी । मैं जल्दी सो गया । रात को अचानक कॉलबेल बजी तो उठकर दरवाजा खोला । दरवाजे पर चार अजीब से प्राणी खड़े थे । एक ने आदमी की तरह बात करते हुए मुझे हिन्दी में कहा, “ चल भई तुझे ब्लॉग-मठाधीश ने बुलाया है ।” इसके बाद उन्होंने मुझे बोलने तक का मौका नहीं दिया । मुझे बोलने का मौका तभी मिला जब होश आने पर मैंने स्वयं को ब्लॉग-मठाधीश के सामने खड़ा पाया । एक प्राणी बोला बाबा यही वह ब्लॉगर है जिसे आपने याद किया था ।

बाबा एक ऊँचे से आसन पर बैठे हुए मठा पी रहे थे । बगल में ही एक बर्तन रखा था जिसको अभी आखिरी कौर खाकर बाबा ने खाली कर दिया था । बाबा पास खड़े प्राणी से बोले, “ बच्चा माफी दो ।” वह प्राणी भागता हुआ गया और सेकिण्डों में माफी का टोकरा लेकर दौड़ता हुआ आ गया । बर्तन भरा हुआ देखकर बाबा का चेहरा खिल उठा । मैं समझ गया कि बाबा को माफी खाने का शौक है ।

बाबा ने मेरी ओर नज़र उठाकर कहा, “ हमें माफी दो बच्चा जो इतनी रात गये बुलाया ।” मैंने तुरंत बाबा के पास जाकर बर्तन से उठाकर थोड़ी सी माफी बाबा के हाथ पर रख दी । बाबा देखते रह गये । मुँह से इतना ही निकला, “माफ करना, बहुत शातिर हो ।”

फिर बाबा काम की बात पर आये । बोले, “माफ करना, दरअसल हमें शंका हो गयी है ।” मैंने हिम्मत करके पूछा , “ क्या शंका है बाबा ? मुझे आपकी शंका का समाधान करके खुशी होगी ।”

“माफ करना, सही बताओ यह स्वप्नलोक कंपनी का क्या रहस्य है ?”

बाबा, इतनी सी बात को इस तरह बुलाकर पूछा ?”

तभी एक प्राणी बोला, “ ओ सीधे से मुद्दे की बात बता । बाबा मीठा बोलते हैं इसका ये मतलब नहीं है कि बहुत सीधे हैं ।”

मेरे शरीर में झुरझुरी सी हो गयी । बाबा मुस्काराने लगे । बोले, “ माफ करना, बच्चे उद्दण्ड हैं । हाँ तो स्वप्नलोक कंपनी का क्या रहस्य है ? ”

आपको क्या लगता है ?”

माफ करना, हमें लगता है कि इस कंपनी में असल में कई लोग शामिल हैं । एक अच्छा कवि, एक बढ़िया कवि, एक अच्छा व्यंग्यकार, एक बढ़िया व्यंग्यकार, एक अच्छा कार्टूनिस्ट, एक बढ़िया कार्टूनिस्ट आदि आदि कई लोग इस ब्लॉग पर लिखते हैं ।”

बाबा अन्दाज़ा तो आपका ठीक है पर अच्छा और बढ़िया क्या अलग होते हैं ?”

फिर प्राणी को हस्तक्षेप करना पड़ा, “ तुझे अभी तो बताया था कि बाबा मीठा ही बोलते हैं । खराब को अच्छा कहते हैं और बढ़िया तो खैर बढ़िया हईये है । तू सीधा खड़ा रहेगा कि लगाऊँ एक कण्टाप ?”

बाबा ने हाथ से उसे शान्त रहने का इशारा किया और बोले, “ माफ करना, हमारी शंका निर्मूल नहीं थी । हम शर्त जीत गये । दर असल अभी शाम को ही एक नामचीन ब्लॉगर तुम्हारी बहुत तारीफ कर रहे थे । तो हमने अपनी शंका उनके सामने रख दी । शंका भारी थी लिहाज़ा वे लगभग दब से गये और शर्त लगा बैठे । हार गये बेचारे । ”

मैंने पोल खुलने के डर से कातर स्वर में निवेदन किया कि “बाबा यह बात अपने तक ही रखें अन्यथा बड़ी भद्द पिटेगी मेरी ।”

माफ करना, ठीक है पर तुम कंपनी में कवि, कार्टूनिस्ट आदि में से किस पद पर हो ?”

मैं तो बस लेखक हूँ बाबा । सबकी ओर से लिखता भर हूँ ।” कहते हुए मैं शर्म से जमीन में गढ़ा जा रहा था ।

बाबा ने धीरज बँधाया, “माफ करना, डरो मत ब्लॉग-जगत में सिर्फ़ तुम्हीं पर हमें शंका नहीं हुई है । राज और भी हैं जो हम किसी को नहीं बताते । पर तुम्हारा राज जाना है तो तुम्हें बताये देते हैं । दरअसल फुरसतिया, अनूप शुक्ल, अजय कुमार झा, और टिप्पू चाचा एक ही व्यक्ति हैं । समीरलाल एक व्यक्ति नहीं हैं । चेले चपाटे मिलाकर कुल दस लोग हैं जो उड़नतश्तरी नाम से टिपियाते और लिखते हैं । ताऊ जी का मसला तो खैर बच्चा बच्चा जानता है कि ताऊ कोई व्यक्ति नहीं एक टीम है । इस टीम के साथ एक रोचक बात यह है कि इनमें से किसका फोटू लगेगा यह आज भी डिसाइड नहीं हो सका है । और ज्यादा जानना चाहते हो तो सुनो, शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय भी एक ही व्यक्ति हैं ।”

मैं यह सब सुनकर अविश्वास से कहने लगा, “नहीं यह नहीं हो सकता । यह नहीं हो सकता ।”

इतने में पत्नी जी ने मुझे जगाकर पूछा, “ क्या नहीं हो सकता ?

और इस तरह मेरा सपना अधूरा ही रह गया ।

23 टिप्‍पणियां:

  1. सपने भी ब्‍लॉगिंग के
    पर पोल क्‍यों खोल रहे हो
    हमारे बीच यह तय तो
    हुआ नहीं था
    कि सपने के नाम पर
    पोल की पूरी ढोलक ही
    कर दोगे फाड़ फाड़।

    आखिर हमने भी अलग अलग
    चित्र ही चिपकाए हैं
    देख विवेक देख।

    उड़नतश्‍तरी टीम की कटोरियों
    और चम्‍मचों का विवरण मत देना

    वरना ....

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  2. परदे में रहने दो, परदा ना उठाओ
    परदा जो उठ गया तो...
    अल्लाह मेरी तौबा!

    फिल्म वही थी ना? शिकार

    बी एस पाबला

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  3. हा हा हा... हमें भी कुछ कुछ शंका तो है कि हो न हो जैसा बाबा जी कह रहे हैं,बिल्कुल कुछ वैसा ही चक्कर है :)
    कहीं आपने सपने की आड लेकर सचमुच "घर का भेदी लंका ढाऎ" की तरह से रहस्योदघाटन ही तो नहीं कर डाला :)

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  4. विवेक जी,
    आज ज़रा थोडा ओवर टाइम कर लेना और बाबा से मेरा भी पता कर लेना. कहीं कल को वे यह ना कहने लगे कि मुसाफिर भी कई सारे बन्दे हैं, जो अलग अलग दिशाओं में भ्रमण करके ब्लॉग पर छाप देते हैं.

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  5. मुझे लगता है सब विवेक सिंह है..

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  6. अरे बाबा कोई नयी बात बताते तो मजा भी आता यह तो हमे भी मालुम है.... लेकिन बोला ना बाबा प्यार से बोलते है तो इस का मतलब यह नही कि बाबा शरीफ़ है.
    चलिये अब पर्दा है , इसे ऒर मत उठाये, कुछ राज राज ही रहने दे.
    धन्यवाद

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  7. शिवकुमार पाण्डेय और ज्ञानदत्त मिश्र भी एक ही व्यक्ति हैं । यह जानने को स्वप्न देखने की क्या जरूरत थी। वैसे ही पूछ लेते, बता देते!

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  8. भतिजे टीम वर्क तो महिनों से बता रहे हो? लिख लिख के मिटा जाते हो? आखिर यह सपना कितना पुराना है? ताजा तो नही लगता.:)

    रामराम.

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  9. “ माफ करना, हमें लगता है कि इस कंपनी में असल में कई लोग शामिल हैं । एक अच्छा कवि, एक बढ़िया कवि, एक अच्छा व्यंग्यकार, एक बढ़िया व्यंग्यकार, एक अच्छा कार्टूनिस्ट, एक बढ़िया कार्टूनिस्ट आदि आदि कई लोग इस ब्लॉग पर लिखते हैं ।”

    सपने कभी सच नहीं होते:)

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  10. ye shak to hume bhi kai din se tha ki Tipu chacha aur Fursatiya ek hi hain... bas logo se chhipane ke liye bhasha badal ke likhte hain. hum serious hain aapkee tarah majak nahi kar rahe

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  11. आज भरोसा गया कि एक ही आदमी एक ही टाइम पर एक से ज्यादे जगह सपने में आ सकता है .......विवेक भाई वही बाबा मेरे सपने में भी आये थे और कई लोगो के बारे में बताये भी थे ....लेकिन मै लिख नहीं पाया नेट जो खराब था ..........लेकिन यह भी भरोसा हो गया कि एक ही बाबा अलग अलग चेलो से अलग अलग बाते भी करते है :)

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  12. उड़नतश्‍तरी टीम की कटोरियों
    और चम्‍मचों का विवरण मत देना
    वरना ....वरना .... के आगे जो छ्द्म बात है उसके तनिक और स्पष्ट कर देते गुरु
    पूरे आलेख से एक बात पुष्ट हुई है
    अविनाश जी
    बीमार व्यक्तियों को सपने ज़्यादा आते हैं

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  13. ईश्वर आपके सपने सच करे।
    नाक को घुमाकर पकड़ने की आपकी अदा निराली है। बनाये रखिए।

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  14. चलो सपने के बहाने एक पोस्ट तो बन गई.....सपना सच्चा है या झूठा......यह तो बाबा ही जाने;))

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  15. भाई अगर सचमुच ऐसा है तो ठीक है ..क्योंकि मज़ाक मुझे पसन्द नहीं हाहाहाहा।

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  16. शीर्षक उपयुक्त नहीं लगता मुझे लगता है इसका शीर्षक होना चाहिए : पोल खोलू बाबा के आश्रम में'
    (आपकी विचारधारा से मेल खाना आवश्यक नहीं है)

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  17. शुक्र है शंका लघु ही निकली वर्ना सपना नहीं टूटता....

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  18. लगता है कि अब मुझे भी सपना देखना ही पड़ेगा।बुलाता हूं आज ब्लाग बावा को सपने मे और पूछता हूं कि लफ़ड़ा क्या है?

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  19. ये तो सबको ही पता है.. कोई नयी बात तो बताई होती..

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  20. बेहतर है और बेहतरीन होने की सम्भावना थी अगर उन स्सम्प्रदायिक ब्लोगों की पोल भी खोलते जो बिना प्रोफाइल के पचासों छद्म नाम या बेनामी रह कर टाप पर रहने का भ्रम दे पब्लिक को धोखा दे रहे हैं और अपने गिरोह के प्रचार में लिप्त हैं

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