शुक्रवार, नवंबर 13, 2009

किचिन से फूँकनी गायब

किचिन से फूँकनी गायब

आ गया कैसा जमाना ?
या खुदा ! या रब !
किचिन से फूँकनी गायब ॥

पड़ी जरूरत जब भी इसकी
कभी न यह मौके से खिसकी
किया कार्य थी डिमाण्ड जिसकी
दिया मुँह आग में जब-तब
किचिन से फूँकनी गायब ॥

लेकिन फिर भी गयी नौकरी
बन्द हुई प्राचीन फैक्टरी
जैसे सिर पर फूटे गगरी
आँसुओं से भीगा तन सब
किचिन से फूँकनी गायब ॥

चिमटा, चमचा निकले चालू
और तवा जैसा भी कालू
उड़ें हवा में जैसे बालू
नौकरी नयी मिल गयी अब
किचिन से फूँकनी गायब ॥

फुँकनी के घर अंधकार है
नई जॉब का इंतजार है
कंधों पर परिवार भार है
मौन है, सिल गये ज्यों लब
किचिन से फूँकनी गायब ॥

आ गया कैसा जमाना ?
या खुदा ! या रब !
किचिन से फूँकनी गायब !

14 टिप्‍पणियां:

  1. पढ तो लिया .. पर कुछ भी पल्‍ले न पडा .. अर्थ समझाना होगा !!

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  2. फुँकनी क्या कई चिजे गायब हो गई है... :)

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  3. विवेक भाई,
    ये सारी फूंकनियां चिंगारी को भड़काने के लिए ब्लॉगर भाई जो उड़ा ले गए हैं...

    जय हिंद...

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  4. "चिमटा, चमचा निकले चालू
    और तवा जैसा भी कालू"


    वाह!

    पर विवेक जी, अब तो गैस चूल्हे का जमाना है फुँकनी का क्या काम?

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  5. बहुत सुन्दर ...

    इन बिम्बों को आज कविता लगभग भूल चुकी है |

    आप जैसे कवियों के रहते कविता अपने सांस्कृतिक - बोध

    को बनाये रखेगी , ऐसा भरोसा मन में पैदा होता है |

    फुकनी को ए़क बार आपने फिर फूंक दिया ...

    धन्यवाद् ... ...

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  6. सही है. और भी बहुत कुछ गायब है.

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  7. गैस चूल्हे के युग में फूंकनी तो अब किस्से कहानियों में ही देखने को मिलेगी.....मिटटी का चूल्हा तो अब आने से रहा!

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  8. अब फूंकनी का काम बेलन कर रही है नारी के हाथ में:)

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  9. आप की सोच भी कहाँ कहाँ चली जाती है...वाह...विलक्षण सोच और अद्भुत कविता....वाह...
    नीरज

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  10. funkani se lgati bade zor se thi.khoob padi hai apane ko fukani se bhi.chimate se bhi aur sandasi taq se.

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  11. प्रकृति का नियम है कि कई चीज़ें लुप्त होती है और कई नई जन्म लेती है। फुंकनी गायब हुई तो ऑटोमैटिक गैस चुल्हे आ गए।

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  12. फुकनी गायब है तो फुकने का डर भी तो नही है पर उल्टा ही हो रहा है

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  13. काश कोई मर्मज्ञ भाष्यकार इसकी व्याख्या कर देता तो मुझे भी कुछ आनन्द आ लेता। अभी तो ललाट सिकोड़ कर वापस जा रहें हैं। :(

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