शनिवार, अप्रैल 24, 2010

गबन की राशि लौटाने को कोषाध्यक्ष के नाम खुला पत्र

आदरणीय कोषाध्यक्ष जी !


 आपकी तरक्की पर आपको बहुत-बहुत बधाई । यह अलग बात है कि यह बधाई मेरे हृदय की गहराई से नहीं निकल रही है । हृदय में तो प्रतिशोध की भावना ने उपनिवेश स्थापित कर लिया है ।  लेकिन फिर भी एक सभ्य नागरिक होने के नाते तरक्की पर बधाई दे रहा हूँ ।
 इतिहास में धोखेबाजी के उदाहरणों की कोई कमी नहीं है । अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी की पीठ में तलवार भौंककर उसकी हत्या करवा दी थी और स्वयं सुल्तान बन बैठा था ।
आपने हालाँकि मेरी हत्या तो नहीं की है ( लेकिन इसके लिए भी आप धन्यवाद के पात्र नहीं हैं क्योंकि मेरी हत्या करवाने के बाद आपको भी भूखों मरना पड़ता ) लेकिन मुझे कमजोर अवश्य कर दिया है । आपने जब जितने संसाधनों की माँग की, मैंने उसकी पूर्ति करने में कोई कसर न उठा रखी थी । उचित अनुचित तरीकों से संसाधन जुटाकर आपको मुहैया कराए ताकि उनका समझदारी से सदुपयोग करके मेरी भलाई कर सकें । किन्तु आपने आवश्यकता से अधिक संसाधनों की माँग करके अतिरिक्त संसाधनों का निजी संग्रह कर लिया । और आज स्थित यह हो गई है कि आपका कद मेरे गर्व से फूले हुए सीने से अधिक हो गया है । मुझे न चाहते हुए भी आपको बधाई प्रेषित करनी पड़ रही है । मेरा विश्वास है कि आपको इतना तो मालुम ही होगा कि आपको अपना खर्चा लेने की छूट अवश्य है लेकिन संग्रह करने की आज्ञा नहीं है ।
मुझे आपको इस बात का धन्यवाद तो कहना ही होगा कि आपके कारण मुझे यह सबक मिला कि आँख मूँदकर भरोसा किसी घनिष्ट से घनिष्ट साथी पर भी नहीं करना चाहिये । मैं जानता हूँ कि भविष्य में भी आपके बिना मेरा और मेरे बिना आपका काम चलने वाला नहीं है । इसलिए मैं इस गबन के लिए आपके विरुद्ध कोई कड़ी कार्रवाई न कर पाऊँगा । तथापि गबन की गई राशि को वसूल किए बिना मुझे चैन न पड़ेगा । यह राशि आपके खर्च की राशि से धीरे-धीरे काट ली जाएगी । आगे से माँग और पूर्ति का लेखा-जोखा मैं स्वयं सँभालूँगा ।
मुझे ज्ञात हुआ है कि पिछले काफी समय से आपने शारीरिक श्रम करना बिल्कुल ही बन्द कर दिया है । अब आपको शारीरिक श्रम करना अनिवार्य होगा ताकि आपकी उपयोगिता अपने द्वारा  लिए जा रहे खर्च से अधिक हो सके ।
अन्त में मैं इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि मेरा आपको भूखों मारने का कोई उद्देश्य नहीं है । आखिर आप मेरे पेट हो ।

7 टिप्‍पणियां:

  1. वाह पेट को कोषाध्‍यक्ष बना दिया। बढिया रचना।

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  2. अजी पेट जी को सुबह सुबह घुमने भेजा करे, ओर फ़िर इस से खुब काम भी ले, १०० ऊठक बेठक रोजाना, दंड भी

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  3. माँग और पूर्ति का लेखा-जोखा संभालने की कोशिश मैन पूर्व में भी कर चुका हूँ.. पर कोषाध्यक्ष साहब की पर्सनल सेक्रेटरी हमारी जीभ ने मिलकर हमारी कोशिश नाकाम कर दी.. देखते है आगे क्या होता है..

    पर आपके इस सस्पेंस व्यंग्य रुपी प्रयोग को हम सौ लम्बर दिए बिना मानेंगे नहीं

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  4. कल्‍पना की दाद देनी पड़ेगी। मजेदार।

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  5. लाला तोंदूराम बुरा तो नहीं मान जायेंगे.

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  6. दिल से निकली आवाज....
    आखिर तुम मेरे पिट हो..! मैं तुम्हे मारना नहीं चाहता.
    ..मैंने भी अपने पेट से कई बार कहा लेकिन क्या करें उसने टांगो से दोस्ती कर ली है.सिर्फ मोटर साईकिल में किक मारना जानती है.
    ..सुंदर व्यंग्य.

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