शनिवार, जनवरी 30, 2010

कहना होगा टर्र

यह कहानी उस कुएं की है जो काफी  पुराना था । कुएं में पानी की कोई कमी न थी । जितना पानी खींचा जाता उतना ही धरती उसमें भर देती । कुएं में मेंढक भी काफी संख्या में थे । कुछ मेंढक कभी कभार बाल्टी में बैठकर कुएं के बाहर की दुनिया देख लेते थे । बाकी टीवी और रेडियो पर देश दुनिया के समाचार देख-सुन लेते ।

कुएं की खोंतरों में कुछ चिड़ियों ने भी अपने बसेरे बना लिए थे । सब जीव-जन्तु बड़े मेलजोल के साथ रहते थे । किन्तु जब से कुएं में वोट की बीमारी ने प्रवेश किया तो कुछ मेंढक नेता बन गए । जहाँ नेता हों वहाँ नारा न हो यह भला कैसे हो सकता था । नारे की खोज की गयी ।  कुछ मेंढकों को सूझा कि कुआँ तो मेंढकों का है । यहाँ चिड़ियों का क्या काम ? यहाँ अगर चिड़ियों को रहना है तो उन्हें  टर्र टर्र करना आना चाहिए । लिहाजा उन्होंने नारा बनाया :

मेंढक, चिड़िया, साँप, छँछूदर, या हो कोई बर्र ।

इस कुएं में रहना हो तो, कहना होगा टर्र ॥

आगे की कहानी इतिहास है ।

15 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी पोस्ट पढ़ कर जो मेरी हंसी छूटी है वो अभी तक नहीं रुकी...कमाल की सोच और भाषा...आप सच में जिनिअस हो
    नीरज

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  2. कहीं इस कुंए का नाम मुंबई तो नहीं...

    जय हिंद...

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  3. कभी ना कभी तो सेर को सवा सेर मिलेगा ही। इतिहास गवाह है।

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  4. सर्वे यत्र प्रणेतार:, सर्वे पंडितमानिन:
    सर्वे प्राथभ्यं इच्छितं, तद वृंदम हिआशु नश्यति।।

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  5. अरे विवेक भाई .....मुझे पता नहीं क्यों लगा ...आप ब्लोग्गिंग की बातें कर रहे हो ....यार मैं भी न कुछ समझ नहीं पाता ठीक ठीक ...है न
    अजय कुमार झा

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  6. तो आज कल रोज़ ही पोस्ट लिख रहे हैं मै भी कहूँ ये टर्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र की आवाज कहाँ से आ रही है गहरा व्यंग शुभकामनायें

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  7. जनवरी महिन्ने में सात पोस्ट, मुझे एक भी फ़ीड तक ना मिली ।
    अरे टिप्पणी न देता तो क्या, पढ़ने पे रोक थोड़ेई है ?
    बाकी मेरा सस्नेह टर्र ! ओके, टर्र टर्र !

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  8. Gajab yar Gajab
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