शनिवार, अप्रैल 17, 2010

उठा दो ठेका

 अभी हाल ही में सम्पन्न हाई-स्कूल की परीक्षाओं में हिन्दी विषय में 'ठेकेदारी प्रथा' पर निबंध लिखने को कहा गया । एक परीक्षार्थी ने निबंध तो लिख लिया किन्तु बाकी प्रश्नों के उत्तर न लिख सका । लिहाज़ा उत्तर-पुस्तिका लेकर भाग निकला । हड़कम्प मच गया । कई चपरासी उसके पीछे दौड़ाए गए । इस भाग-दौड़ में उत्तर पुस्तिका रास्ते में गिर गई । दैवयोग से आधा घण्टा हमें उसे पढ़ने का अवसर मिल गया । यहाँ हम अपनी स्मृति के आधार पर वह निबंध प्रस्तुत कर रहे हैं ।

ठेकेदारी प्रथा पर निबंध

प्रस्तावना : यह युग सूचना क्रान्ति का युग है । जब देखिए कहीं न कहीं से ज्ञान की बौछारें पड़ रही हैं । हर आदमी बेचारा ज्ञान से तर-ब-तर होकर इस फ़िराक में है कि ज्ञान से गीली इस नश्वर देह को कहीं ऐसी जगह जाकर सुखा ले जहाँ ज्ञान न हो, पर ऐसी जगह मिले तब न  । ऐसी ज्ञानफुल दुनिया में भला कौन अज्ञानी होगा जो ठेकेदार के नाम से अपरिचित हो । संसार में तारों को तोड़कर पृथ्वी पर लाने के अलावा शायद ही कोई ऐसा कार्य होगा जो ठेकेदार न कर पाया हो । तारे भी नहीं तोड़े तो सिर्फ़ इसलिए कि पृथ्वी इतना ताप कैसे सहेगी भला ?

ठेकेदारी का इतिहास
: ठेकेदारी प्रथा की शुरुआत के बारे में अभी सही सही जानकारी नहीं मिल सकी है कि यह प्रथा कब और किसके द्वारा शुरू की गयी । ठेकेदार संघ का मानना है कि ठेकेदारी की शुरूआत सृष्टि की रचना से भी पहले हो गयी थी जब ब्रह्मा जी को सृष्टि के निर्माण का ठेका मिला था । इसके बाद विष्णु भगवान को, और शिव को क्या ठेके मिले इसे तो सभी जानते ही हैं । हड़प्पा और  मोहनजोदड़ो की खुदाई से मिले मकानों की एक जैसी योजना देखकर भी लगता है कि वहाँ टाउनशिप बनाने का ठेका किसी एक ठेकेदार को ही दिया गया होगा ।
रामायण की ओर नज़र घुमाएं तो पाते हैं कि ऋषि विश्वामित्र ने जब यज्ञ करने का ठेका लिया तो उसकी सुरक्षा का उपठेका राम और लक्ष्मण को दे दिया था । आगे चलकर श्री राम ने सुग्रीव से बाली को मारने का ठेका लिया । सुग्रीव के लिए ठेका देना नई बात थी । आदिवासियों जैसे खून के बदले खून जैसी कई प्रथाएं चल रही हैं उसी तरह उन्होंने ठेके के बदले राम से ठेका ही लिया । सीताजी की खोज का ठेका  ।
भारत में जब अंग्रेजों का दबदबा कायम हुआ तो उन्होंने भी कर वसूलने का ठेका जमींदारों को दे दिया । यहाँ के राजाओं ने अपनी सुरक्षा का ठेका अंग्रेजों को दे दिया ।
ठेकेदारी का महत्व : ठेकेदारी का महत्व इसी बात से पता लग जाता है कि आजकल जो काम असंभव दिखाई पड़ने लगे तो लोग ठेकेदार की शरण में जाते हैं । कोई अपने दुश्मन को टपकाने में असमर्थ है । ठेके पर टपकवा लेता है । किसी की शादी नहीं हो पा रही है तो ठेके पर दुल्हन ले आता है । पत्नी बच्चा पैदा नहीं कर पा रही या नहीं करना चाहती । ठेके पर पैदा करवा लेता है ।
ठेके देने और लेने में कम्पनियाँ भी पीछे नहीं हैं । हमारे देश की निजी  कम्पनियाँ विदेशों में जा जाकर ठेके ले रहीं हैं । वहीं सार्वजनिक कम्पनियों को अपना काम ठेके पर करवाने में सहूलियत हो रही है ।
अगर कोई राजनीतिक दल अप्रत्याशित रूप से चुनाव में जीत जाय और उसका नेता सरकार चलाने के लिये मानसिक रूप से तैयार न हो तो सरकार भी ठेके पर चलवाई जा सकती है । सरकार भी जो काम खुद नहीं कर पाती उसे ठेके पर करवा लेती है ।
विकास की संभावना :
यूँ तो ठेकेदारी प्रथा अपने चरम पर मालूम होती है लेकिन यह सत्य नहीं है । वास्तव में जब तक विश्व में कोई भी कार्य ऐसा है जो ठेके पर नहीं हो रहा है तब तक ठेकेदारों को चैन से न बैठना चाहिये । अगर कोई ठेका देने वाला नहीं तो ऐसे काम का ठेका लेने के लिए कुछ स्वयंभू ठेकेदार सामने आ जाते हैं । हमारे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र धर्म और संस्कृति तो ऐसे ही स्वयंभू ठेकेदारों के दम पर ही चल रहे हैं ।

उपसंहार :
यदि ठेकेदारी के सभी गुणों का वर्णन करने लगें तो जितना कागज कबीर के गुरु के गुण वर्णन लगने में लगा था उससे एक पेज ज्यादा ही लगेगा । ठेकेदारी  प्रथा को ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान मानकर इसका लाभ उठाने वाला ही कलयुग में सफलता प्राप्त करेगा । जैसे हथियारों में ब्रह्मास्त्र श्रेष्ठ है वैसे ही कार्य सम्पन्न करने के साधनों में ठेकेदारी श्रेष्ठ है ।
कैसी बिडम्बना है कि ठेकेदारी के होते हुए इस देश में अभी तक समस्याओं का नामोनिशान बचा हुआ है । क्यों नहीं हर समस्या को हल करने का ठेका एक ठेकेदार को दे दिया जाता ? फिर ठेकेदार जाने और उसका काम जाने । हम चिंता मुक्त हो जाएंगे ।
आतंकवाद की समस्या है ? उठा दो ठेका । नक्सलवाद की समस्या है ? उठा दो ठेका । और तो और, अगर कोई पार्टी चुनाव में बार बार हार जा रही है ? उठा दो ठेका ।

12 टिप्‍पणियां:

  1. दैवयोग से आधा घण्टा हमें उसे पढ़ने का अवसर मिल गया

    -काहे फोटूकॉपी नहीं करवा लिये इत्ती देर में..

    इतना जरुरी मसला..मगर जब आप समझियेगा तब न!! लगे याददाश्त से लिखने! :)

    मस्त रहा!

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  2. ठेकेदारी प्रथा पर कमाल का लेख है !!

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  3. बहुत ही अच्छा लिखा है लगता है ठेके पर लिखे हो ये ठेकेदारी के ऊपर !!

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  4. सोचता हु अपना ब्लॉग भी आपको ठेके पर दे दु.. कित्ता तो मस्त लिखते हो आप..

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  5. कुश जी की तरह मेरा भी मन कर रहा है कि मैं भी आपको ठेका दे दूं लिखने का...

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  6. सोचने का काम भी ठेके पर हो जाए तो अच्‍छा हो जाएगा। सारा पका पकाया मसाला मिल जाएगा। बढिया ठेका पुराण रहा।

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  7. किसी की शादी नहीं हो पा रही है तो ठेके पर दुल्हन ले आता है । पत्नी बच्चा पैदा नहीं कर पा रही या नहीं करना चाहती । ठेके पर पैदा करवा लेता है ।
    अरे बाप रे....
    वेसे टिपण्णी देने का कोई ठेके दार हो तो जरुर बताये!!!

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  8. अगर कोई ठेका देने वाला नहीं तो ऐसे काम का ठेका लेने के लिए कुछ स्वयंभू ठेकेदार सामने आ जाते हैं ।
    बहुत बड़ी बात लिख दी विद्यार्थी ने. पर ठेका हर काम का तो नहीं हो सकता है. आजकल मेरी पत्नी रूठी है मनाने का ठेका किसे दूँ.

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  9. क्या विवेक साहब, हम तो ठेका लिखा देखकर चले आये थे कि चलो टैक्नोलोजी का कुछ फ़ायदा तो हुआ, यहां तो और ही ठेके और ठेकेदारों की बात चल रही है। याद आ गई फ़िल्म प्रतिज्ञा की ’देशी पुलिस की चौकी’ :)
    मजा आ गया पढ़कर।
    आभार

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