गुरुवार, अक्तूबर 16, 2008

बतलावें मंदा

आसमान पर जा टँगे , सब चीजों के भाव ।
सस्ते बस शेयर हुए, सब कर रहे बचाव ।
सब कर रहे बचाव , भूलकर मँहगाई को ।
देखें शेयर सूचकांक के लो हाई को ।
विवेक सिंह यों कहें गरीबों को है फंदा ।
तेज हुई हर चीज मगर बतलावें मंदा ॥

9 टिप्‍पणियां:

  1. भुखमरी हुई तेज़,रोज़गार है मंदा, कोई जिये,कोई मरे,चल रहा नताओ का धंदा। बहुत बढिया विवेक जी।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सामयीक और बेहतरीन रचना ! धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  3. विवेक जी बहुत सही । चार पक्तियां आम आदमी की व्यथा को बयां कर रही है । धन्यवाद बढिया लिखा आपने।

    उत्तर देंहटाएं
  4. स्वप्नलोक में बैठकर मेरा शिष्य विवेक
    मंहगाई की बात पर रहा रोशनी फेंक
    रहा रोशनी फेंक दिखाए सच्ची छवियाँ
    मंदी का बाज़ार और तेजी की गलियां
    ऐसे ही भारत की छवि दिखलाते जाओ
    है मेरा आशीष, नाम तुम खूब कमाओ
    ...:-) ...:-)

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह......गुरु शिष्य दोनों लाजवाब.दोनों की जय हो.लगे रहो.खूब लिखो,बढ़िया लिखो

    उत्तर देंहटाएं
  6. आसमान पर जा टँगे , सब चीजों के भाव ।
    सस्ते बस शेयर हुए, सब कर रहे बचाव ।

    बेहतरीन...लिखते रहें...

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत बढि़या। कम शब्‍दों में भावाभियक्ति।

    उत्तर देंहटाएं

मित्रगण