बुधवार, अक्तूबर 15, 2008

गिरते मार्केट में बृज

ऊधौ इतनी कहियौ जाइ !
कभी भूलकर भी मुरलीधर बृज की ओर न आइ ।
दूध, दही, लाखन कौ माखन गयौ फ्री में खाइ ।
जैसे बाँधि गयौ हो लाके द्वार हमारे गाय ।
माल मारि जा बैठ्यौ मथुरा अब लौटानौ नाइ ?
सीधे सब चुकता कर दे कहुँ कोट कचहरी जाइ ।
विवेक सिंह धमकी सुनि मोहन ठाड़े ते डकराय ।

5 टिप्‍पणियां:

  1. माल मारि जा बैठ्यौ मथुरा अब लौटानौ नाइ ?
    सीधे सब चुकता कर दे कहुँ कोट कचहरी जाइ ।

    बहुत सुंदर भाई ! बधाई !

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  2. विवेक जी ये तो बढ़िया रही।

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  3. thodo makhan moko bhejo
    gay khadi jo dware
    agar churaya makhan jo
    maiyaa mare thaake

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  4. आप मेरे ब्लॉग पर आए. अच्छा लगा. क्या कहूं -
    "आंसू तो बहुत से हैं,आंखों में जिगर लेकिन
    बिंध जाए सो मोती है,रह जाए सो दाना है."

    फिर से एक बार पढ़ कर कुछ अच्छा भी लिख दीजिये.

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