बुधवार, अगस्त 04, 2010

तुम्हारी बात में दम तो है

ईश्वर का आविष्कार कब और किसने किया यह तो ठीक ठीक ज्ञात नहीं हो सका है पर इतना अवश्य देखने में आता है कि यह आविष्कार मानव के लिए किसी भी अन्य आविष्कार से उपयोगी सिद्ध हुआ है । एक तरह से यह मनुष्य के लिए वरदान है । ज्ञात इतिहास में तो खैर किसी न किसी रूप में ईश्वर का जिक्र मिल ही जाता है पर प्रागैतिहासिक काल में जब ईश्वर का आविष्कार नहीं हुआ होगा तब लोग अपने किसी प्रियजन की मृत्यु पर किसे दोषी ठहराते होंगे ? अनसुलझे रहस्यों का बोझ किसके सिर डालते होंगे ? क्या उस जमाने में लोग ज्यादा टेंशन लेते होंगे ? अगर ऐसा होता तो आज भी मनुष्य के अलावा अन्य प्राणियों को आदमी से ज्यादा टेंशन में रहना चाहिए । पर ऐसा दिखता तो है नहीं । तो क्या ईश्वर का आविष्कार निष्फल गया ? या अन्य प्राणियों ने हमारे ईश्वर से  भी अच्छे किसी ईश्वर के बारे में जान लिया है ?

जो भी हो, यह एक ऐसा विषय है जिसके बारे में कोई भी कुछ भी धारणा बना सकता है । कोई कह देता है कि मैं ही ईश्वर हूँ । कोई कहता है कि मैं ईश्वर का पुत्र हूँ या कोई कहता है कि मैं ईश्वर का दूत हूँ । जिस ईश्वर का अभी तक पक्के तौर पर पता ही नहीं है उसकी  निन्दा के अपराध में न जाने कितने व्यक्तियों को मौत की सजा अब तक मिल चुकी होगी । उस ईश्वर के नाम पर शपथ लेकर लोग देश पर राज किये जा रहे हैं । लूट भी रहे हैं देश को । यह ऐसा विषय है जिस पर बहुत सारे नए नए तरीकों से सोचा गया लेकिन मूल धारणा वही रही है । भक्ति आंदोलन, धर्मयुद्ध और भी न जाने क्या क्या होता जा रहा है ।

इसी तरह जब आज सुबह का अखबार देखा तो पत्नी ने उसमें २२ युवाओं के मरने की खबर पढ़ी जो गंगोत्री काँवड़ लेने गए थे । यह समाचार पढ़कर उसका प्रश्न था कि यदि भगवान है तो वह इस तरह के हादसों को रोकता क्यों नहीं है ? पहले तो मुझे उसे भगवान के होने पर संदेह करते हुए बड़ा आश्चर्य हुआ । वह जो हमारे मुख से भगवान के प्रति कोई संदेहास्पद बयान सुनते ही नाराज हो जाती है कैसे स्वयं उस पर संदेह कर रही है । फिर हमने भी मौका देखकर अपनी थियोरी सुना दी उसे : " हो सकता है कि मरने के बाद कोई बहुत अच्छी स्थिति होती हो । वहाँ जाकर व्यक्ति महसूस करता हो कि "अरे ! मैं कहाँ वहाँ फालतू के चक्कर में पड़ा था ? पहले क्यों नहीं मरा मैं ?" हो सकता है जीव को मरने से बचने का प्रयास करते देखकर ईश्वर को हँसी आ जाती हो कि देखो कैसा मूर्ख है ? इसको पता ही नहीं कि मरने के बाद कितना आनंद  है ।"

यह सुनकर पत्नी का प्रश्न था कि फिर ईश्वर जीव को बता क्यों नहीं देते कि मरने से न डरो । मरने के बाद तो बहुत आनंद है ।

हमने समझाया कि यदि ऐसा हो जाय तो हो सकता है सभी मरने के लिए दौड़ पड़ें और सृष्टि का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाय । हो सकता है कि ईश्वर ने हमें इस शरीर में किसी अपराध में कैद करके रखा हो कि तुम्हें इतने साल की कैद है ।

पत्नी ने कहा, " तुम्हारी बात में दम तो है ।"

16 टिप्‍पणियां:

  1. भाभी जी को अपनी बातों से अच्छा घुमा लेते हैं.. :)

    उत्तर देंहटाएं
  2. आज तो वाकई आपकी बात में दम है ! हा....हा....हा....हा....
    मगर वाकई मरने जीने पर आपके विचारों ने दिमाग हिला कर रख दिया ! बढ़िया मस्त पोस्ट के लिए शुभकामनायें !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया... एक गंभीर चिंतन के विषय को व्यंग के चोले में बड़ी खूबी से कह दिया आपने.

    उत्तर देंहटाएं
  4. हंसी तब और ज्यादा आती है जब पढ़ा-लिखर वर्ग ईश्वर की चाकरी में खुद को तृप्त महसूस करता है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. जब मरुंगा तो आ कर बताऊंगा असल बात अभी मुझे नही पता.... तब तक भाभी जी की हां मै हां:)

    उत्तर देंहटाएं
  6. पत्नी ने सही तो कहा, " तुम्हारी बात में दम तो है ।"

    उत्तर देंहटाएं
  7. एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

    उत्तर देंहटाएं
  8. बात में दम तो पक्का है. ईश्वर की कसम.

    उत्तर देंहटाएं
  9. "प्रागैतिहासिक काल में जब ईश्वर का आविष्कार नहीं हुआ होगा तब लोग अपने किसी प्रियजन की मृत्यु पर किसे दोषी ठहराते होंगे ?"
    यह तो खुदा जाने :)

    उत्तर देंहटाएं

मित्रगण