मंगलवार, जुलाई 13, 2010

किसी को ताव आया, किसी को मानसून भाया

पिछ्ली पोस्ट में हमने आपको बताया था कि एक और अंग्रेजी कविता लिखने का प्रयास जारी था । वह कविता आखिर हमने लिख ही डाली है । बच्चे को रटने हेतु लिखकर देदी गयी है । आपको भी एक प्रति उपलब्ध करायी जा रही है ।

पिछली पोस्ट पर अंग्रेजी कविता पढ़कर श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी को ताव आ गया था । लिहाजा उन्होंने कविता का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत कर दिया, वह ऐसा जिसे पढ़कर हम उनके भक्त हो गए हैं ।

वास्तव में अंग्रेजी पोस्ट ठेलते समय हमारे मन में थोड़ी झिझक अवश्य थी और हमने भी उसका हिन्दी अनुवाद छापने का मन बनाया था । लेकिन कविता का कविता में ही अनुवाद करना वह भी बिना मूलभाव को बदले हमसे न हो सका ।

वह तो भला हो त्रिपाठी जी के ताव का जो उनसे ऐसी सुन्दर कविता लिखवा डाली । वैसे हमें विश्वास नहीं होता कि अंग्रेजी कविता पढ़कर किसी को ताव(बुखार) आ सकता है और उसके कारण आदमी अनुवाद करने लग जाता है । अवश्य ही ताव आने का कारण रात को देर तक जागना रहा होगा जिसके त्रिपाठी जी अभ्यस्त नहीं हैं ।

पर इस सबसे आपको क्या आप तो कविता पढ़िये । लेकिन पहले पिछली पोस्ट पर ठेली गयी अंग्रेजी कविता का त्रिपाठी जी द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है :

गलती मेरी नहीं है काफी

प्रभुजी दे दो फिर भी माफी

मैं गरीब तू बड़ा महान

भाग्यविधाता लूँ मैं मान



पर इतना तुम रखना ध्यान

नर, नाहर, बिल्ली और श्वान

सबको रखता एक समान

मौन प्रहार करे भगवान



जिसने परपीड़ा पहुँचाई

वह अभिशप्त रहेगा भाई

निर्बल को मारन है पाप

दुनिया कहती सुन लो आप



सुन उपदेश शिकारी भड़का

ले बन्दूक जोर से कड़का

धाँय-धाँय... पर नहीं तड़पना

शुक्र खुदा का यह था सपना



अब अंग्रेजी की दूसरी कविता :



We were waiting for monsoon,
asking,"Is it late or soon ?"
In temples, farmers worshipped.
Finally it arrived.

Then the rainy season came.
Sun played a hide and seek game.
clouds called the wind to help.
Sun too surrendered himself.

It began a heavy rain,
that stopped the bus and train.
All around water filled.
Elders worried, children thrilled.

शायद फिर किसी को ताव आ जाए तो एक और कविता मिले हिन्दी को ।

12 टिप्‍पणियां:

  1. सही है तुम अंग्रेजी लिखे जाओ.. ताव में हिंदी होती रहेगी..

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  2. त्रिपाठी जी ने अच्‍छा अनुवाद किया .. आप दोनो को बधाई !!

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  3. दोनों कविता पढ़ी ,ताव यूँ ही आता रहे और हिंदी भाषा में बदलता रहे ...दोनों ही बेहतरीन हैं

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  4. यह अब ताव खाने का नहीं बल्कि ‘समस्या पूर्ति’ का खेल खेलने का मजा दे रहा है। यह लीजिए पहली चार लाइनें...

    देख रहे थे नैन बिछाए मानसून की राह
    देरी होगी या जल्दी ही होगा जलद प्रवाह
    मन्दिर मन्दिर माथा टेके हो करबद्ध किसान
    मानसून ने तान दिया लो नभ मेँ नीर वितान

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  5. और ये रही बाकी कविता.. :)

    वर्षा ऋतु छम-छम कर आयी
    लुका-छिपी सूरज को भायी
    मेघ पवन की करें गुहार
    दिनकर करें समर्पण हार

    मूसल धार मेघ जब बरसें
    रुकी रेल ठहरी सब बसें
    जल में डूब गया घर-आंगन
    वृद्ध व्यथित, पुलकित है बचपन

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  6. चलिए भाव-ताव के कारण परिणाम तो अच्छा ही मिला।

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  7. भाव ओत ताव किसी भी भाषा मै लो हम टिपण्णी तो हिन्दी मै ही देगे

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  8. ाब तो दो दो कवितायें पढने को मिलेंगी। अनुवाद बहुत अच्छा लगा। इसका ये मतलव नही कि आपकी कविता अच्छी नही मगर हम थोडे अनपढ टाईप है। शुभकामनायें

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  9. हमेशा की तरह मस्त ... शुभकामनायें !

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