रविवार, अगस्त 16, 2009

कहाँ से कहाँ आ गये

16 अगस्त 1999 को जब SRF Ltd. भिवाड़ी (राजस्थान) में नौकरी शुरू की थी तो शुरु के दिनों में आठ घण्टे एक जगह पर बिताना बड़ा मुश्किल लगता था । लेकिन जब आज नौकरी करते दस साल हो गए हैं तो लगता है जैसे वह कल की ही बात हो ।

1999 का साल मेरे लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण था । इसी वर्ष पहले डिप्लोमा की पढ़ाई पूरी की, अभी परीक्षा का परिणाम भी न आने पाया था कि शादी करा दी गयी । 4 मई को परीक्षा सम्पन्न और 12 मई को शादी ।

तत्पश्चात अगस्त माह से नौकरी के फेर में पड़े तो पड़े ही हुए हैं । इस दौरान दो बच्चों का बाप भी बन गया ।

लगभग तीन साल चेन्नई में भी नौकरी की । अब इण्डियन ऑइल में हूँ और शायद यहीं रहूँ । इण्डियन ऑइल अपना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष मना रहा है । छ: महीने चलने वाले समारोहों की श्रंखला में आज मिनी मैराथन दौड़ का आयोजन था । सुबह-सुबह ही 5 किलोमीटर की दौड़ 20 मिनट में पूरी की तो सुखद आश्चर्य हुआ कि दस साल प्रदूषण झेलने के बावजूद अभी भी काफी स्टेमिना बचा हुआ है । हमारा कोई नम्बर नहीं आया तो क्या हुआ 18-45 आयु वर्ग के जहाँ 300 लोग दौड़ रहे थे वहाँ पहले पचास में आकर भी हम कम खुश नहीं । पत्नी जी महिलाओं के अपने वर्ग में पाँचवें स्थान पर रही ।

जब लड़के को पता चला कि पापा पचास में और मम्मी पाँच में तो उसका हँस हँसकर बुरा हाल है । हमें शर्मिन्दा करने की पूरी कोशिश में है । पर हम शर्मिन्दा हो ही नहीं पा रहे । उसको समझाएं भी कैसे कि किस तरह पुरुषों और महिलाओं के वर्ग अलग अलग थे । इनकी तुलना नहीं की जा सकती । बस परसाई जी के मुताबिक 'अशुद्ध बेवकूफ' बनकर लड़के को खुश होने दे रहे हैं ।

अज्ञानता का भी अपना अलग मजा है । ज्ञान होने पर या तो मज़ा जाता रहता है या कम हो जाता है । फिल्मों को ही ले लीजिए । जब तक मालूम नहीं था कि ये फिल्में सच नहीं होतीं तब तक फिल्म देखने का अलग मजा था । लेकिन अब तो शाहरुख खान को अगर नहीं पहचाना तो बहुत बड़ी बात हो जाती है । अमेरिका वालों से यही चूक हो गई है । हम तो इस बात पर आश्चर्यचकित हैं कि अमेरिका में ऐसे लोगों को नौकरी पर कैसे रख लिया गया जो शाहरुख खान को नहीं जानते ।

अब अगर शाहरुख खान, जिन्हें ग्यारह मुल्कों की पुलिस जानती है, को अमेरिका वाले नहीं पहचानते तो स्वत: ही महान मुल्कों की लिस्ट में अमेरिका का नाम नीचे खिसककर बारहवें स्थान पर तो कम से कम आ ही जाना चाहिये । हमारे विचार से बेचारे अमेरिका के लिए इतनी सजा काफी है अब शाहरुख अमेरिका को माफ कर दें तो हमें कोई आपत्ति न होगी । आपको हो तो दर्ज करा दें ।

अब देखिए तो हम भटकते हुए कहाँ से कहाँ आ गये ?

11 टिप्‍पणियां:

  1. बधाई पहिले पचास में आने के लिये। जितनी सुधार की गुंजाइश अभी तुम्हारे पास है तुम्हारी श्रीमतीजी के पास उसके मुकाबले बहुत् कम है। शाहरुख खान को अमेरिका वाले नहीं पहचान पाये इससे उनको निराश नहीं होना चाहिये। हमको भी कौन पहचानती है वहां की पुलिस!

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  2. आपने तो --
    छोडिये भी क्या यह सच है (!!) कि आप पचास मे थे और आपकी पत्नी पाचवे मे स्थान पा गयी. हद है भाई थोडा और तेज़ दौड लेते.
    अमेरिका बारहवे स्थान पर आ गया है जानकर अच्छा लगा.

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  3. दौड़ने का और दौड़ाने का हमारा रिकार्ड रहा है। हमारे अपने वर्ग में तो कोई भी हम से शर्त नहीं लगाता। दोनों पति-पत्नी अपनी क्षमता ऐसे ही बनाए रखें।

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  4. भाभी जी को congratulation ....भाई वो पहले पांच में जो आई हैं :)

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  5. बधाई पहले पचास में आने के लिए... :)

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  6. बधाई दम्पत्ति को -पांच और पचास की

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  7. मुझे पहली लाइन ने ही अटका लिया..
    मामला यह है...कि..
    यह नाचीज़ भी ९४ के साल में SRF Ltd. भिवाडी़ में डिप्लोमा और एक साल की अप्रेन्टिस के बाद नौकरी कर रहा था...साल के अंत तक रहा....
    धारूहेडा़ में कमरा लेकर रहा था...
    इंस्ट्रूमेंटेशन में था...उस वक्त संयंत्र का नया एक्सटेंशन प्लान हो रहा था...उसी में हमें भी डाल दिया गया था...
    हम तीन थे...मैं..प्रतुल गुप्ता...बालकिशन शर्मा...
    अभी तक तो शायद कोई नहीं हो...

    वहां का HF Acid का डर....घुसते ही दांयी तरफ़ की केण्टीन...सिगरेट...बॉर्डर की सस्ताई...

    आपने यादें ताज़ा कर दी....शुक्रिया

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  8. बधाई स्टेमिना बरकरार रखने की. जरा और मेहनत किया करो.

    रामराम.

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  9. ये बुरी आदत है.. भटक जाते है..

    आप ५ किमी दौड आये.. हिम्मत का काम है... अंदर की बात ये है कि हम १९९८ में २०० मीटर दौडे़ थे.. औकात से ज्यादा तेज भाग लिये.. १०० मीटर बाद दम फूल गया.. बहार पब्लिक देख रही थी.. गिर गये तो इज्जत का फलुदा बनना तय था.. जैसे तैसे २०० मीटर पार किया.. लगा कि हम ही जीते है..

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