गुरुवार, जुलाई 23, 2009

गोत्र प्रकरण क्या है

गोत्र प्रकरण गाहे बगाहे सुर्खियों में आता रहा है । अक्सर इस तरह के मामलों में विवाद की जड़ तक कम ही लोग पहुँच पाते हैं । यह मुद्दा जाट समुदाय से संबन्धित है ।

जिस तरह भारतीय समाज वर्णों में, वर्ण जातियों में विभाजित हुए वैसे ही जातियाँ भी उपजातियों में विभाजित हुईं । जाट भारतीय समाज में क्षत्रिय वर्ण के अन्तर्गत एक वीर और साहसी जाति मानी जाती है । यह हरयाणा के अलावा राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहुसंख्या में है । जाट समुदाय में उपजातियों, जिन्हें गोत्र भी कहा जाता है, की संख्या 360 मानी गयी है । गोत्र का किसी उपगोत्र में विभाजन देखने को नहीं मिलता . अत: एक गोत्र के लोग सैद्धान्तिक रूप से एक परिवार और वंश परंपरा के माने जाते हैं . इस स्थिति में एक ही गोत्र के लड़के-लड़की के विवाह की बात करना जैसे सगे भाई बहन के विवाह की बात करना है . इस तरह के विवाद नगण्य ही हुए हैं .

अब सवाल उठता है कि फ़िर गोत्र विवाह विवाद क्या है ? दर असल जाट समुदाय के कुछ गोत्रों में भाई चारा प्रचलित है . अर्थात कुछ गोत्र समूह मानते हैं कि वे मूल रूप से एक ही वंशावली से संबन्ध रखते हैं और एक ही मूल गोत्र से उनका उद्गम हुआ है . इस स्थिति में वे भी आपस में विवाह संबन्ध स्थापित नहीं करते . पर नये जमाने में जहाँ लोग अपने सगे भाई तक को नहीं पहचानते वहाँ गोत्र किसको याद है लिहाजा लोग अज्ञानतावश भाई चारे के गोत्र से विवाह सम्बन्ध स्थापित कर बैठते हैं . पर जब यह मामला परंपरावादियों की निगाह में आता है तो बखेड़ा खड़ा हो जाता है . यही पहली तरह का गोत्र विवाह विवाद है .

पहले समय में अक्सर एक गावँ में एक ही गोत्र के लोग रहते थे, बल्कि आसपास के बहुत से गावँ भी उसी गोत्र के होते थे . पर जैसे जैसे समय बीता लोगों को एक ही जगह टिककर जीवन यापन कर पाना कठिन लगने लगा, लिहाजा गावँ में धीरे धीरे कई गोत्रों के लोग आकर बस गए . समझ लीजिये 'क' गोत्र बाहुल्य गावँ में 'ख' गोत्र के कुछ लोग आकर रहने लगे . अब यदि इस गावँ का 'ख' गोत्र वाला लड़का किसी दूसरे गावँ से ( एक ही गावँ में विवाह नहीं हो सकता ) 'क' गोत्र की लड़की से विवाह करके ले आया तो . गावँ में मौजूद 'क' गोत्र के लोगों के सामने विषम स्थिति आ जाती है कि वे लड़की को जो उन्हीं के गोत्र की है बहन समझें या भाभी समझें . इसी स्थिति से बचने के लिये . यह विवाह भी अमान्य होता है . आजकल इसी तरह के विवाद अधिक संख्या में देखने को मिलते हैं .

इसके अलावा कुछ गोत्र ऊँचे और कुछ नीचे समझे जाते हैं . ऊँचे गोत्र वाला लड़का नीचे गोत्र वाली लड़की से तो विवाह कर सकता है पर ऊपर के गोत्र वाली लड़की से नहीं . यह भी विवाद का कारण बनता है .

दरअसल ऐसे विवाद पैदा होते ही तथाकथित मानवाधिकारवादी और मीडिया वाले इसे सुर्खियाँ बटोरने का सुनहरा मौका समझते हैं और अपने अपने तर्कों से इसे हवा देते रहते हैं . जमीनी हकीकत को समझने के लिये कोई तैयार नहीं . शासन में भी जाटों का उचित प्रतिनिधित्व न होने के कारण शासन की नीतियाँ भी कभी कभी इस हकीकत को ध्यान में न रखकर बना दी जाती हैं .

अब तो बस जाटों के पास एक ही उपाय बचा है कि वे अमेरिका के लोगों को मनायें कि वे भी गोत्र विवाह पर रोक लगा दें . फ़िर देखिये कैसे दूसरे दिन ही यहाँ भी वही रूल फ़ॉलो होता है .

27 टिप्‍पणियां:

  1. पहले बताते तो हिलेरी क्लिंटनजी से बात करके यहीं निपटा लेते। लेकिन तब तुम पंखे की सगाई में लगे रहे। वैसे उस पंखे का गोत्र क्या है?

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  2. बड़ा ताऊवादी मामला है। वैसे 13 पीढ़ियों के उपरांत गोत्रों का पु्नर्निर्धारण हो जाना चाहिए।

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  3. बात तो बड़ी गंभीर लाये हो जी.. बाई द वे पंखे का गोत्र बताया नहीं आपने..

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  4. @ अनूप जी, कुश जी,

    पंखे का गोत्र POLAR है कोई अच्छी पंखी मिले तो रिश्ता करवाइये :)

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  5. गोत्र बोले तो काऊ क्लैन -छोटे छोटे प्राचीन समुदाय जिनके पास अपनी छोटी बड़ी गौशलाएं होती थी -बाद में इनकी वह पहचान बन गयी -फला गोत्र वाले और फला वाले -अब जातिगत शुद्धता भी तो कोई चीज हैं ना -यह आनुवाशिकी सिद्ध कर चुकी है की सगोत्री शादियाँ विकृतियों को जन्म देती है !

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  6. गोत्र एक टाईप की चीज है.प्रयोग पहले के जमाने में एक कुल की पहचान के लिए..शादी के लिए किया जाता है....फिलहाल ज़माना बदल गया है न ..तो अब इसका प्रयोग ...वोटों के लिए ..वोटबैंक बनाने के लिए...इसके नाम पर पंचायत करने और लोगों को खासकर ..उन्हें प्रताडित करने के लिए जा रहा है...पता नहीं इसके आगे कितने नए यूज देखने को मिलें....

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  7. हमारे यहाँ भी ये गोत्र वाला बवाल खूब है....इसी चक्कर में खूब रिश्ते टूटते देखे

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  8. गोत्र रक्तसंबंधों में विवाह न हो पाये और विकृत संतानें न उत्पन्न हों इससे लिये हमारे यहां यह प्राचीन व्यवस्था है।

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  9. गोत्र का विचार तो हर जगह होता है शादी विवाह में । अब अरविन्द जी वैज्ञानिक तथ्य भी बता दिये तो शेष क्या ?

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  10. गोत्र व्यवस्था पर विस्तृत प्रकाश डालने पर आभार.. हमारी जानकारी में वृद्धी हुई.. आभार..

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  11. ओ भाई साहब,
    इसमें सिंपल लौजिक यह है कि किसी जोड़े ने अपनी मर्ज़ी से यदि यह सोचकर शादी करने की कोशिश की अपन तो सेम कास्ट के हैं नो प्राब्लम । तब भी अम्मा बाबू उसमें गोत्र की उंगली कर ही देंगे और अम्मा बाबू साथ नहीं तो समाज साथ नहीं। हा हा इससे अच्छा है शादी करने की जगह ले के भागने का सिस्टम होना चाहिए था। फ़ालतू के डम्फ़ान से छुटकारा रहता ।

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  12. "गो" का अर्थ यहाँ पर गाय नहीं है। "गो" शब्द का यहाँ पर अर्थ है इन्द्रियां ! संयम हेतु ऋषि-गण जिन्हें जिन्हें अपनें-अपनें तरीके से शिक्षा देते थे, तो उन -उन ऋषिओं के नाम से गोत्र कहलाये।
    जैसे - अत्रि, कश्यप, शांडिल्य, गर्ग आदि - आदि !

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  13. बहुत दिनों के बाद एक गंभीर विषय ...........आत्म विश्वास से भरपूर एक अच्छा आलेख।

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  14. गोत्र व्यवस्था उचित है. कम से कम कुछ तो सामाजिक मर्यादायें बनी और बची रहनी चाहिये.

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  15. भाई अरविंद मिश्राजी ने व्यवस्था देदी है तो उनकी बात का समर्थन करते हैं और वैसे हमारे लोकसभा सद्स्य भी जाट ही हैं तो कोनू चिंता नही है.

    रामराम.

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  16. गोत्र व्यवस्था का एक साइंटिफिक पहलु ये भी है की एक ही परिवार ओर जींस में हुई शादी से कुछ ऐसे रोगों की संभावना शिशु में ज्यादा बढ़ जाती है ....आजकल कितने गोत्र कितने नजदीक है ये तो शायद अन्थ्रोपोलोजिस्ट ज्यादा अच्छी तरह से बता सकेगे .....पर किसी भी तरह से कानून को हाथ में लेना ओर एक व्यक्ति की जान लेना कही भी न्यायोचित नहीं है.......

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  17. गोत्र व्यवस्था हमारे पूर्वजों की विलक्षण मति का परिणाम है। जिसके महत्व को आज के युग में वैज्ञानिक भी स्वीकार कर चुके हैं। दिवाकर प्रताप जी ने "गो" शब्द की बिल्कुल सही व्याख्या की।

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  18. गोत्र की दो परम्पराएँ प्रचिलित हैं [१] ऋषि कुल गोत्र परंपरा :--- एक ही ऋषि आश्रम से शिक्षा प्राप्त दो लोग गुरु भाई माने जाते रहे हैं और सामान्यता एक वंशावली के लोग एक ही गुरु-कुल से शिक्षा प्राप्त करते रहे थे अतः ऋषि कुल गोत्र ही उस वंशावाली का भी गोत्र हो जाया करते थे | अगर आप वैदिक अध्ययन की परम्परा के विषय में जानते हैं तो इसे समझना ज्यादा आसन हो जाता है , वेद पाठ की हर ऋषि कुल की अपनी विवेचानाये और विशिष्ट शैली होती थी ,और कुछ विशिष्ट अंशो पर विशेषज्ञता होती थी जो गोपन होती थी जिसे वे श्रुत पद्धति से अपने शिष्यों को ही देते थे , तथा उसकाल में सर्वश्रेष्ठ सम्पति पशु धन माना जाता था ,ऋषियों के आश्रम में हाथी घोडों का क्या काम अतः गौ प्रधान पशु था वैसे जन सामान्य में भी यही श्रेष्ठ होता था | शिष्य ही इनकी देखभाल करे थे | दिवाकर प्रताप सिंह ने इनका उल्लेख किया है |
    [२] वंश पुरुष के नाम पर चलने वाले गोत्र , यह पौराणिक काल में विशेष रूप से वेदान्तिक युग आरंभ होने के पश्चात् ज्यादा लोकप्रिय हुए जैसे इच्छ्वाकु वंश ,रघुवंश ,पुरु या कुरु वंश ,ययाति वंश ,यदु वंश आदि ,

    जाट वास्तव में चन्द्र वंशीय क्षत्री ययाति के ही वंशज है और जाट उसी प्रकार ययाति का अपभ्रंश है जिस प्रकार यज्ञ का जग्य | पंजाब के सिक्ख जाट ,पाकिस्तान के मुसलिम जाट सभी उसी वंश परंपरा के हैं |
    द्विवेदी जी ने १३ पीढी बाद पुनः निर्धारण की बात कही है , ये तब है जब केवल गोत्र का ही विचार और भेद रखा जाये ;परन्तु यदि पिंड [ मातृ पक्ष ] का भी विचार तीन पीढी तक रखा जाये तो , ७ वीं पीढी तक वंश के ' गुण - सूत्रों ' [ जेनेटिक्स ] में इतना अंतर आजायेगा की आगे एक नया गोत्र आरंभ किया जा सकता है और पूर्व मूल गोत्र में सम्बन्ध किये जा सकते हैं |

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  19. इसी लॉजिक का विस्तार ये है कि समान जाति में शादियां नहीं होनी चाहिए। एस आनंद ने अपनी चर्चित किताब ब्राह्मण एंड क्रिकेट में बाबा साहब आंबेडकर को कोट किया है कि भारतीय और दक्षिण एशियाई लोग शारीरिक रूप से कमजोर इसलिए हैं क्योंकि इस इलाके में जातिवाद के असर की वजह से छोटे समूहों में इन-ब्रिडिंग होती रही है। इस वजह से भारत में 100 में 90 लोग अपने देश की सेना के लिए तय किए गए शारीरिक मापदंडों में फिट नहीं हो पाते। एस आनंद ने इस किताब में इस बात की व्याख्या की है कि जिस खेल में भी शारीरिक दमखम की जरूरत होती है वहां भारत पीछे है। फुटबॉल में 150वें स्थान के नीचे। ओलिंपिक्स में लगभग नदारद। बॉस्केटबॉल में सिरे से गायब। ये किताब आप लोगों को देखनी चाहिए। इसमें राजदीप सरदेसाई और आशीष नंदी की राय का भी समावेश है। इस पर आउटलुक में शायद एक कवर स्टोरी भी हो चुकी है। हिंदी में इस बारे में चर्चा होते ही जातिवादी लोग फाउल-फाउल का शोर मचाकर खेल रोक देते हैं।

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  20. आज विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि सगोत्र में शादियाँ होने से विकृतियां पैदा होती हैं .. पर जबतब वे नहीं समझ सके होंगे .. पूर्वजों को तो जमकर गालियां दी होंगी .. कि वे अंधविश्‍वास फैला रहे हैं .. क्‍या आज के वैज्ञानिकों के लिए आश्‍चर्य की बात नहीं .. कि जिस युग में विज्ञान नहीं था .. यह बात पूर्वज कैसे सोंच पाएं ?

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  21. सही कह रही हैं आप। सगोत्र ही नहीं, सजातीय शादियों में भी लगभग वैसी ही समस्याएं हैं। कमजोर नस्ल, अक्षम मानस। इनसे बनता है दुनिया के सबसे गरीब और सबसे ज्यादा अशिक्षित देशों में एक। लगभग दो हजार साल में एक भी विश्वस्तरीय वैज्ञानिक आविष्कार नहीं (खुश होने के लिए ये कहना काफी नहीं है कि शून्य की कल्पना सबसे पहले इसी महान धरा पर हुई थी)। साइबर कूलियों का देश। सबसे ज्यादा अंधों का देश। ओलंपिक मेडल टैली में शर्मनाक सी कोई जगह या अक्सर टैली से गायब। ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में सबसे नीचे की एक जगह। कहीं कुछ तो गड़बड़ है हमारे इस महान आर्यावर्त में। गोत्र, जाति, वर्ण जैसी सामाजिक संरचनाओं में इसके कारण हो सकते हैं क्योंकि यही हमारे देश में विशिष्ट है।

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  22. अगर मूल तक जाएं तो सभी आदम और हव्वा की संतान हुए और सभी भाई-बहन। इसलिए वकील साहब की बात में कानूनी दम लगता है कि तेरह पीढी़ के बात खून पानी हो जाता है:)

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  23. गोत्र प्रकरण के विषय में विस्तार से जानकारी का आभार..

    हर बार की तरह इस बार भी देर? हिलरी आई और गई और आप साहित्य रचते रहे..बात कर लिए होते..समाधान निकल जाता. खैर, मंदी के बाद फुरसत होते ही अमरीका से बात की जायेगी.

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  24. विवेकजी आज क्या हो गया आपको एकदम खालिस गम्भीर विशय् हमारे यहाँ हिमाचल् मे भी गोत्र को बहुत वरीयता दी जाती है अनियनियोस्ति प्रतापजी वत्स जी तथा अन्य लोगों ने जो बताया है वो बिलकुल सही है हमरे यहाँ तो नानके और दादके गाँव मे भी शादी नहीं होती चाहे लोग इसे वहम मानते हों मगर जसे डा.अनुराग जि ने बतया हैऐस से ये सि्द्ध होता है कि कुछ बातों को हम वहम कह कर टाल देते हैं जब्कि उसका कोई साईँटिफिक कारण होता है बहुत बडिया आलेख आभार

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  25. विषय नि:संदेह बहुत बढिया है और सोने पर सुहागा है दिलीप मंडल कि टिप्पणी. भारतीय पुरुष मानसिक तौर पर जीवन भर अपने घर वालों का पप्पू/मुन्ना/चिंटू/पिंटू बना रहता है.

    इन-ब्रीडिंग को रोकने में गोत्र सहायक है, माना लेकिन मूलत: भारतीय लोग बस सांस्कृतिक विविधता में एकता की बातें ही करते हैं – वो अपनी भाषा या जाति के वालों के बाहर रोटी-बेटी का रिश्ता नहीं बनाते तो काहे कि विविधता? और इसका जिक्र आने पर ही हमारे अंदर का ओर्थोडॉक्स जाग जाता है. अगर गोत्र में विवाह करने पर टेंशन है, तो जाती के बाहर विवाह करने पर उससे अधिक टेंशन क्यों है? वहां तो इनब्रीडिंग का कोई खतरा नही है ना!

    लडकी “ए” से इसलिये प्यार मत कर बैठो कि वह तुम्हारे गोत्र की है.

    लडकी “बी” से इसलिये प्यार मत कर बैठो कि वह तुम्हारी जात की नही है.

    लडकी “सी” से इसलिये प्यार मत कर बैठो कि उसकी-तुम्हारी कुंडली नहीं मिलती.

    लडकी “डी” से इसलिये प्यार मत कर बैठो कि उसकी हैसियत हमसे बहुत कम है.

    लडकी “ई” का परिवार हमें घास नही डालेगा, उसकी हैसियत हमसे बहुत अधिक है.

    लडकी “फ़” बहुत कम पढी-लिखी है.

    लडकी “जी” कम सुंदर है.

    बहुत लंबी है लिस्ट .. मां-बाप को जब जो कारण कंविनियंट लगा पेल दिया. ये बिमारी भारतीय मुस्लिमों और सिखों मे भी फ़ैली है.

    बाहर वाले तो फ़िर बाहर वाले हैं, अगर अपनी पसंद से शादी की तो घर वाले जीना हराम कर देंगे. फ़िर हम रोते हैं की कन्या भ्रूण हत्याएं होती हैं, बहुएं जलाई जाती हैं आदी!

    इधर विदेश में आए मूंग की दाल पर पले अगर किसी अनिवासी भारतीय का डील-डौल देखो तो सींकिया महाराज को कोई गोरी/काली/ घास नही डाल रही होती, १०० मे से ९० “श्रीमान अपना हाथ जगन्नाथ” भारतीय मेट्रिमोनी साईट्स से जाति के आधार पर फ़ोटो चुन चुन के मम्मी को भेज रहे होते हैं और अंतत: मम्मी अपनी पसंद का दहेज लाने वाली से अपने पप्पू/मुन्ना/चिंटू/पिंटू कि शादी करवा देती है! :D

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  26. धर्म ,जाति, गोत्र की दीवारे गिराना फैशन हो गया है . लेकिन उसके रोकने का तरीका बहुत बीभत्स है .

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  27. आपकी बात से सहमत कि सगोत्रीय लड़के लड़की में विवाह नहीं होना चाहिए लेकिन यदि एक ही गांव में दो अलग अलग गोत्रों के लोग निवास करते है तो उनमे वैवाहिक संबंधो में अड़चन नहीं आनी चाहिए |

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