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बुधवार, दिसंबर 24, 2008

ज्ञानदत्त जी से प्रेरित

दिन भर कोई काम न करना ।
आप ऊबने से मत डरना ।
काम करो तो करना धीमे ।
होता है बस सृजन इसीमें ।
सृजन तेज ना हो पाएगा ।
सारा कार्य व्यर्थ जाएगा ।
ऊब ऊब कर महान बनना ।
होकर बोर गर्व से तनना ।
अरे आज की पीढी जागो ।
आप ऊबने से मत भागो ॥

बुधवार, दिसंबर 17, 2008

गुरु-शिष्य परम्परा और अफजल गुरु

एक बार परीक्षा में गुरु शिष्य परम्परा पर निबंध लिखने को कहा गया । हमने एक उत्तर पुस्तिका से एक नमूना उठाकर यहाँ पेश किया है .
" भारत में गुरु शिष्य परम्परा बहुत पुरानी है । यहाँ पर गुरुओं का आदर किया जाता है . हम भी अपने मास्साब का बहुत आदर करते हैं . गुरु शिष्य परम्परा का महत्व निम्नलिखित है .
आपने महसूस किया होगा कि जब से संसद पर हमले के आरोपी अफजल को फाँसी की सजा सुनाई गई है तभी से यदा कदा उसकी सजा को क्रियान्वित करवाने के लिए जनता के बीच से आवाजें आती रही हैं . जब कभी कहीं बम धमाका हो जाता है तो कुछ समय के लिए यह शोर तेज होता है और फिर धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है ।
पर इतने पर भी हमारी सरकार के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती । आखिर जूँ रेंगेगी कैसे . उसे रेंगने ही नहीं दिया जाता . साफ सफाई पर ध्यान ही इतना दिया जाता है , कि बेचारी जूँ पास भी फटकने नहीं पाती , रेंगना तो बहुत दूर की बात है । हमारे पूर्व गृहमंत्री की सफाई के आगे तो अच्छे से अच्छे सफाईगीर भी पानी भरते हैं .
पर सब लोग सरकार को ही दोष दिए जाएंगे । किसी ने यह नहीं सोचा कि सरकार के ऊपर तो देश की परम्पराओं को जीवित रखने की भी जिम्मेदारी है . उस जिम्मेदारी को नहीं निबाह सकी तो आने वाली पीढियों को कैसे मुँह दिखाएगी ? यह जो अफजल के नाम के पीछे जो गुरु शब्द लगा हुआ है उसने सारा खेल बिगाडा हुआ है .
आप यह तो भली भाँति जानते होंगे कि गुरु शिष्य परम्परा इस देश में युगों से चली आरही है । गुरु के एक आदेश पर शिष्य अपनी जान तक देने के लिए तैयार हो जाते थे । एकलव्य ने कैसे गुरु के एक इशारे पर अपना अँगूठा काटकर उनको गुरु दक्षिणा में दे डाला था भूल गए आप ? बस यही प्रोब्लम है पब्लिक के साथ . पब्लिक जल्दी भूल जाती है ।
इस पर भी हमारे प्रधानमंत्री के लिए तो गुरु शब्द का और भी अधिक महत्व है . वैसे इस देश में ऐसा पहली बार नहीं है कि गुरु को मृत्यु दण्ड दिया गया हो । इससे पहले भी गुरु अर्जुनदेव को और गुरु तेगबहादुर को मुगलों ने मृत्यु दण्ड दिया था . और बाद में अंग्रेजों ने शिवराम राजगुरु को भगतसिंह के साथ फाँसी पर लटका दिया था । पर इससे क्या वे सब चाहे बेशक निर्दोष थे . पर शासकों को गुरु शिष्य परम्परा का इतना खयाल नहीं था जितना आज की सरकार को है ।
आशा है हमारी सरकार गुरु शिष्य परम्परा को जीवित रखने में कोई कसर न उठा रखेगी . और अफजल गुरु यूँ ही कबाब काटते रहेंगे . हम तो खैर अपने मास्साब का सम्मान करते ही हैं .

मंगलवार, दिसंबर 16, 2008

स्वर्ग में संवाददाता


जरा सोचिए ये क्या देख रहे हैं आप ? यह चित्र स्वर्ग से लिया गया है . दर असल जब चन्द्रयान को चन्द्रमा के लिए रवाना किया गया था , तभी हमारे एक न्यूज चैनल का संवाददाता चुपके से अपनी और अपने चैनल की टी आर पी बढाने चक्कर में चन्द्रयान में सवार होगया था .

आपको याद होगा पिछले दिनों ताऊ की भैंस चन्द्रमा पर गई थी । इतना पता चलते ही चैनलों में होड मच गई । कि ताऊ की भैंस का फोटू सबसे पहले कौन खींच्चैगा । भैंस का फोटू तो ताऊ ने ना लेने दिया पर रास्ते में स्वर्ग में कुछ दिन तक चन्द्रयान ने जब डीजल भरवाया था ।


इन्द्र की झोंपडी के पीछे; यह संवाददाता गया तो था किसी और चक्कर में कि शायद रम्भा , मेनका या उर्वशी में से किसी से मुलाकात हो जाय तो कुछ चक्कर चलाया जाय . पर इंसीडेंटली उसे यह भैंस का पेड दिखाई दे गया ।

बस फोटू खींच लिए । तीन ही खींच पाया था कि चित्रगुप्त उधर आगए । बस कॉपी राइट के मामले में फँसाने की धमकी देकर उसे भगा दिया . स्वयं रम्भा की कुटिया की तरफ चले गए . वैसे ताऊ ने अपनी भैंस का फोटू पिछले दिनों मॉस्क लगाकर दिखाया था .

रविवार, दिसंबर 07, 2008

जब मेरी सरकार बनेगी

जब मेरी सरकार बनेगी ,
सभी बिलागर छा जाएंगे ।
मंत्री सबको बनना होगा ,
समुचित मन्त्रालय पाएंगे ॥
चयन करो अपना मंत्रालय ,
सबको खुली छूट दे दूँगा ।
बचे कुचे मंत्रालय लेकर ,
उनकी पोस्ट नित्य ठेलूँगा ॥
टाँग खिंचाई का विभाग तो ,
फुरसतिया ही ले जाएंगे ।
पोर्टफोलियो एक एक्स्ट्रा ,
हा हा ठी ठी का पाएंगे ॥
पर हा हा के सभी मामले ,
सीमा गुप्ता अगर सँभालें ।
फुरसतिया को फुरसत होगी ,
बस ठी ठी का बोझ उठालें ॥
ज्ञानदत्त पाण्डेय अपना प्रिय ,
ठेल मंत्रालय ले लेंगे ।
फिर जो कुछ भी मिल जाएगा ,
बता ओरिजीनल ठेलेंगे ॥
फिल्म मन्त्रालय ले लें कुश ,
मेरी उनसे रही गुजारिश ।
भूले भटके काम पडा तो ,
कर दें मेरी जरा सिफारिश
शास्त्री जी जो स्नेह मन्त्री ,
बन जाएं तो फिर क्या कहना ।
सबको खूब स्नेह मिलेगा ,
फिर चाहे जैसे भी रहना ॥
लट्ठ मंत्रालय
ताऊ का ,
इसमें कोई बहस न होगी ।
जो ताऊ से बहस करेगा ,
समझें उसे मानसिक रोगी ॥
बेहतर होगा जो रचना सिंह ,
अनुशासन मंत्री बन जाएं ।
पर अनुशासन में रहकर वे ,
शायद ही मंत्री बन पाएं ॥
शब्दों के मन्त्री के पद पर ,
अजीत वडनेरकर सोहेंगे ।
अर्थ अनर्थ करें शब्दों का ,
वे सबके मन को मोहेंगे ॥
दिनेश राय द्विवेदी जी भी ,
अपने विधि मन्त्री होंगे ।
कानूनी मसलों पर हमको ,
अपनी राय जरूरी देंगे ॥
अमर कुमार उठा मन्त्रालय ,
देखेंगे जब घुमा फिराकर ।
मन ही मन में सोचेंगे वे ,
गलती करदी इसको लाकर ॥
यह तो खाली मन्त्रालय है ,
इसमें भरा विभाग न कोई ।
मन्त्री बना विभाग न पाया ,
मेरी किस्मत ऐसी सोई ॥
किन्तु टिप्पणी ग्रोथ मन्त्री ,
उनको तुरत बना डालूँगा ।
होती खरी टिप्पणी इनकी ,
सबसे ज्यादा मैं ही लूँगा ॥
उडन तश्तरी के सुपुर्द हैं ,
आसमान के सभी मामले ।
ब्लॉगजगत की निगरानी हो ,
आसमान से ना हों हमले ॥
सफल रहे आलोक पुराणिक ,
अपना प्रिय मन्त्रालय लेकर ।
व्यंग्य विभाग उडाकर भागे ,
बिलागरों को झाँसा देकर ॥
झाड फूँक मन्त्री का पद तो ,
ले ही लेंगे अभिषेक ओझा
और दूसरा कोई इसका ,
उठा न सकता पूरा बोझा ॥
आम आदमी की मन्त्री जब ,
रीता भाभी बन जाएंगी ।
भरतलाल जो खबरें देगा ,
वे खबरें भी छप जाएंगी ॥
शिवकुमार मिश्रा जी गुरु हैं ,
उनको मन्त्रालय ना देंगे ।
हम तो बैठे मौज करेंगे ,
सारा काम वही देखेंगे ॥

शुक्रवार, नवंबर 28, 2008

ना मूर्खों के सींग



विदेशियों को सौंपकर, अपने तीर-कमान ।
उनसे आशा कर रहे, रखें हमारा ध्यान ।
रखें हमारा ध्यान, धन्य हैं भारतवासी ।
साध्वी का अपमान, न दें फजल को फाँसी ।
विवेक सिंह यों कहें, प्रसन्न उदार कहाते ।
ना मूर्खों के सींग, युँही पहचाने जाते ॥

शनिवार, नवंबर 22, 2008

यहाँ टिप्स हैं टिप्पणियों के


आओ ब्लॉगरो तुम्हें बताएं ।
ब्लॉगिंग में कैसे टिपियाएं ॥
यूज करें कट पेस्ट टेक्निक ।
माउस से बस करें दो क्लिक ॥
कम ना समझें टिप्पणियों को ।
बना चुकी हैं ये कइयों को ॥
जम कर सबको दें टिप्पणियाँ ।
जुडें आपकी सबसे कडियाँ ॥
मेहनत करलें शुरुआत में ।
करें खूब आराम बाद में ॥
कर्जदार सब हो जाएंगे ।
बैठे आप ब्याज खाएंगे ॥
चंद नमूने यहाँ बाँच लें ।
जो पसंद हों उन्हें छाँट लें ॥

"अरे वाह क्या खूब लिखा है ।
इसमें गहरा राज छिपा है ॥
आप उच्च श्रेणी के लेखक ।
स्वीकार करते हम बेशक ॥
लिखते रहिए रोज कुछ न कुछ ।
पढते ही पाठक हों बेसुध ॥
जुदा लगा अंदाज आपका ।
क्या कहना तुम्हरे प्रताप का ॥
ऐसे लेखक कम मिलते हैं ।
शब्द आपने खूब चुने हैं ॥
बात सुनें अब मेरे मन की ।
इच्छा है तुम्हरे दर्शन की ॥
आप बधाई तो स्वीकारें ।
मेरे भी ब्लॉग पर पधारें ॥
नहीं आपका जबाब कोई ।
पढकर हमने सुध बुध खोई ॥
बेशक आप तिरेपन के हैं ।
कार्य आपके बचपन के हैं ॥
है अंदाज जवानों जैसा ।
सत्य यही है संशय कैसा ॥
ब्लॉगजगत की आप धुरी हैं ।
कुछ लोगों की नज़र बुरी हैं ॥
बुरी नज़र ना लगे आपको ।
फेंकें आस्तीन के साँप को ॥
लिखें साथ में जब घरवाली ।
ट्यूब आपकी कभी न खाली ॥
अपना अलग बिलाग चलाते ।
साझे में शामिल हो जाते ॥
यह साझा भी सुन्दर कैसा ।
कौए और गिलहरी जैसा ॥
पूछे कोई ब्लॉगिंग क्या है ।
हमने सबको बता दिया है ॥
आप जो लिखें ब्लॉग वही तो ।
कहते हैं सब लोग यही तो ॥
कलम आपकी जो चल जाए ।
मिट्टी भी सोना बन जाए ॥
ब्लॉग जगत के आप हैं राजा ।
बजा रहे हैं सबका बाजा ॥
बैंगन व मूँगफली टमाटर ।
धन्य आपकी दृष्टि पाकर ॥
मेरा यही विनम्र निवेदन ।
करते रहें लक्ष्य का बेधन ॥
टिप्पणियों से ना हों विचलित ।
ये तो आती रहतीं हैं नित ॥
नाम टिप्पणीकार हमारा ।
ब्लॉग रोज पढते हैं थारा ॥
हम न किसी की भी मानेंगे ।
खाक लिखो वो भी छानेंगे ॥
जिस ब्लॉगर का सिक्का खोटा ।
उसे विषय का रहता टोटा ॥
आप जहाँ भी दृष्टि डाल दें ।
पानी से अमृत निकाल दें ॥
माना कलयुग में हो रहते ।
कथा मगर द्वापर की कहते ॥
आप जहाँ भी हाथ लगाते ।
अनायास ही बस छा जाते ॥
बन जाते हो कभी निठल्ले ।
सदा आपकी बल्ले बल्ले ॥
नहीं कभी टाइम का टोटा ।
समय दण्ड पकडे हो मोटा ॥
सारे ब्लॉगजगत में जाहिर ।
टाँग खींचने में हो माहिर ॥
टाँग किसी की जो दिख जाए ।
फिर न आपसे वह बच पाये ॥
कसकर पकड खींच लेते हो ।
किन्तु मुस्करा कर कहते हो ॥
अरे मित्र हो गया ये लोचा ।
मैंने ऐसा कभी न सोचा ॥
मैंने रैण्डमली खींची थीं ।
दोनों आँख रखीं मींची थी ॥
छोडो इसमें रोना कैसा ।
आगे से न करेंगे ऐसा ॥
भैंस आपकी है हीरोइन ।
ब्लॉगिंग में सब सूना इस बिन ॥

अब विराम बस तारीफों पर ।
एक नज़र डालें दोषों पर ॥

ब्लॉगजगत खेमों में बाँटा ।
इसी बात का है बस काँटा ॥
जल्दी बुरा मान जाते हो ।
टंकी पर भी चढ जाते हो ॥
मान मनौती करवाते हो ।
वापस किन्तु लौट आते हो ॥
तीसमार खाँ खुद हो बनते ।
अन्य किसी को कहीं न गिनते ॥
झगडा स्वयं मोल लेते हो ।
सारा दोष हमें देते हो ॥
पोस्ट गैर की चार लाइना ।
अपनी किन्तु माइक्रो कहना ॥
दस टिप्पणी मँगा लेते हो ।
तत्पश्चात एक देते हो ॥
यह क्या तुम नाराज़ हो गए ?
किस खयाल में आप खो गए ?
कहा सुना सब माफ करो जी ।
लिखते रहो युँही मनमौजी ॥ ॥ "

एक नज़र इस पर भी डालें ।

शायद कुछ पसंद का पा लें ॥

सोमवार, नवंबर 17, 2008

ब्लॉगिंग पर रोक ?

"जी हाँ ! अगर सूत्रों की मानें तो सरकार ब्लॉगिंग पर रोक लगाने का पूरा मन बना चुकी है । ब्लॉगिंग पर रोक लगाने की इस कवायद को काफी सधे हुए कदमों से अंजाम दिया जारहा है ताकि ब्लॉगरों को कानोंकान खबर न हो अन्यथा ये लोग अपने अपने ब्लॉग में सरकार के खिलाफ लिखकर ऐण्टी-इनकम्बेंसी फैक़्टर को मजबूत बना सकते हैं । दर असल इस पूरे प्रकरण का आधार पिछले दिनों कराया गया एक गुप्त सर्वेक्षण है जिसके अनुसार ब्लॉगिंग देश के लिए आने वाले दिनों में एक लाइलाज महामारी के रूप में सामने आसकती है । इसलिए इस जहरीले पौधे को दरख्त बनने से पहले ही उखाड देना बेहतर होगा .इससे जुडे हुए लोग वैसे तो देश के हर हिस्से में हर गली कूचे और ऑफिस में हैं तथा काफी लोगों को इसकी लत पड चुकी है. और दूसरे सीधे सादे लोगों को भी अपने ब्लॉग पढा पढाकर उत्तेजित करते रहते हैं . मगर आज हम बात कर रहे हैं चिकित्सा जगत में फैली हुई इस बुराई की . जी हाँ अपने को भगवान का प्रतिनिधि मानने वाले और पब्लिक में सम्मान प्राप्त डॉक्टर लोग जिनके कंधों पर देश का स्वास्थ्य टिका हुआ है बडी संख्या में ब्लॉगिंग की पकड में आ चुके हैं . ऐसे डॉक्टर का ध्यान मरीजों का इलाज करने से ज्यादा ब्लॉगिंग में रहता है .ये लोग रात को ढाई तीन बजे ही कुछ उल्टा सीधा लिखकर ( जिसको ब्लॉगिंग की भाषा में पोस्ट कहा जाता है ) इण्टरनेट पर डाल देते हैं ताकि बाकी लोग उसे पढकर या बिना पढे अपनी प्रतिक्रिया दे सकें जिसे इनकी भाषा में टिप्पणी कहा जाता है . इसके बाद सारा दिन इनकी एक आँख मरीज की तरफ तो दूसरी कम्प्यूटर स्क्रीन पर लगी रहती है . बीच बीच में ये खुद भी टिप्पणियाँ भेजते रहते हैं ताकि दूसरा ब्लॉगर भी, शिष्टाचारवश ही सही, टिप्पणी भेजने पर मजबूर हो जाय . एक बार तो ऐसा देखा गया कि कोई डॉक्टर पेशेण्ट को इन्जेक्शन लगारहा था कि अचानक उसके ब्लॉग पर टिप्पणी आगई . टिप्पणी पढने के चक्कर में उन महाशय ने सही दवा की बजाय खाँसी की सीरप को ही सिरिंज में भरके मरीज के शरीर में प्रविष्ट करा दिया . बेचारा मरीज जब चिल्ला रहा था तो आप हिल जाएंगे सुनकर कि डॉक्टर ने क्या बोला . अरे भाई पाँच ऐम ऐएल में ही इतनी त्वरित प्रतिक्रिया दे रहे हो, तुम्हें तो ब्लॉगिंग में होना चाहिए . इसी तरह आने वाले समय में हम आपको बताते रहेंगे कि अन्य व्यवसायों में यह बीमारी किस प्रकार नुकसान पहुँचा रही है . सरकार का मानना है कि ऐसे डॉक्टरों की पहचान करना और इन पर लगाम कसना टेढी खीर है . मगर जब ब्लॉगिंग को ही बैन कर दिया जाएगा तो न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी . "
टीवी एंकर ऐसा कह ही रहा था कि मेरी आँख खुल गई, और सपना अधूरा ही रह गया .

मंगलवार, अक्टूबर 21, 2008

अंग्रेजों की मिस्टेक

अंग्रेजों ने भारत में की बहुत बड़ी मिस्टेक ।
अपनाते परिवार नियोजन बच्चे दो या एक ।
बच्चे दो या एक, थर्ड ने खेल बिगाड़ा ।
गाँधी जी ने उनको बिन हथियार पछाड़ा ।
विवेक सिंह यों कहें फिरंगी खाए गच्चा ।
बिखर गया साम्राज्य न कर पाए रक्षा ॥

शुक्रवार, अक्टूबर 17, 2008

करवाचौथ पर निन्दक-निन्दा

एक बार दो दादा और पोता घोड़ी पर जा रहे थे .घोड़ी जरा कमजोर सी थी फिर भी ले जा रही थी . पहले गाँव से होकर गुजरे तो लोगों ने देखा . टिप्पणी हुई : "इनको न शर्म है न दया . हट्टेकट्टे इतनी कमजोर घोड़ी पर लदे जा रहे हैं ." पोते ने सुन लिया तो दादा से बोला , दादा जी मैं पैदल चलूँगा आप घोड़ी पर चलो लोग अच्छा नहीं समझते ." दादा ने तो दुनिया देखी थी . बोला, "बेटा लोगों की जुबान नहीं पकड़ सकते ये तो कुछ न कुछ कहेंगे ही ." मगर पोता न माना नीचे उतर गया और पैदल चलने लगा . अगले गाँव में पहुँचे तो वहाँ भी टिप्पणियाँ हुईं : "इस आदमी को न शर्म है न दया खुद हट्टाकट्टा घोड़ी पर सवार है और बच्चे को पैदल घसीट रहा है ." अबकी बार दादा ने कहा," बेटा मैं पैदल चलूँगा तू घोड़ी पर चल ." तीसरे गाँव में पहुँचे तो भी टिप्पणी से न बच सके . लोगों ने देखा तो कहा ," देखो इस लड़के को न शर्म है न दया खुद हट्टाकट्टा घोड़ी पर चल रहा है और बुड्ढा बेचारा पैदल भाग रहा है ." अब क्या चारा था ? दोनों ने तय किया कि पैदल चलेंगे . अगले गाँव में पहुँचे तो भी टिप्पणी से न बच सके . टिप्पणी मिली : " देखो ये दोनों कितने मूर्ख हैं . घोड़ी होते हुए भी पैदल जा रहे हैं .

ऊपर वाली इतनी लम्बी कथा हमने अकारण ही नहीं कही . आज करवा चौथ है . सब तरफ प्रसन्नता का माहौल है .हम तो छुट्टी लेकर घर बैठे हैं ईवनिंग शिफ्ट में ड्युटी थी इस डर से नहीं गये कि कहीं रात वाला फँसा न दे . जो पति हैं वे इसलिए खुश हैं कि उनके लिए ऐसा मौका साल में एक ही बार आता है जब उनकी पूजा होती है . अन्यथा वे तो साल भर पूजक ही बने रहते हैं . पत्नियाँ खुश हैं क्योंकि इसे बड़ा प्रदर्शन का सुअवसर बार बार थोड़े ही आता है . पडौसिनों को दिखाने का यही तो अवसर है कि मेरे पास यह साड़ी इतने की है और फलाँ जेवर इतने में खरीदा . आखिर प्रदर्शन का कोई बहाना तो चाहिए . ऐस ही तो किसी के सामने जाकर अपना बखान नहीं कर सकते न . ऊपर से पतिदेव को भी भ्रम हो जाता है कि वे देवता हैं . इस अवसर पर देवता से लगे हाथ वह इच्छा भी पूरी कराई जा सकती है जो पूरे साल बज़ट से बाहर थी . बच्चे मम्मी पापा दोंनों को एक साथ खुश देखकर अति आनन्दित हैं . उनको समझ आ गया है कि आज कोई न कोई विशेष अवसर है . जरूर कुछ न कुछ या तो हो गया है या होने वाला है .पर बुरा हो इन घोर असामाजिक छिद्रान्वेषियों का . इनको हर बात में टाँग अड़ाने की आदत जो है . इन्हें कोई बात अच्छी नहीं लगती . किसी को खुश देखकर तो ये कदापि खुश नहीं रह सकते .ये हर जगह मिल जायेंगे .एक ढूंढो तो चार मिलेंगे . यहाँ ब्लॉगिंग पर भी ऐसे लोगो की कमी नहीं है .पत्नियों को भडकाने में लगे हैं . स्त्री शोषण हो रहा है . पुरुष क्यों व्रत नहीं रखता स्त्री के लिए .ये होना चाहिए वो होना चाहिए . मै होता तो कभी व्रत न रखता . ऐसा कहते और लिखते हुए पाए जाते हैं ये लोग .मेरी सभी करवाचौथ प्रेमियों/प्रेमिकाओं से विनम्र गुजारिश है कि ऐसे लोगों की बात कतई न सुनें . खुश रहें और खुशी मनाने का कोई मौका हाथ से न जाने दें . निंदक तो हर बात की निंदा करते ही रहेंगे . इन निंदकों की जितनी निंदा की जाय कम है .

गुरुवार, अक्टूबर 16, 2008

मंदी का यह दौर

कल तक जो थे ठेलते लम्बे लम्बे लेख ।
मंदी का यह दौर है जाना उनको देख ।
जाना उनको देख ,उतर आए दोहों पर ।
रहा न कुछ कन्ट्रोल यहाँ माया मोहों पर ।
विवेक सिंह यों कहें शुरू अब दौर नया है ।
अगर नहीं यह मंदी तो फिर बोलो क्या है ॥

बतलावें मंदा

आसमान पर जा टँगे , सब चीजों के भाव ।
सस्ते बस शेयर हुए, सब कर रहे बचाव ।
सब कर रहे बचाव , भूलकर मँहगाई को ।
देखें शेयर सूचकांक के लो हाई को ।
विवेक सिंह यों कहें गरीबों को है फंदा ।
तेज हुई हर चीज मगर बतलावें मंदा ॥

बुधवार, अक्टूबर 15, 2008

गिरते मार्केट में बृज

ऊधौ इतनी कहियौ जाइ !
कभी भूलकर भी मुरलीधर बृज की ओर न आइ ।
दूध, दही, लाखन कौ माखन गयौ फ्री में खाइ ।
जैसे बाँधि गयौ हो लाके द्वार हमारे गाय ।
माल मारि जा बैठ्यौ मथुरा अब लौटानौ नाइ ?
सीधे सब चुकता कर दे कहुँ कोट कचहरी जाइ ।
विवेक सिंह धमकी सुनि मोहन ठाड़े ते डकराय ।

गुरुवार, अक्टूबर 09, 2008

लुढ़कने वाला लोटा

तब था खतरा जान को, हुए फोन भी टेप ।
अब घावों पर लग गया, कैसा ठण्डा लेप ।
कैसा ठण्डा लेप ,मित्रता अब तो गहरी ।
बना मैम का मित्र, बड़े भैया का प्रहरी ।
विवेक सिंह यों कहें लुढ़कने वाला लोटा ।
है बाहर से चिकना पर अन्दर से खोटा ॥

रविवार, सितंबर 21, 2008

काटोगे जो इसे

ले आए हम पकड़ कर, जुल्मी बकरा एक ।
पर घर में थीं बकरियाँ, लिया उन्होंने देख ।
लिया उन्होंने देख, बनाया प्रेशर भारी ।
काटोगे जो इसे, न देंगे वोट तुम्हारी ।
विवेक सिंह यों कहें, काटना मेरा जिम्मा ।
कब तक खैर मनाएंगी बकरे की अम्मा ?

मंगलवार, सितंबर 16, 2008

एक ब्लॉगर का स्टिंग ऑपरेशन

"ब्रेकिंग न्यूज ! ब्रेकिंग न्यूज !"एंकर गला फाड फाड कर चिल्ला रहा था," हमारे न्यूज चैनल 'परसों तक' की टीम ने किया एक जाने माने ब्लॉगर का स्टिंग ऑपरेशन .तो आइए आपको बताते हैं कैसे हुआ ये सब .हमारे सहयोगी प्रभु डावला और श्वेता विंग पहुँचे ब्लॉगर के घर पिता पुत्री के रूप में .कॉलिंग बेल बजती है , दरवाजा खुद ब्लॉगर ने ही खोला . प्रभु डावला बोलते हैं," जी मैं प्रभु डावला और ये मेरी पुत्री श्वेता . दर असल हम अपने एक रिश्तेदार के घर पर पास में ही आए हुए थे तो उन्होनें बताया कि आपका पुत्र शादी के योग्य है .""मैं समझ गया , आप बाहर क्यों खडे हैं अन्दर आइए ना . अन्दर बैठकर बातें करते हैं . आइए आइए ." ब्लॉगर बोलता है .आप देख सकते हैं हमारे टीवी स्क्रीन पर ब्लॉगर के घर का दृश्य . हमारा खुफिया कैमरा बखूबी अपना काम कर रहा है .प्रभु जी कोई रिस्क नहीं लेना चाहते तुरंत ही बडी चतुराई से मुद्दे की बात पर आगए ,"मेरी बेटी एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में काम करती है . थोडा बहुत ब्लॉग भी लिखती है .""ब्लॉग तो मैं भी लिखता हूँ " ब्लॉगर बोला .श्वेता मौका नहीं खोना चाहती," सर आपको कौन नहीं जानता, बहुत टिप्पणियाँ पढी हैं आपकी . पर मुझे आपकी कोई टिप्पणी अभी नहीं मिली ."ब्लॉगर लज्जित होकर तुरंत सेक्रेटरी को आवाज देता है . सेक्रेटरी हाजिर होती है . आप देख सकते हैं हमारे टीवी स्क्रीन पर .ब्लॉगर लगभग डाँटते हुए पूछता है," ये मैं क्या सुन रहा हूँ, ये मैडम ब्लॉग लिखती हैं और हमारी टिप्पणी नहीं मिली आजतक इन्हें .""ऐसा कैसे हो सकता है सर . मैं अभी ब्लॉगिंग एजेण्टों से पता लगाती हूँ . मैडम किस नाम से है आपका ब्लॉग ?""मेरा ब्लॉग स्वप्नलोक नाम से है" श्वेता ने ऐसे ही बोला . "पर ये ब्लॉग तो श्री विवेक सिंह जी का है . उनका बॉयकॉट चल रहा है आजकल . टिप्पणी वापस नहीं करते ना . उन्हॉने कहीं आपको चपेक तो नहीं दिया , कितने लिए ?" सेक्रेटरी एक सांस में बोल जाती है ."नहीं मेरा ब्लॉग तो स्वप्नलोक टू है , आज ही शुरू किया है ." श्वेता ने बात सँभाली .सेक्रेटरी चली गयी .प्रभु जी जो अब तक चुपचाप सब माज़रा देख रहे थे बोल्रे," पर ये सेक्रेटरी और एजेण्टों का ब्लॉग से क्या सम्बंध ?"ब्लॉगर ने राज उगला," आप तो अब हमारे रिश्तेदार होने वाले हैं आप से क्या छुपाना . मैं क्या आपको इतना फालतू दिखता हूँ .भगवान का दिया करोडों का बिजनेस है . यहाँ विदेश में घर छोड कर क्या ब्लॉगिंग के लिए पडा हूँ . पर हाँ थोडी शोहरत भी चाहिए . उसी के लिए ये दस बारह बच्चों को काम पर रख लिया है . कुछ मैं दे देता हूँ, कुछ गूगल से मार लेते हैं . ये परोपकार भी चल रहा है और अपने देश वाले भी खुश . सबको टिप्पणी मिल जाती है और क्या चाहिए . पर आप कहाँ ब्लॉगिंग की बातों में उलझ गये ."इतने में ब्लॉगर का लडका वहाँ आगया और बोला," अरे प्रभु जी , श्वेता जी आप ? पापा आप इन्हें जानते हैं ? बताया नहीं कभी आपने .""बेटा मैं इनको पिछले दस मिनट से ही जानता हूँ . पर तुम कैसे जानते हो इन्हें ?" ब्लॉगर थोडा कनफ्यूजिया गया था ."पापा आप क्या कह रहे हैं . ये प्रभु डावला जी हैं 'परसों तक' पर 'टेढी बात' कार्यक्रम में आते हैं .और ये श्वेता विंग जी हैं इनकी रिपोर्टर ."सुनते ही ब्लॉगर का बीपी लो हो गया . वह दवा लेने के लिए भागा . पीछे पीछे लडका भागा . हमारे सहयोगी मौका देखकर वहाँ से खिसक लिए . इस तरह यह स्टिंग ऑपरेशन अधूरा ही रह गया ."न्यूज एंकर इतना कह ही रहा था कि मेरी आँख खुल गयी और सपना अधूरा ही रह गया .

सोमवार, सितंबर 15, 2008

सिर्फ कपडे न बदलिए

चुनाव हारे तो बने, गृहमन्त्री तो आप
किन्तु सीरियस ना हुए, यही बडा संताप
यही बड़ा संताप, रहे अपने ही मद में
अब तक तो कुछ नया न कर पाए संसद में
विवेक सिंह यों कहें राष्ट्र को आप न छलिए
गृहमन्त्री हैं आप सिर्फ कपड़े न बदलिए

रविवार, सितंबर 14, 2008

हिन्दी दिवस मनाना था

समारोह कार्यालय में था, हिन्दी दिवस मनाना था ।
सभ्य समाज उपस्थित सब, मर्दाना और जनाना था ।
एक-एक कर सब बोले, सबने हिन्दी का यश गाया ।
हिन्दी ही सत्य कहा सबने, अंग्रेजी तो है बस माया ।
साहब एक बढ़े आगे, अपना कद ऊँचा करने में ।
मिलती है अद्भुत शान्ति सदा ही, हिन्दी भाषण करने में ।
चले गए अंग्रेज यहाँ से, पर अंग्रेजी छोड़ गए ।
बुरा किया अंग्रेजों ने, मिलकर भारत को तोड़ गए ।
किन्तु नहीं चिन्ता हमको, हम मिलकर आगे जाएंगे ।
उत्थान करेंगे हिन्दी का, हिन्दी में हँसेंगे, गाएंगे ।
अब बात करेंगे हिन्दी में, हम सब अंग्रेजी छोड़ेंगे
जो अंग्रेजी में बोलेगा हम उससे नाता तोड़ेंगे ।
सचमुच उनका कद उच्च हुआ, करतल ध्वनि की हुँकार हुई ।
अंग्रेजी पडी रही नीचे, तो हिन्दी सिंह सवार हुई ।
पर यह क्या सब कुछ बदल गया, अनहोनी को तो होना था ।
बस चीफ बॉस का आना था, हिन्दी को फिर से रोना था ।
आगमन चीफ का हुआ सभी ने उठकर गुड मॉर्निंग बोला ।
मॉर्निंग मॉर्निंग हाउ आर यू, साहब ने गिरा दिया गोला ।
खड़े हुए जा माइक पर, फिर हिन्दी की तारीफ करी ।
ऑल ऑफ अस शुड यूज़ हिन्दी,जस्ट लीव इंग्लिश यू डॉण्ट वरी ॥

जबरदस्ती आएंगी ?

आज मुदित मन मिल गया, नया तरीका एक ।
अधिक टिप्पणी चाहिये ? ताक रखें स्वविवेक ।
ताक रखें स्वविवेक, विवादास्पद ही लिखना ।
बता अन्य को निम्न, स्वयं तुम महान दिखना ।
विवेक सिंह यों कहें, जबरदस्ती आएंगी ।
अच्छी हों या बुरी किन्तु मन हर्षाएंगी ॥

मित्रगण