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रविवार, दिसंबर 07, 2008

जब मेरी सरकार बनेगी

जब मेरी सरकार बनेगी ,
सभी बिलागर छा जाएंगे ।
मंत्री सबको बनना होगा ,
समुचित मन्त्रालय पाएंगे ॥
चयन करो अपना मंत्रालय ,
सबको खुली छूट दे दूँगा ।
बचे कुचे मंत्रालय लेकर ,
उनकी पोस्ट नित्य ठेलूँगा ॥
टाँग खिंचाई का विभाग तो ,
फुरसतिया ही ले जाएंगे ।
पोर्टफोलियो एक एक्स्ट्रा ,
हा हा ठी ठी का पाएंगे ॥
पर हा हा के सभी मामले ,
सीमा गुप्ता अगर सँभालें ।
फुरसतिया को फुरसत होगी ,
बस ठी ठी का बोझ उठालें ॥
ज्ञानदत्त पाण्डेय अपना प्रिय ,
ठेल मंत्रालय ले लेंगे ।
फिर जो कुछ भी मिल जाएगा ,
बता ओरिजीनल ठेलेंगे ॥
फिल्म मन्त्रालय ले लें कुश ,
मेरी उनसे रही गुजारिश ।
भूले भटके काम पडा तो ,
कर दें मेरी जरा सिफारिश
शास्त्री जी जो स्नेह मन्त्री ,
बन जाएं तो फिर क्या कहना ।
सबको खूब स्नेह मिलेगा ,
फिर चाहे जैसे भी रहना ॥
लट्ठ मंत्रालय
ताऊ का ,
इसमें कोई बहस न होगी ।
जो ताऊ से बहस करेगा ,
समझें उसे मानसिक रोगी ॥
बेहतर होगा जो रचना सिंह ,
अनुशासन मंत्री बन जाएं ।
पर अनुशासन में रहकर वे ,
शायद ही मंत्री बन पाएं ॥
शब्दों के मन्त्री के पद पर ,
अजीत वडनेरकर सोहेंगे ।
अर्थ अनर्थ करें शब्दों का ,
वे सबके मन को मोहेंगे ॥
दिनेश राय द्विवेदी जी भी ,
अपने विधि मन्त्री होंगे ।
कानूनी मसलों पर हमको ,
अपनी राय जरूरी देंगे ॥
अमर कुमार उठा मन्त्रालय ,
देखेंगे जब घुमा फिराकर ।
मन ही मन में सोचेंगे वे ,
गलती करदी इसको लाकर ॥
यह तो खाली मन्त्रालय है ,
इसमें भरा विभाग न कोई ।
मन्त्री बना विभाग न पाया ,
मेरी किस्मत ऐसी सोई ॥
किन्तु टिप्पणी ग्रोथ मन्त्री ,
उनको तुरत बना डालूँगा ।
होती खरी टिप्पणी इनकी ,
सबसे ज्यादा मैं ही लूँगा ॥
उडन तश्तरी के सुपुर्द हैं ,
आसमान के सभी मामले ।
ब्लॉगजगत की निगरानी हो ,
आसमान से ना हों हमले ॥
सफल रहे आलोक पुराणिक ,
अपना प्रिय मन्त्रालय लेकर ।
व्यंग्य विभाग उडाकर भागे ,
बिलागरों को झाँसा देकर ॥
झाड फूँक मन्त्री का पद तो ,
ले ही लेंगे अभिषेक ओझा
और दूसरा कोई इसका ,
उठा न सकता पूरा बोझा ॥
आम आदमी की मन्त्री जब ,
रीता भाभी बन जाएंगी ।
भरतलाल जो खबरें देगा ,
वे खबरें भी छप जाएंगी ॥
शिवकुमार मिश्रा जी गुरु हैं ,
उनको मन्त्रालय ना देंगे ।
हम तो बैठे मौज करेंगे ,
सारा काम वही देखेंगे ॥

सोमवार, नवंबर 24, 2008

नीति-निर्धारकों का ओवरटाइम ?

सर्वविदित है कि किसी भी व्यक्ति की एक निर्धारित कार्यक्षमता होती है, जिससे अधिक जिम्मेदारी मिलने पर उसकी कार्यकुशलता प्रभावित होने लगती है । इस कार्यक्षमता का स्तर अलग अलग व्यक्तियों में अलग अलग हो सकता है, किन्तु असीमित किसी में भी नहीं होता । इसीलिए कोई भी जिम्मेदारी सौंपने से पहले व्यक्ति की सामर्थ्य को ध्यान में रखा जाना चाहिए । परन्तु हमारे देश में चलन है कि जहाँ कुछ व्यक्तियों के ऊपर जिम्मेदारियों का अम्बार है, वहीं दूसरे लोग खाली बैठे हैं ।
केन्द्र सरकार या राज्य सरकारों की बात करें तो जनता को लुभाने और वाहवाही लूटने के चक्कर में मन्त्रियों की संख्या को तो सीमित कर दिया गया पर यह नहीं सोचा गया कि एक ही मन्त्री कैसे कई विभागों की जिम्मेदारी सँभाल पाएगा । आखिर वे भी सुपरमैन तो हैं नहीं, आदमी ही हैं और ज्यादातर ऐसे हैं जो रिटायरमेंट की आयु पार कर चुके हैं तथा बिना सहारे के खड़े रह पाने की भी स्थित में नहीं हैं । अधिकतर सांसद अपनी दो करोड़ रुपये की धन राशि को ही ठिकाने नहीं लगा पाते, जो उन्हें अपने क्षेत्र में विकास कार्यों पर खर्च करने के लिए मिलती है । ऐसे में मन्त्रियों की संख्या घटाने की अपेक्षा उनके ऊपर होने वाले फालतू खर्चों को घटाना चाहिए था । उस स्थिति में कोई सांसद मन्त्री बनने के लिए राजी ही न होता, ऐसा तो लगता नहीं ।
यही हाल नौकरियों में है । मैन पॉवर शॉर्ट रखी जाती है । जहाँ एक ओर कुछ कर्मचारी वेतन से भी अधिक धनराशि ओवरटाइम के रूप में ले लेते हैं, वहीं अन्य पढे लिखे बेरोजगार चप्पल चटकाते घूमते हैं । जिस देश में इतनी बडी संख्या में लोग बेरोजगार हों वहाँ ओवरटाइम नाम की चिडिया को तो हर जगह से ढूँढ ढूँढकर उड़ा देना चाहिए । एक व्यक्ति एक पद के सिद्धान्त को हरसंभव अमल में लाया जाना चाहिए ।
पर क्या करें जब व्यवस्था के नीति निर्धारक स्वयं ओवरटाइम कर रहे हों तो उनके पास इस दिशा में सोचने की फुर्सत कहाँ ?

सोमवार, नवंबर 17, 2008

ब्लॉगिंग पर रोक ?

"जी हाँ ! अगर सूत्रों की मानें तो सरकार ब्लॉगिंग पर रोक लगाने का पूरा मन बना चुकी है । ब्लॉगिंग पर रोक लगाने की इस कवायद को काफी सधे हुए कदमों से अंजाम दिया जारहा है ताकि ब्लॉगरों को कानोंकान खबर न हो अन्यथा ये लोग अपने अपने ब्लॉग में सरकार के खिलाफ लिखकर ऐण्टी-इनकम्बेंसी फैक़्टर को मजबूत बना सकते हैं । दर असल इस पूरे प्रकरण का आधार पिछले दिनों कराया गया एक गुप्त सर्वेक्षण है जिसके अनुसार ब्लॉगिंग देश के लिए आने वाले दिनों में एक लाइलाज महामारी के रूप में सामने आसकती है । इसलिए इस जहरीले पौधे को दरख्त बनने से पहले ही उखाड देना बेहतर होगा .इससे जुडे हुए लोग वैसे तो देश के हर हिस्से में हर गली कूचे और ऑफिस में हैं तथा काफी लोगों को इसकी लत पड चुकी है. और दूसरे सीधे सादे लोगों को भी अपने ब्लॉग पढा पढाकर उत्तेजित करते रहते हैं . मगर आज हम बात कर रहे हैं चिकित्सा जगत में फैली हुई इस बुराई की . जी हाँ अपने को भगवान का प्रतिनिधि मानने वाले और पब्लिक में सम्मान प्राप्त डॉक्टर लोग जिनके कंधों पर देश का स्वास्थ्य टिका हुआ है बडी संख्या में ब्लॉगिंग की पकड में आ चुके हैं . ऐसे डॉक्टर का ध्यान मरीजों का इलाज करने से ज्यादा ब्लॉगिंग में रहता है .ये लोग रात को ढाई तीन बजे ही कुछ उल्टा सीधा लिखकर ( जिसको ब्लॉगिंग की भाषा में पोस्ट कहा जाता है ) इण्टरनेट पर डाल देते हैं ताकि बाकी लोग उसे पढकर या बिना पढे अपनी प्रतिक्रिया दे सकें जिसे इनकी भाषा में टिप्पणी कहा जाता है . इसके बाद सारा दिन इनकी एक आँख मरीज की तरफ तो दूसरी कम्प्यूटर स्क्रीन पर लगी रहती है . बीच बीच में ये खुद भी टिप्पणियाँ भेजते रहते हैं ताकि दूसरा ब्लॉगर भी, शिष्टाचारवश ही सही, टिप्पणी भेजने पर मजबूर हो जाय . एक बार तो ऐसा देखा गया कि कोई डॉक्टर पेशेण्ट को इन्जेक्शन लगारहा था कि अचानक उसके ब्लॉग पर टिप्पणी आगई . टिप्पणी पढने के चक्कर में उन महाशय ने सही दवा की बजाय खाँसी की सीरप को ही सिरिंज में भरके मरीज के शरीर में प्रविष्ट करा दिया . बेचारा मरीज जब चिल्ला रहा था तो आप हिल जाएंगे सुनकर कि डॉक्टर ने क्या बोला . अरे भाई पाँच ऐम ऐएल में ही इतनी त्वरित प्रतिक्रिया दे रहे हो, तुम्हें तो ब्लॉगिंग में होना चाहिए . इसी तरह आने वाले समय में हम आपको बताते रहेंगे कि अन्य व्यवसायों में यह बीमारी किस प्रकार नुकसान पहुँचा रही है . सरकार का मानना है कि ऐसे डॉक्टरों की पहचान करना और इन पर लगाम कसना टेढी खीर है . मगर जब ब्लॉगिंग को ही बैन कर दिया जाएगा तो न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी . "
टीवी एंकर ऐसा कह ही रहा था कि मेरी आँख खुल गई, और सपना अधूरा ही रह गया .

शनिवार, सितंबर 06, 2008

जनता की दरकार

अरुण जेटली की बने, दिल्ली में सरकार ।
बदले भृष्ट निज़ाम यह, जनता की दरकार ।
जनता की दरकार, सभी को है कौतूहल ।
कैसा होगा बीजेपी का सेफ्टी मॉडल ।
विवेक सिंह यों कहें, खत्म हो जाय बेकली ।
दिल्ली में सरकार बनाएँ, अरुण जेटली ॥

मित्रगण