बुधवार, अप्रैल 14, 2010

सूरज दादा से रिक्वेस्ट है




मौसम कैसा यह गरमी का,
घर से निकल न पायें ।
मम्मी के ये नियम कायदे,
बिल्कुल हमें न भायें ॥


मन करता है बाहर खेलें,
परमीशन जो पायें ।
गेट खुला मिल जाये तो हम,
चुपके बाहर जायें ॥


खेलें खूब, दोस्तों के संग
मिलकर मौज मनायें ।
भूख लगे तो घर आकर बस,
आइसक्रीम ही खायें ॥


सूरज दादा से रिक्वेस्ट है,
थोड़ी धूप बचायें ।
खूब इकट्ठी जब हो जाये, 
जाड़ों में ले आयें ॥

7 टिप्‍पणियां:

  1. विवेक भाई, हम सब के अन्दर एक बालक होता है पर हर बार वह दिखाई नहीं देता !
    आपने अपने वाले से मिलवाया ........ बहुत बहुत आभार !
    एक उम्दा पोस्ट के लिए बधाई !

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  2. ....और अगर फ़िर भी बच जाए ,
    तो बारिश मे भी लाएं,
    हम जैसे नन्हे मुन्नों को,
    इंद्रधनुष दिखलाएं.....

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  3. बाजिब बात है! लेकिन सूरज दादा माने तब न!

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