आज काफी दिनों के बाद ब्लाग पर आने का समय मिला है । असल में पड़ौस के बच्चों को स्कूल के लिए मौसम पर कविता लिखकर ले जानी थी । उनकी डिमाण्ड पर एक कविता लिखी तो सोचा इसे क्यों न ब्लॉग पर भी डाल दिया जाय जिससे इसका सूखा भी समाप्त हो सके । एक बार गरमी से परेशान होकर एक कविता लिखी थी "गर्मी की सरकार निरंकुश" । आज उसी श्रृंखला में यह कविता भी है ।
गर्मी की सरकार गिराने,
आया, मानसून आया ।
पड़े धूप के तेवर ढीले,
हुई बादलों की छाया ॥
भर उमंग में लगीं फुदकने,
चिड़ियाँ सब डाली-डाली ।
मधुर स्वरों में लगी बोलने,
कुहू-कुहू कोयल काली ॥
देख धरा पर चहल-पहल,
बूँदों का भी जी ललचाया ।
टप-टप गिरने लगीं भूमि पर,
मोर-नृत्य उनको भाया ॥
बारिश के देवता इंद्र ने,
इंद्रधनुष जब तान लिया ।
सूर्यदेव भी सहम गए,
चुप, पश्चिम को प्रस्थान किया ॥
धरती पर उत्साह, बाग में
फूल और हरियाली ।
सब कीचड़ बह गया,
साफ हो गयीं गावँ की नाली ॥
आवागमन मौसमों जैसा
जवाब देंहटाएंक्यों ब्लॉगर का होता?
कवि विवेक क्यों बने आलसी
स्वप्नलोक क्यों सोता?
बना रहे उत्साह सतत
कुछ ऐसी रीत चलाओ
इंद्रदेव कुछ ऐसा कर दो
ब्लॉगपोस्ट बरसाओ
बारिश और बच्चे महान हैं जो विवेक सिंह से कविता लिखवा लिये। :)
जवाब देंहटाएंसावन का महीना पवन करे सोर....
जवाब देंहटाएंचलो, पवन का एक झोंका तो आया.... आया है तो चलता रहे:)
पर उमस रह रह कर अपना अधिकार जता देती है।
जवाब देंहटाएंlagta hai sher ki nind abhi khuli nahi thi ke bachhon ne shor-sharabe kar.....jaga diye....
जवाब देंहटाएंbhai jamhayee le rahe the.....itte me kavitayee
phoot pari.............blog balak ke liye to...
bamchak kavita hai ji..........
sadar.
विवेक भाई
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुद्नर कविता .. प्राकृतिक सुंदरता को आपने बहुत अच्छी तरह से अपनी कविता में ढाला है . दिल से बधाई
आभार
विजय
कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html