सोमवार, नवंबर 16, 2009

इकत्तीस साल - दो सौ पोस्ट

Happy-Birthday

आज हमारा हैप्पी बड्डे है । पूरे ३१ साल के हो गये आज । जीवन यात्रा में जन्मदिन का महत्व एक मील के पत्थर जैसा है । मील के पत्थर तो अब रहे नहीं । हमने तो जबसे होश संभाला है किलोमीटर के पत्थर ही देखे हैं । पहले होते होंगे मील के पत्थर । तो सिद्ध हुआ कि जीवन यात्रा में जन्मदिन का महत्व किलोमीटर के पत्थर जैसा है । हेंस प्रूव्ड ।

किलोमीटर का पत्थर आने पर हम अक्सर यह जानने को उत्सुक रहते हैं कि यात्रा कितनी बची है । लेकिन जीवन यात्रा में यह सुविधा अभी उपलब्ध नहीं है । यहाँ सिर्फ़ पीछे मुड़कर देखा जा सकता है कि कितनी दूर निकल आये । फिर भी एक मोटा मोटा सा अंदाज़ा लगा सकते हैं कि आधे से ज्यादा आ गये होंगे । पीछे ज्यादा कुछ छोड़ा नहीं है । पीछे वाले को बिना छोड़े जो आगे मिल रहा है उसे भी समेटने में लगे हैं । बड़े लालची हैं हम । बचपन को अभी भी कसकर पकड़ा हुआ है । जब तक सिर पर बड़ों का आशीर्वाद कायम है तो उम्र बढ़ने के क्या होता है ? पर अब छीनाझपटी का सा माहौल बनने लगा है । मित्र-राष्ट्र बचपन की रस्सी को हमारे हाथ से छीनने पर तुले हैं । इस बात को ऐसे समझा जाय कि तेंदुलकर शतक लगाकर मैदान से लौटे हों और कोई पत्रकार भाई पूछ लें कि उम्र को देखते हुए क्या वे क्रिकेट से सन्यास लेने पर विचार कर रहे हैं ? पर वे तेंदुलकर हैं, हम नहीं । वे जब तक चाहें खेल सकते हैं ।

वैसे सरकार यदि शादी-व्याह जैसी तमाम व्यक्तिगत बातों की तरह यदि बचपना छोड़ने की भी उम्र तय करना चाहती हो तो हमारी सलाह यही होगी कि चालीस तक तो बख्श ही दिया जाय । असल में लोग जल्दी बचपना छोड़ देते हैं । फिर शिकायत करते हैं कि बुढ़ापा आगया । अगर बचपन को ही चालीस पार करके छोड़ा जाय तो संभव है बुढ़ापा सौ के पार आये । और मरेंगे डेढ़ सौ के आस-पास ।

हम जब लेख लिखने लगते हैं तो भटक जाते हैं । इसीलिये कविता लिखकर फूट लेते हैं । ये लेख-फेक लिखना फुरसतिया जी जैसे लोगों को ही शोभा देता है ।

हाँ तो कौन सा पाठ पढ़ा रहे थे हम ? हाँ याद आया । हम कह रहे थे कि हमारी यह दो सौवीं पोस्ट ऐसे ही नहीं हो गयी । इससे पहले 199 लिख चुके हैं तब यह दो सौ वीं छप रही है ।

यूँ हमारे पास खाली समय फिलहाल नहीं के बराबर है । तदापि यह आप लोगों का प्यार का आकर्षण ही है जो बिना रस्सी के भी खिंचे चले आते हैं ।

स्वप्नलोक पर और चिट्ठाचर्चा पर आपका जो प्यार मिला उसने हमेशा उत्साह बढ़ाया । यह अलग बात है कि चिट्ठाचर्चा में शामिल होने को कुछ पवित्रात्माओं ने चमचागीरी का नाम देकर भी हमें सम्मानित किया । कई दिन तक खज़ाने की तलाशी लेते रहे कि जब चमचागीरी की है तो कुछ न कुछ फायदा भी किसी न किसी मद में हुआ होगा हमें । पर कुछ मिला नहीं अभी । शायद कभी रद्दी बेचते समय मिल जाय ।

चिट्ठाचर्चा ने अभी पिछले दिनों १००० का आंकड़ा छुआ । बड़ी खुशी हुई । अनूप जी ने चिट्ठाचर्चा के द्वारा जो काम हिन्दी ब्लॉगरों का उत्साह बढ़ाने में किया है उसके मैन-आवर्स निकालने लगें तो अवश्य ही कनफ्यूजिया जायें । हम तो यही कहेंगे कि अनूप जी के व्यक्तित्व का पासंग भी अभी ब्लॉग-जगत में कोई नहीं हुआ । बराबरी की तो खैर क्या कहें !

शनिवार, नवंबर 14, 2009

सोच रहा हूँ अच्छा बच्चा बन ही जाऊँ

ANANT


सोच रहा हूँ अच्छा बच्चा बन ही जाऊँ

बाल-दिवस पर ऐसा करना ठीक रहेगा
हाथ लगा यह अच्छा अवसर इसे भुनाऊँ
सोच रहा हूँ अच्छा बच्चा बन ही जाऊँ


गन्दा बच्चा बनने का अब फैशन बीता
गन्दे बच्चे की इमेज को लगे पलीता
करूँ नित्य कुछ पुण्य पढ़ूँ मैं कुरान-गीता
नीम, करेला छोड़ूँ अब शक्कर अपनाऊँ
सोच रहा हूँ अच्छा बच्चा बन ही जाऊँ


क्रोध उठाकर अलग ताक पर धरना होगा
वाणी पर कुछ कठिन नियन्त्रण करना होगा
श्रम का कुछ अच्छा परिणाम न वरना होगा
मन मन्दिर में एक तराजू भी लगवाऊँ
सोच रहा हूँ अच्छा बच्चा बन ही जाऊँ


इस दुनिया में पहले से ही ढेरों गम हैं
देखो तो हँसने के अवसर कितने कम हैं
जिसको देखें उसकी ही आँखें अब नम हैं
मैं क्यों दिल को दुखा एक गम और बढ़ाऊँ
सोच रहा हूँ अच्छा बच्चा बन ही जाऊँ


यूँ इतना आसान नहीं है अच्छा बनना
फिर भी कुछ प्रयास करने में कैसा डरना
फल देगा भगवान कर्म बस हमको करना
फिर क्यों चिन्ता करूँ व्यर्थ मन को उलझाऊँ
सोच रहा हूँ अच्छा बच्चा बन ही जाऊँ


बाल-दिवस पर ऐसा करना ठीक रहेगा
हाथ लगा यह अच्छा अवसर इसे भुनाऊँ
सोच रहा हूँ अच्छा बच्चा बन ही जाऊँ



चलते-चलते


Gyandutt



ज्ञानदत्त जी हो गये, चौवन साला आज ।

करत रहें ब्लॉगिंग सदा, कभी न आयें बाज ॥

कभी न आयें बाज, दुआयें लगें हमारी ।

करते ब्लॉगर-श्रेष्ठ बिलागिंग सबसे न्यारी ॥

विवेक सिंह यों कहें, मचाते मन में हलचल ।

इलाहबाद में बसें, सुनें गंगा की कलकल ॥

शुक्रवार, नवंबर 13, 2009

क्या राजनेता देश को आगे ले जाने के मूड में हैं ?

वैश्वीकरण के इस युग में संचार-क्रान्ति ने सारे विश्व को ही एक गाँव बनाकर रख दिया है । अब वसुधैव-कुटुम्बकम की भारतीय अवधारणा जहाँ सच होती नज़र आ रही है, वहीं दूसरी ओर इसे बिडम्बना ही कहा जाएगा कि भारतीय समाज खुद बिखराव की ओर अग्रसर दिख रहा है । बेवजह के क्षेत्रीय और साम्प्रदायिक विवादों ने आम आदमी का जीना दूभर किया हुआ है ।

वास्तव में आज के जमाने में धर्म और राज्य के आधार पर देश को बाँटने की कोई आवश्यकता नहीं रह गयी है । देश को सूबों में बाँटकर राजकाज को आसान बनाने की आवश्यकता मध्ययुग में थी । आज जब पल भर में सूचना विश्व के कोने कोने में पहुँच रही है तब राज्य किसलिए ? क्या जनपदों अथवा मण्डलों में विभाजन ही पर्याप्त नहीं ?

इसी तरह यदि हमारा देश वास्तव में धर्म निरपेक्ष है तो देश का हर नागरिक धर्म और जाति से ऊपर उठकर देखा जाना चाहिए । हिन्दू कानून अलग, मुसलमान कानून अलग ऐसा क्यों ?

अब जब हर नागरिक को अलग पहचान नम्बर देने की बात की जा रही है और सबकी आर्थिक स्थिति का रिकॉर्ड रख पाना भी कोई मुश्किल कार्य नहीं रहा । ऐसे में जाति को आधार बनाकर सब लोगों को गाय-भैंस की तरह हाँकने से क्या फायदा ?

क्या हमारे राजनेता देश को वाकई आगे ले जाना चाहते हैं ?

किचिन से फूँकनी गायब

किचिन से फूँकनी गायब

आ गया कैसा जमाना ?
या खुदा ! या रब !
किचिन से फूँकनी गायब ॥

पड़ी जरूरत जब भी इसकी
कभी न यह मौके से खिसकी
किया कार्य थी डिमाण्ड जिसकी
दिया मुँह आग में जब-तब
किचिन से फूँकनी गायब ॥

लेकिन फिर भी गयी नौकरी
बन्द हुई प्राचीन फैक्टरी
जैसे सिर पर फूटे गगरी
आँसुओं से भीगा तन सब
किचिन से फूँकनी गायब ॥

चिमटा, चमचा निकले चालू
और तवा जैसा भी कालू
उड़ें हवा में जैसे बालू
नौकरी नयी मिल गयी अब
किचिन से फूँकनी गायब ॥

फुँकनी के घर अंधकार है
नई जॉब का इंतजार है
कंधों पर परिवार भार है
मौन है, सिल गये ज्यों लब
किचिन से फूँकनी गायब ॥

आ गया कैसा जमाना ?
या खुदा ! या रब !
किचिन से फूँकनी गायब !

गुरुवार, नवंबर 12, 2009

विचार-धारा का संवैधानिक संकट

हमने जब हाई-स्कूल के बाद केमिकल इंजीनियरिंग में चार साल का डिप्लोमा पास कर लिया तो काफी खुश थे । सच पूछा जाय तो थोड़ा घमण्ड भी हमारे भीतर घर बना लिया था । हमारे जो साथी स्नातक हो गये थे उन्हें हम कुछ भाव ही न देते थे ।

पर ईश्वर ऊपर से यही सब तो देखते रहते हैं । उन्होंने अपने किसी दूत के द्वारा हमें ज्ञान दिया कि हम प्रैक्टीकली चाहे जितना खुश हो लें, पर थियोरिटीकली स्नातकों के लेवल से बहुत नीचे हैं । वह बात अलग है कि टेक्निकल नॉलेज हो जाने के कारण कोई न कोई फैक्टरी हमें काम पर रख ही लेगी । जबकि स्नातक की तो वैल्यू ही अलग है । स्नातक चाहे तो आईएऐस के लिए ट्राई मार सकता है जबकि तुम नहीं ।  जब तक आदमी स्नातक नहीं हो जाता, उसे सही मायनों में पढ़ा लिखा ही नहीं माना जा सकता । जिसने बीए कर लिया समझो बुद्धिजीवी हो गया । उसे विधान-परिषद में वोटिंग का अधिकार मिल जाता है । उसकी एक विचार-धारा बन जाती है । और तुम रहोगे डिप्लोमची ही , चाहे पैसा कितना ही कमा लेना ।

यह बात हमारे हृदय में घर कर गयी । अगले ही साल इण्टरमीडियेट का प्राइवेट फॉर्म भरा । नौकरी भी की और परीक्षा भी दी । पास भी हो गये । इसी तरह खेंच-कढ़ेर के बीए भी हो गए । पर विचार-धारा न पनपी । सोचा हो सकता है हमारी विचार-धारा बनने में कुछ ज्यादा मेहनत लगे । इसलिए एमए भी करने लगे । वह भी मर-गिर के हो ही गयी । सारा देशी विदेशी इतिहास और राजनीति शास्त्र चाट लिया पर विचार-धारा न पनपी । बल्कि और कनफ्यूज से हो गये ।

अब तो अक्कल-दाढ़ भी जोर मार रही है । कहते हैं जिसके मुँह में ऐग्जैक्ट बत्तीस दाँत हों उसकी जिव्हा पर सरस्वती जी आकर बैठ जाती हैं और आदमी सच बोलने लगता है ।

सोच रहा हूँ जिसकी कोई विचार-धारा ही नहीं वह अगर सच बोले तो क्या परिणाम होंगे ?  इसी उधेड़बुन में रहता हूँ कि कौन सी विचार-धारा ज्वॉइन करूँ- कौन सी न करूँ । अलग अलग विचार-धारा वाले लोगों के प्रवचन सुनता हूँ । प्रभावित होता हूँ । पर अगले विचारक के विचार सुनते ही पहले वाले के विचार भूल जाता हूँ । बड़ी विकट समस्या है । मन की सरकार में विचार-धारा का संवैधानिक संकट सा खड़ा हो गया है । आशा है अक्कल-दाढ़ पूरी बाहर आने से पहले कोई न कोई विचार-धारा बन ही जाएगी ।

मंगलवार, नवंबर 10, 2009

मर्दों वाला काम

abu_azmi

अबू आज़मी ने किया, मर्दों वाला काम ।

कम से कम इस बात पै, मेरा उन्हें सलाम ॥

मेरा उन्हें सलाम, झुके बाकी सब योद्धा ।

तुम ही साहूकार, और सब तो घसखोदा ॥

विवेक सिंह यों कहें, बधाई हुई लाजमी ।

मर्दों वाला काम कर दिये अबू आजमी ॥

शनिवार, अक्टूबर 31, 2009

मठाधीश बाबा के आश्रम में

कल रात तबियत कुछ अच्छी महसूस नहीं हो रही थी । मैं जल्दी सो गया । रात को अचानक कॉलबेल बजी तो उठकर दरवाजा खोला । दरवाजे पर चार अजीब से प्राणी खड़े थे । एक ने आदमी की तरह बात करते हुए मुझे हिन्दी में कहा, “ चल भई तुझे ब्लॉग-मठाधीश ने बुलाया है ।” इसके बाद उन्होंने मुझे बोलने तक का मौका नहीं दिया । मुझे बोलने का मौका तभी मिला जब होश आने पर मैंने स्वयं को ब्लॉग-मठाधीश के सामने खड़ा पाया । एक प्राणी बोला बाबा यही वह ब्लॉगर है जिसे आपने याद किया था ।

बाबा एक ऊँचे से आसन पर बैठे हुए मठा पी रहे थे । बगल में ही एक बर्तन रखा था जिसको अभी आखिरी कौर खाकर बाबा ने खाली कर दिया था । बाबा पास खड़े प्राणी से बोले, “ बच्चा माफी दो ।” वह प्राणी भागता हुआ गया और सेकिण्डों में माफी का टोकरा लेकर दौड़ता हुआ आ गया । बर्तन भरा हुआ देखकर बाबा का चेहरा खिल उठा । मैं समझ गया कि बाबा को माफी खाने का शौक है ।

बाबा ने मेरी ओर नज़र उठाकर कहा, “ हमें माफी दो बच्चा जो इतनी रात गये बुलाया ।” मैंने तुरंत बाबा के पास जाकर बर्तन से उठाकर थोड़ी सी माफी बाबा के हाथ पर रख दी । बाबा देखते रह गये । मुँह से इतना ही निकला, “माफ करना, बहुत शातिर हो ।”

फिर बाबा काम की बात पर आये । बोले, “माफ करना, दरअसल हमें शंका हो गयी है ।” मैंने हिम्मत करके पूछा , “ क्या शंका है बाबा ? मुझे आपकी शंका का समाधान करके खुशी होगी ।”

“माफ करना, सही बताओ यह स्वप्नलोक कंपनी का क्या रहस्य है ?”

बाबा, इतनी सी बात को इस तरह बुलाकर पूछा ?”

तभी एक प्राणी बोला, “ ओ सीधे से मुद्दे की बात बता । बाबा मीठा बोलते हैं इसका ये मतलब नहीं है कि बहुत सीधे हैं ।”

मेरे शरीर में झुरझुरी सी हो गयी । बाबा मुस्काराने लगे । बोले, “ माफ करना, बच्चे उद्दण्ड हैं । हाँ तो स्वप्नलोक कंपनी का क्या रहस्य है ? ”

आपको क्या लगता है ?”

माफ करना, हमें लगता है कि इस कंपनी में असल में कई लोग शामिल हैं । एक अच्छा कवि, एक बढ़िया कवि, एक अच्छा व्यंग्यकार, एक बढ़िया व्यंग्यकार, एक अच्छा कार्टूनिस्ट, एक बढ़िया कार्टूनिस्ट आदि आदि कई लोग इस ब्लॉग पर लिखते हैं ।”

बाबा अन्दाज़ा तो आपका ठीक है पर अच्छा और बढ़िया क्या अलग होते हैं ?”

फिर प्राणी को हस्तक्षेप करना पड़ा, “ तुझे अभी तो बताया था कि बाबा मीठा ही बोलते हैं । खराब को अच्छा कहते हैं और बढ़िया तो खैर बढ़िया हईये है । तू सीधा खड़ा रहेगा कि लगाऊँ एक कण्टाप ?”

बाबा ने हाथ से उसे शान्त रहने का इशारा किया और बोले, “ माफ करना, हमारी शंका निर्मूल नहीं थी । हम शर्त जीत गये । दर असल अभी शाम को ही एक नामचीन ब्लॉगर तुम्हारी बहुत तारीफ कर रहे थे । तो हमने अपनी शंका उनके सामने रख दी । शंका भारी थी लिहाज़ा वे लगभग दब से गये और शर्त लगा बैठे । हार गये बेचारे । ”

मैंने पोल खुलने के डर से कातर स्वर में निवेदन किया कि “बाबा यह बात अपने तक ही रखें अन्यथा बड़ी भद्द पिटेगी मेरी ।”

माफ करना, ठीक है पर तुम कंपनी में कवि, कार्टूनिस्ट आदि में से किस पद पर हो ?”

मैं तो बस लेखक हूँ बाबा । सबकी ओर से लिखता भर हूँ ।” कहते हुए मैं शर्म से जमीन में गढ़ा जा रहा था ।

बाबा ने धीरज बँधाया, “माफ करना, डरो मत ब्लॉग-जगत में सिर्फ़ तुम्हीं पर हमें शंका नहीं हुई है । राज और भी हैं जो हम किसी को नहीं बताते । पर तुम्हारा राज जाना है तो तुम्हें बताये देते हैं । दरअसल फुरसतिया, अनूप शुक्ल, अजय कुमार झा, और टिप्पू चाचा एक ही व्यक्ति हैं । समीरलाल एक व्यक्ति नहीं हैं । चेले चपाटे मिलाकर कुल दस लोग हैं जो उड़नतश्तरी नाम से टिपियाते और लिखते हैं । ताऊ जी का मसला तो खैर बच्चा बच्चा जानता है कि ताऊ कोई व्यक्ति नहीं एक टीम है । इस टीम के साथ एक रोचक बात यह है कि इनमें से किसका फोटू लगेगा यह आज भी डिसाइड नहीं हो सका है । और ज्यादा जानना चाहते हो तो सुनो, शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय भी एक ही व्यक्ति हैं ।”

मैं यह सब सुनकर अविश्वास से कहने लगा, “नहीं यह नहीं हो सकता । यह नहीं हो सकता ।”

इतने में पत्नी जी ने मुझे जगाकर पूछा, “ क्या नहीं हो सकता ?

और इस तरह मेरा सपना अधूरा ही रह गया ।

शुक्रवार, अक्टूबर 30, 2009

न जाओ मकर वृत्त की ओर

चले तुम मकर वृत्त की ओर ?

कर्क वृत्त वाले यूँ ताकत
ताके, जैसे चाँद चकोर
चले तुम मकर वृत्त की ओर ?

तुम्हें मकर वालों की चिन्ता
किन्तु हमारा हक है छिनता
कोई वहाँ तुम्हें है गिनता ?
वहाँ पर हो जाओगे बोर
चले तुम मकर वृत्त की ओर ?

वहाँ गये तो पछताओगे
जाकर वहाँ लात खाओगे
वापस लौट यहीं आओगे
मकर वाले हैं अति लतखोर
चले तुम मकर वृत्त की ओर ?

वहाँ सुरक्षित रह न सकोगे
उस धारा में बह न सकोगे
हाल स्वयं का कह न सकोगे
कष्ट का कोई ओर न छोर
चले तुम मकर वृत्त की ओर ?

तुम बहकावे में मत आओ
मसला बैठ यहीं सुलझाओ
क्या दिक्कत है हमें बताओ
बड़े हो तुम अब नहीं किशोर
चले तुम मकर वृत्त की ओर
?

हमसे यूँ मत रूठो संगी
बातें करो न ये बेढंगी
साथ सहेंगे सब सुख-तंगी
हम, इस बगिया के मोर
चले तुम मकर वृत्त की ओर ?

तेज धूप भी हमने झेली
रहे झुलसते हम सब डेली
फिर भी सदा सीख तुमसे ली
उठाओ मत यह कदम कठोर
न जाओ मकर वृत्त की ओर

कर्क वृत्त वाले यूँ ताकत
ताके, जैसे चाँद चकोर
चले तुम मकर वृत्त की ओर ?

रविवार, अक्टूबर 25, 2009

अब साधू होने का मन है

हमको नाहक ही बुलवाया
इंतजाम यह रास न आया

दोहरी सभी व्यवस्थाएं थीं
पैसा जाने कहाँ बहाया

उनको दूध-जलेबी हाज़िर
हमें बेड-टी को तरसाया

कैसी कैसी उम्मीदें थीं
उन पर पानी खूब फिराया

वे ठहरे एसी कमरों में
हमें मच्छरों से कटवाया

सीखे-पढ़े सभी मच्छर थे
सारी रात खूब तड़पाया

जिनके पास न डिग्री कोई
संचालक उनको बनवाया

ज्ञान हमारा जगजाहिर है
आम जनों में खुद को पाया

बैठे आप घरों में अपने
आप नहीं समझोगे भाया

जिसके पैर न फटी बिवाई
दर्द पराया समझ न पाया

और भला अब क्या बतलाएं
कहते कहते दिल भर आया

अब साधू होने का मन है
यह ब्लॉगिंग तो है बस माया

इलाहाबाद में चिट्ठाकारों का सम्मेलन हो गया । कुछ लोगों को बुलाया गया कुछ को नहीं बुलाया गया । हम उनमें से हैं जिन्हें नहीं बुलाया गया । अपना दर्द किससे कहें ? ऊपर से जिन्हें बुलाया गया उनमें से एक सज्जन हमसे मौज ले लिये । टिप्पू चाचा की अदालत में अरविंद मिश्र कहते हैं :

"हाँ विवेक की परिकल्पनात्मक टिप्पणी सही है वे आये होते तो उनको भी भाव दिया जाता -खेमा उन्ही का हावी था !क्या करियेगा हिन्दी बेल्ट अपनी इन कमजोरियों से उठ ही नहीं पा रहा !"

यह तो सरासर जले पर नमक छिड़का जा रहा है । हमारा खेमा होता तो हमें बुलावा भी न मिलता ?

शनिवार, अक्टूबर 24, 2009

सबसे पहले मैंने ही

सबसे पहले मैंने ही, चिट्ठे को ‘चिट्ठा’ बोला था
यह रहस्य था गहरा मैंने, इलाहाबाद में खोला था

सुनते ही सब मचल गये थे, तान लिये थे भौहें भी
जैसे मैंने गिरा दिया जो, वह परमाणु गोला था

कुछ लोगों ने इसे मामला, झूठमूठ का बतलाया
लेकिन मैंने भी तो पहना, बुजुर्गियत का चोला था

कानाफूसी बहुत हुई पर, कानों में ही उलझ गयी
कोई खुलकर बोल न पाया, मुँह में कोका-कोला था

कोई हल्की बात कहे, या इसको भारी बतलाये
मैंने अपने इन शब्दों को पहले कभी न तोला था

तीसमारखाँ अच्छे अच्छे, मार न पाये पन्द्रह भी
मैं यह समझा चतुर हो गया, लेकिन ब्लॉगर भोला था

नया शौक नेतागीरी का, बिस्मिल्लाह करने आये
टकले होकर घर से निकले, गिरा चाँद पर ओला था

बीच धार जब लगी डूबने, नैया तो सब चिल्लाये
यह क्या ? हमने तो समझा था कोई उड़नखटोला था

बड़े शौक से पास बुलाया, कितनी इज़्ज़त बख्श दिये
बेचारों को मालुम क्या, मैं फूल नहीं था शोला था

पैर कब्र में लटके तो क्या, जो मिल जाये अच्छा है
नामवरी का काम किया यह, भरा नाम से झोला था

मित्रगण