छाये जब काले बादल ।
प्यास बुझी प्यासी धरती की,
पीकर बारिश का मृदु जल ॥
ठण्डी-ठण्डी हवा चली,
गरमी से छुटकारा पाया ।
ताल-तलैया भरे सभी,
सबको ऐसा मौसम भाया ॥
लगे नाचने मोर हर तरफ़,पक्षी कोलाहल करने ।
बच्चे, खेत बना गलियों में,
लगे नालियों से भरने ॥
आसमान पर देखो तो यह,
बना इन्द्र का धनुष भला ।
जोत बैल, ले हल अपना,
खेतों की ओर किसान चला ॥
मन भायी यह ऋतु वर्षा की,वापस अब जाये न कहीं ।
हाय कष्टकारक वह गरमी,
यहाँ लौट आये न कहीं ॥