अर्जुन बोले," हे केशव ! मैं ब्लॉग लिखने में स्वयं को सर्वथा इच्छारहित पा रहा हूँ . मुझे ब्लॉग लिखने से मिलेगा क्या ? एक टिप्पणी ? कभी कभी तो वह भी नहीं मिलती . हद तो तब हो जाती है जब टिप्पणीकार टिप्पणी के बदले टिप्पणी की जंगली डिमाण्ड कर बैठता है . ऐसे ब्लोगरों को देखकर मेरी ब्लॉग लेखन शक्ति का ह्रास हो रहा है . मेरी फिंगर्स ट्रिप हो रही हैं . की-बोर्ड को छूते ही शॉक लग रहा है .पूरा भेजा टेंशना रहा है .
धृतराष्ट्र बोले," तो क्या संजय अर्जुन ब्लॉग नहीं लिखेगा ? तो क्या मेरे पुत्रों को ब्लॉग वाणों का सामना नहीं करना पडेगा ? "
संजय उवाच," महाराज ! मुझे तो ऐसा नहीं लगता . आप आगे का आँखों देखा हाल सुनिए ."
अर्जुन आगे बोले," हे केशव ! मुझे ब्लॉग क्यों लिखना चाहिए, कृपया थोड़ा खोल कर समझाइए ."
श्री भगवान बोले," हे पार्थ ! एक ज्ञानी ब्लॉगर को कदापि टिप्पणी पाने की इच्छा के वशीभूत होकर न लिखना चाहिए . ब्लॉग का तो धरती पर अवतरण ही अभिव्यक्ति हेतु हुआ है . इसका मूल उद्देश्य टिप्पणी पाना नहीं है . "
अन्त में कन्हैया जी बोले," हे अर्जुन ! तूने वह कहावत तो सुनी होगी कि ब्लॉग लिख और कुँए में डाल ।"
संजय बोला," महाराज ! अर्जुन की उँगलियों की धमक से की-बोर्ड हिल रहा है ."
धृतराष्ट्र ने भेजा ठोक लिया .