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क्षणभंगुर है जिन्दगी, फिर क्यों तू घबराय । आया मुट्ठी बाँध कर, हाथ पसारे जाय । हाथ पसारे जाय, यहीं सब रह जाता है । ईश्वर ही सच्चा है, झूठा हर नाता है । विवेक सिंह यों कहें यही जीवन का गुर है । फिर क्यों तू घबराय ज़िन्दगी क्षणभंगुर है ।।