भीषण गरमी है । बारिश सामने ही है पर बरसना ही नहीं चाहती । सीधे सीधे मना भी नहीं करती कि," हमें नहीं बरसना जी, आप अपना कोई और इन्तजाम कर लो । " मानो कोई भ्रष्ट बाबू फ़ाइल को सामने रखे बैठा है और आगे नहीं बढ़ाता । बस तसल्ली देता रहता है । खुलकर रिश्वत भी नहीं माँगता और बिना रिश्वत लिए काम भी नहीं करता । समझदार लोग चुपचाप एक लिफ़ाफ़ा मेज के नीचे से सरका देते हैं और फ़ाइल आगे बढ़ जाती है । पर नासमझ तो नासमझ ठहरे । समझ ही नहीं पाते कि आखिर बाबू चाहता क्या है । बस मन ही मन बेचारे बाबू को कोसते रहते हैं ।
बाबू सरकार से वेतन पाता है । पर उससे उसका काम ही नहीं चलता । ऊपर की आमदनी चाहिए । वर्षा जी भी शायद इन्द्र के सिंचाई विभाग से वेतन पाती होंगी । पर बाबुओं की देखा-देखी उन्हें भी ऊपर की खुशामद चाहिए । पेड़ मत काटो, वृक्षारोपण करो, प्रदूषण मत फ़ैलाओ आदि आदि, न जाने कितनी ही माँगें हैं पर अपने को समझदार कहते न थकने वाला इन्सान समझ ही नहीं पा रहा । अपने लिए पानी तक का प्रबन्ध न कर सकने वाला इन्सान वाकई कितना समझदार है !
शास्त्रों में लिखा है कि जल ही जीवन है । जीवन अब बोतल में बिकता है । हवा भी बिकती है पर इतने बड़े पैमाने पर नहीं । जब हवा-पानी मिलते हैं तो जीवन रहता है । जीवन को बुलबुले की भाँति माना गया है । हवा पानी जब अलग अलग हो जाते हैं तो बुलबुला फ़ूट जाता है । बुलबुले का कोई भरोसा नहीं । कब फ़ूट जाए कोई नहीं जानता । स्वयं हवा और पानी भी शायद नहीं जानते कि वे कब संबंध विच्छेद कर लेंगे ।
जीवन का भी कोई भरोसा नहीं । कौन कब टपक जाय कुछ कहा नहीं जा सकता । कौन हमें यहाँ भेज देता है और फ़िर अचानक वापस बुला लेता है ? क्या हम किसी शरारती बच्चे के खिलौने हैं जो हमें रिमोट से नियन्त्रित कर रहा है ? हम क्यूँ हैं ? यह सृष्टि , यह ब्रह्माण्ड किसकी शरारत है ?
कहा जाता है कि ब्रह्माण्ड का लगातार विस्तार हो रहा है । यह शायद 76.9 किलोमीटर प्रति सेकण्ड की गति से बाहर की ओर फ़ैल रहा है । कितनी ही आकाशगंगाएं भाग रही हैं । वैज्ञानिक पता करने में जुटे हैं कि ब्रह्माण्ड में हमारे अलावा क्या कहीं जीवन है ? इसी चक्कर में नित्य नये नये राज खोले जा रहे हैं । कहा जा रहा है कि यहाँ से दो सौ प्रकाशवर्ष दूर कोई तारा बुझ रहा है या जल रहा है । बहुत प्रसंशनीय है आपने इतनी दूर का समाचार सुनाया । पर हमें तो यह न्यूज दो सौ साल पुरानी लगती है । जो प्रकाश वहाँ से दो सौ वर्ष पहले चला होगा वही तो आपने देखा होगा । खैर छोड़िये हम इतने संकुचित नहीं कि ब्रह्माण्ड के बारे में ही सोचते रहें । ब्रह्माण्ड के परे क्या है ? किसी विशेषज्ञ से जब ऐसा सवाल पूछ लिया जाय जो बहुत कठिन हो तो सबसे पहले वह यही बोलता है कि ," गुड क्वेश्चन !" इस प्रश्न का भी वही हश्र होता है । पर हमें सोचने से कोई रोक तो नहीं सकता ना । इसलिए सोच लिया ।
हो सकता है ब्रह्माण्ड के बाहर कोई महा-ब्रह्माण्ड हो और हमारा ब्रह्माण्ड उस महा-ब्रह्माण्ड में किसी अण्डे के समान हो जो धीरे धीरे बड़ा हो रहा है और एक दिन फ़ूट जाने वाला है ।
जैसे परमाणु में इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन जैसे न जाने कौन कौन से टॉन फालतू घूमते रहते हैं । हो सकता है उसी भाँति ब्रह्माण्ड भी महा-ब्रह्माण्ड का कोई परमाणु ही हो और ये सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, आकाशगंगाएं, ब्लैकहोल और न जाने कौन कौन जो अपने को बहुत तीस मार खाँ समझते हैं, उस परमाणु के इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन जैसे ही हों । हम और आप तो खैर चीज ही क्या हैं । शायद विकिरण हों ।
शायद इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन जैसे सूक्ष्म कणों के भीतर भी सूक्ष्म जीवन हो और वहाँ के जीव उसे ही अपना ब्रह्माण्ड कहते हों । वहाँ भी चांद तारे हों और और कई ग्रहों पर जीवन हो । वहाँ भी आतंकवाद, राष्ट्रवाद, उदारवाद, नारी-सशक्तिकरण, समलैंगिकता और मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर बहस होती हो और जरा-जरा सी बात पर लोग कट मरते हों ।
यही सब महा-ब्रहमाण्ड और महा महा-ब्रह्माण्ड में भी होता रहता होगा । या ऐसा हो सकता है कि हम सपने में हों और जब जागें तो किसी और दुनिया में बिस्तर पर पड़े मिलें जहाँ हमें जगाया जा रहा हो ," उठो सुबह हो गयी । ऑफ़िस नहीं जाना क्या ?"
कहीं आप गम्भीर तो नहीं हो गए ? मैं तो यूँ ही मजाक कर रहा था ! ( यही तो शीर्षक है )
संभव है कि इस ब्लॉग पर लिखी बातें मेरी विचारधारा का प्रतिनिधित्व न करती हों । यहाँ लिखी बातें विभिन्न दृष्टिकोणों से सोचने का परिणाम हैं । कृपया किसी प्रकार का पूर्वाग्रह न रखें ।
शनिवार, जुलाई 11, 2009
गुरुवार, जुलाई 09, 2009
छाये जब काले बादल
रिमझिम बूंदें लगीं बरसने,
छाये जब काले बादल ।
प्यास बुझी प्यासी धरती की,
पीकर बारिश का मृदु जल ॥
पक्षी कोलाहल करने ।
बच्चे, खेत बना गलियों में,
लगे नालियों से भरने ॥
वापस अब जाये न कहीं ।
हाय कष्टकारक वह गरमी,
यहाँ लौट आये न कहीं ॥
छाये जब काले बादल ।
प्यास बुझी प्यासी धरती की,
पीकर बारिश का मृदु जल ॥
ठण्डी-ठण्डी हवा चली,
गरमी से छुटकारा पाया ।
ताल-तलैया भरे सभी,
सबको ऐसा मौसम भाया ॥
लगे नाचने मोर हर तरफ़,पक्षी कोलाहल करने ।
बच्चे, खेत बना गलियों में,
लगे नालियों से भरने ॥
आसमान पर देखो तो यह,
बना इन्द्र का धनुष भला ।
जोत बैल, ले हल अपना,
खेतों की ओर किसान चला ॥
मन भायी यह ऋतु वर्षा की,वापस अब जाये न कहीं ।
हाय कष्टकारक वह गरमी,
यहाँ लौट आये न कहीं ॥
सोमवार, जुलाई 06, 2009
भोले भालो अब तो जागो
आजकल 'अमर उजाला' में एक समाचार अक्सर पढ़ने को मिल जाता है जिसमें सोने चाँदी के गहनों की सफ़ाई करने के बहाने कुछ लोग भोली-भाली महिलाओं को झाँसा देकर उनके जेवरात लेकर भागने में सफ़ल हो जाते हैं ।
मैं 2003 में हरियाणा के ही धारुहेड़ा ( रेवाड़ी ) में रहा करता था । उस समय से ही यदा कदा हरियाणा से ऐसे समाचार पढ़ने को मिलते रहते थे । अब पानीपत में हूँ । यहाँ भी पिछले कुछ दिनों से आसपास के क्षेत्रों के ऐसे समाचार पढ़ने को मिल रहे हैं ।
ऐसे मामलों में अक्सर दो लोग सोने चाँदी के जेवर साफ़ करने की आवाजें लगते हुए गलियों में घूमते हैं । भोली भाली महिलाएं इन्हें बुलाकर पूछताछ करती हैं तो ये लोग बड़े सस्ते में ही जेवर साफ़ करने को तैयार हो जाते हैं । जेवर मँगाकर उन्हें पानी में डाला जाता है और कुछ मसाला भी महिलाओं को दिखाकर पानी में यह कहकर डाला जाता है कि इससे आधे घण्टे में जेवर साफ़ हो जाएंगे । इस पानी को आग पर गरम होने के लिए रख दिया जाता है ।
महिलाएं यूँ तो अपनी समझ से होशियारी से काम लेती हैं और टकटकी लगाए पूरा ध्यान जेवरों पर रखती हैं लेकिन जब उनसे पीने के लिए पानी माँगा जाता है या किसी अन्य बहाने से उन्हें दूर भेजा जाता है तो वे सम्मोहित सी उनके कहे अनुसार कार्य कर देती हैं । बस इसी समय ये लोग जेवर पानी से निकालकर अपने पास रख लेते हैं और यह कहकर वहाँ से चले जाते हैं कि आधे घण्टे बाद जब पानी ठण्डा हो जाए तो जेवर निकाले जा सकते हैं । जेवर साफ़ मिलेंगे । और वाकई जेवर ये लोग साफ़ कर ले जाते हैं । इसके बाद पछतावे के सिवाय कुछ नहीं मिलता । थाने में रिपोर्ट लिखवाइये । इधर उधर भागते रहिए । फ़िर कुछ नहीं होता ।
इसका इलाज केवल जागरूकता है । पर आश्चर्य है कि इतने सालों से एक ही तरीके से यह हो रहा है और लोग अब तक जागरूक नहीं हो सके ? दरअसल ऐसे समाचार अखबारों में ही पढने को मिलते हैं और अखबारों की पहुँच इतनी नहीं है जितनी कि टीवी की । टीवी वाले ऐसे समाचार भला क्यों दिखाएंगे जिससे चैनल की TRP बढ़ने की कोई उम्मीद ही नहीं ।
आशा है लोगों में जागरूकता आएगी और ऐसे ठगी के मामले और ज्यादा न होंगे ।
मैं 2003 में हरियाणा के ही धारुहेड़ा ( रेवाड़ी ) में रहा करता था । उस समय से ही यदा कदा हरियाणा से ऐसे समाचार पढ़ने को मिलते रहते थे । अब पानीपत में हूँ । यहाँ भी पिछले कुछ दिनों से आसपास के क्षेत्रों के ऐसे समाचार पढ़ने को मिल रहे हैं ।
ऐसे मामलों में अक्सर दो लोग सोने चाँदी के जेवर साफ़ करने की आवाजें लगते हुए गलियों में घूमते हैं । भोली भाली महिलाएं इन्हें बुलाकर पूछताछ करती हैं तो ये लोग बड़े सस्ते में ही जेवर साफ़ करने को तैयार हो जाते हैं । जेवर मँगाकर उन्हें पानी में डाला जाता है और कुछ मसाला भी महिलाओं को दिखाकर पानी में यह कहकर डाला जाता है कि इससे आधे घण्टे में जेवर साफ़ हो जाएंगे । इस पानी को आग पर गरम होने के लिए रख दिया जाता है ।
महिलाएं यूँ तो अपनी समझ से होशियारी से काम लेती हैं और टकटकी लगाए पूरा ध्यान जेवरों पर रखती हैं लेकिन जब उनसे पीने के लिए पानी माँगा जाता है या किसी अन्य बहाने से उन्हें दूर भेजा जाता है तो वे सम्मोहित सी उनके कहे अनुसार कार्य कर देती हैं । बस इसी समय ये लोग जेवर पानी से निकालकर अपने पास रख लेते हैं और यह कहकर वहाँ से चले जाते हैं कि आधे घण्टे बाद जब पानी ठण्डा हो जाए तो जेवर निकाले जा सकते हैं । जेवर साफ़ मिलेंगे । और वाकई जेवर ये लोग साफ़ कर ले जाते हैं । इसके बाद पछतावे के सिवाय कुछ नहीं मिलता । थाने में रिपोर्ट लिखवाइये । इधर उधर भागते रहिए । फ़िर कुछ नहीं होता ।
इसका इलाज केवल जागरूकता है । पर आश्चर्य है कि इतने सालों से एक ही तरीके से यह हो रहा है और लोग अब तक जागरूक नहीं हो सके ? दरअसल ऐसे समाचार अखबारों में ही पढने को मिलते हैं और अखबारों की पहुँच इतनी नहीं है जितनी कि टीवी की । टीवी वाले ऐसे समाचार भला क्यों दिखाएंगे जिससे चैनल की TRP बढ़ने की कोई उम्मीद ही नहीं ।
आशा है लोगों में जागरूकता आएगी और ऐसे ठगी के मामले और ज्यादा न होंगे ।
शनिवार, जुलाई 04, 2009
देश विकसित बने भी तो कैसे ?
जमाना बदल रहा है । पर जैसा कि हमेशा होता आया है बदलाव को स्वीकार करने वालों से ज्यादा लोग इसका विरोध कर रहे हैं । समलैंगिकता पर बहस करना आजकल एक फ़ैशन सा हो गया है । फ़िलहाल अधिकतर बहसों में इसके विरोधियों की संख्या ही अधिक मालूम होती है । सब काम छोड़कर लोगों को अचानक समाज की चिन्ता सताने लगी है । ऐसा लगता है कि समाज पर बहुत बड़ा संकट आ गया है । पर जो लोग समझदार हैं वे अल्पमत में होते हुए भी इसके समर्थन में डटे हुए हैं और बहुमत से लोहा ले रहे हैं । असल में यही वे लोग हैं जिन्हें समलैंगिकता को बढ़ावा देने के फ़ायदे समझ आ गए हैं बाकी तो यूँ ही बस ध्यानाकर्षण हेतु हो हल्ला कर रहे है ।
समझ लीजिए अगर समलैंगिकता को बढ़ावा दिया जाए और देश में समलैंगिकों की पर्याप्त संख्या हो जाए तो कई समस्याएं तो स्वयं ही VRS ले लेंगी ।
जिन्हें समाज में लगातार गिरते जारहे स्त्री पुरुष अनुपात की टेंशन लगी रहती है उन्हें अब निश्चिंत हो जाना चाहिए । जब स्त्री पुरुष अनुपात ही सन्दर्भहीन हो जाएगा तो इसके उठने या गिरने से किसी को का क्षति-लाभ ?
कुछ लोगों की शिकायत रहती है कि अगर दिन दूनी रात चौगुनी दर से बढ़ रही जनसंख्या पर लगाम कसी जा सके तो हमें विकसित देश का तमगा हासिल करने से ब्रह्मा भी नहीं रोक सकते । देश के विकसित होने की गारण्टी तो हम नहीं ले सकते पर इतना तय है कि जनसंख्या वृद्धि दर में अवश्य कमी आ जाएगी और यदि स्थितियां अनुकूल रहीं तो क्या पता जनसंख्या घटने भी लगे । फ़िर देश के विकसित होने की राह में इसके रोड़ा बनने का बहाना न चल सकेगा ।
आजकल परिवार में पति-पत्नी के बीच आए दिन झगड़े होते रहते हैं । कभी कभी तो यह झगड़े न्यायालय तक भी पहुँच जाते हैं और इनकी वजह से ज्यादा जरूरी मामलों को निपटाने के लिए अदालतों के पास समय की कमी हो जाती है । इन झगड़ों के होने का कारण दरअसल शक्तिसन्तुलन का न होना है । लेकिन जब टक्कर बराबरी की होगी तो झगड़े की स्थिति ही न बनेगी । समझ लीजिए जैसे दो परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों के बीच तनाव तो होता रहता है पर हमला कोई नहीं करता ।
बेचारी अबलाओं को तो जैसे मोक्ष ही मिल जाएगा । खूब चैन की बाँसुरी बजेगी ।
दहेज प्रथा जैसी बुराइयाँ अपना अस्तित्व खो देंगी । क्योंकि जब दोनों पक्ष बराबर हों तो कौन किसे दहेज देगा ?
जब समलैंगिकों का बहुमत हो जाएगा तो देश में लड़का-लड़की की शादी को अवैध और अप्राकृतिक करार दे दिया जा सकता है या इसे टैक्स के दायरे में लाया जा सकता है । जिससे देश की सरकार को काफ़ी राजस्व मिलने की संभावना है ।
दरअसल दूसरों की खुशियाँ देखकर विचलित हो जाने का गुण हमारे समाज में कूट कूटकर भरा गया है । इसीलिए तो इतने सारे फ़ायदों के बावजूद समाज का बहुमत समलैंगिकता के खिलाफ़ खड़ा नजर आ रहा है ।
बताइये , यह देश विकसित बने भी तो कैसे ?
समझ लीजिए अगर समलैंगिकता को बढ़ावा दिया जाए और देश में समलैंगिकों की पर्याप्त संख्या हो जाए तो कई समस्याएं तो स्वयं ही VRS ले लेंगी ।
जिन्हें समाज में लगातार गिरते जारहे स्त्री पुरुष अनुपात की टेंशन लगी रहती है उन्हें अब निश्चिंत हो जाना चाहिए । जब स्त्री पुरुष अनुपात ही सन्दर्भहीन हो जाएगा तो इसके उठने या गिरने से किसी को का क्षति-लाभ ?
कुछ लोगों की शिकायत रहती है कि अगर दिन दूनी रात चौगुनी दर से बढ़ रही जनसंख्या पर लगाम कसी जा सके तो हमें विकसित देश का तमगा हासिल करने से ब्रह्मा भी नहीं रोक सकते । देश के विकसित होने की गारण्टी तो हम नहीं ले सकते पर इतना तय है कि जनसंख्या वृद्धि दर में अवश्य कमी आ जाएगी और यदि स्थितियां अनुकूल रहीं तो क्या पता जनसंख्या घटने भी लगे । फ़िर देश के विकसित होने की राह में इसके रोड़ा बनने का बहाना न चल सकेगा ।
आजकल परिवार में पति-पत्नी के बीच आए दिन झगड़े होते रहते हैं । कभी कभी तो यह झगड़े न्यायालय तक भी पहुँच जाते हैं और इनकी वजह से ज्यादा जरूरी मामलों को निपटाने के लिए अदालतों के पास समय की कमी हो जाती है । इन झगड़ों के होने का कारण दरअसल शक्तिसन्तुलन का न होना है । लेकिन जब टक्कर बराबरी की होगी तो झगड़े की स्थिति ही न बनेगी । समझ लीजिए जैसे दो परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों के बीच तनाव तो होता रहता है पर हमला कोई नहीं करता ।
बेचारी अबलाओं को तो जैसे मोक्ष ही मिल जाएगा । खूब चैन की बाँसुरी बजेगी ।
दहेज प्रथा जैसी बुराइयाँ अपना अस्तित्व खो देंगी । क्योंकि जब दोनों पक्ष बराबर हों तो कौन किसे दहेज देगा ?
जब समलैंगिकों का बहुमत हो जाएगा तो देश में लड़का-लड़की की शादी को अवैध और अप्राकृतिक करार दे दिया जा सकता है या इसे टैक्स के दायरे में लाया जा सकता है । जिससे देश की सरकार को काफ़ी राजस्व मिलने की संभावना है ।
दरअसल दूसरों की खुशियाँ देखकर विचलित हो जाने का गुण हमारे समाज में कूट कूटकर भरा गया है । इसीलिए तो इतने सारे फ़ायदों के बावजूद समाज का बहुमत समलैंगिकता के खिलाफ़ खड़ा नजर आ रहा है ।
बताइये , यह देश विकसित बने भी तो कैसे ?
गुरुवार, जुलाई 02, 2009
देवी तेरी महिमा अपार
मैं होश सँभाला हूँ जब से ।
तुझको महसूस किया तब से ॥
तू मेरे साथ रही हरदम ।
खुशियाँ हों या घेरे हों गम ॥
मैं होता हूँ जब महफ़िल में ।
तू रहती है मेरे दिल में ॥
जब कभी अकेला होता हूँ ।
तेरे सपनों में खोता हूँ ॥
तू चुपके से आ जाती है ।
बस मुझे उठा ले जाती है ॥
पहुँचा देती है स्वप्नलोक ।
सपने देखूँ बेरोक-टोक ॥
मैं जो चाहूँ कर सकता हूँ ।
आश्चर्य ! न बिल्कुल थकता हूँ ॥
यह अखिल विश्व तारामण्डल ।
हो चन्द्र या कि हो सूर्य धवल ॥
मैं पहुँच गया सबसे ऊपर ।
पल में फ़िर आ धमका भू पर ॥
जीवन धरती से दूर जहाँ ।
मैं अन्तरिक्ष में गया वहाँ ॥
अनगिनत सभ्यताएं पलतीं ।
तेरे ही साँचों में धलतीं ॥
तू मन है तू ही है विचार ।
देवी तेरी महिमा अपार ॥
तुझमें ही बसते हैं ईश्वर ।
तू ब्रह्मा, तू विष्णु, तू हर ॥
तेरे ही कारण स्वर्ग, नर्क ।
राशियाँ मेष, वृष, कुम्भ, कर्क ॥
तू लाजवाब का है जवाब ।
बिन नींद दिखाती तु ही ख्वाब ॥
बिन तेरे मैं संबलविहीन ।
ज्यों योद्धा रण में शस्त्रहीन ॥
मैं कवि हूँ तू कल्पना, बता ।
बिन तेरे मेरी बिसात क्या ?
तुझको महसूस किया तब से ॥
तू मेरे साथ रही हरदम ।
खुशियाँ हों या घेरे हों गम ॥
मैं होता हूँ जब महफ़िल में ।
तू रहती है मेरे दिल में ॥
जब कभी अकेला होता हूँ ।
तेरे सपनों में खोता हूँ ॥
तू चुपके से आ जाती है ।
बस मुझे उठा ले जाती है ॥
पहुँचा देती है स्वप्नलोक ।
सपने देखूँ बेरोक-टोक ॥
मैं जो चाहूँ कर सकता हूँ ।
आश्चर्य ! न बिल्कुल थकता हूँ ॥
यह अखिल विश्व तारामण्डल ।
हो चन्द्र या कि हो सूर्य धवल ॥
मैं पहुँच गया सबसे ऊपर ।
पल में फ़िर आ धमका भू पर ॥
जीवन धरती से दूर जहाँ ।
मैं अन्तरिक्ष में गया वहाँ ॥
अनगिनत सभ्यताएं पलतीं ।
तेरे ही साँचों में धलतीं ॥
तू मन है तू ही है विचार ।
देवी तेरी महिमा अपार ॥
तुझमें ही बसते हैं ईश्वर ।
तू ब्रह्मा, तू विष्णु, तू हर ॥
तेरे ही कारण स्वर्ग, नर्क ।
राशियाँ मेष, वृष, कुम्भ, कर्क ॥
तू लाजवाब का है जवाब ।
बिन नींद दिखाती तु ही ख्वाब ॥
बिन तेरे मैं संबलविहीन ।
ज्यों योद्धा रण में शस्त्रहीन ॥
मैं कवि हूँ तू कल्पना, बता ।
बिन तेरे मेरी बिसात क्या ?
बुधवार, जुलाई 01, 2009
मानसून से मोर तक
अब लग रहा है कि मानसून जी आ गए हैं । वैसे नामानुकूल तो जैसा कि इनका नाम है मान+सून तो इनको जल्दी मान जाना चाहिए था पर इतने पर भी मान गए तो जल्दी ही समझा जाना चाहिए । अब आ गए हैं तो बारिश भी करेंगे । क्या है कि बड़े लोग जहाँ भी जाते हैं जरा देर से पहुँचते हैं और फ़िर घोषणाओं की झड़ी लगा देते हैं । घोषणाओं की बारिश करने में कोई रिस्क फ़ैक्टर तो है नहीं इसलिए घोषणा को अमल में लाया जा सकेगा या नहीं इसकी टेंशन प्राय: घोषणा करते समय न लेना ही उचित माना गया है । ऐसा कोई उदाहरण इतिहास में शायद न मिले जिसमें किसी झूठी घोषणा करने वाले को सजा हो गई हो ।
मानसून जी ने भी सोचा होगा, अबकी बार दिखा दिया जाय कि वे भी कम बड़े नहीं इसीलिए जरा देर से आए होंगे । अब बरसने की बारी है तो बरस भी रहे हैं और गरज गरजकर घोषणा भी करते जा रहे हैं या कहें कि झूठी घोषणा करने वालों को ललकार रहे हैं कि ,"इधर देखो ऐसे होते हैं बड़े । झूठी घोषणाओं की बारिश नहीं करते हम !"
अब मोर को पक्का भरोसा हो गया है कि अंग-प्रदर्शन का यही सुनहरा अवसर है और वह जहाँ मन होता है वहीं लंगोटी खोलकर नंगा नाच दिखाने लगता है । कोई शर्म नहीं , कोई लिहाज नहीं । कुछ चिड़ियों का सोचना है कि, "मोर को कम से कम इतना खयाल तो होना ही चाहिए कि वह राष्ट्रीय पक्षी है कोई आम चिड़िया नहीं । पर देखिए तो नंगई में आम चिड़ियों से मीलों आगे है । पता नहीं इसे राष्ट्रीय पक्षी किन परिस्थितियों में घोषित किया गया होगा । बोलिए तो दूसरी चिडियाँ राष्ट्रीय पक्षी क्यों नहीं बन सकतीं ? हमारी समझ से तो राष्ट्रीय पक्षी का भी निर्णय चुनाव से होना चाहिए । और अगर राष्ट्रीय पक्षी कोई ऐसी वैसी हरकत करता मिले तो उसके खिलाफ़ बाकायदा महाभियोग प्रस्ताव लाया जाना चाहिये । "
मोर ने जब यह सुना तो चिड़ियों को खूब लताड़ पिलाई । बोले ," हम बालिग हैं । कोई बच्चे नहीं । हमें भी अच्छे बुरे की समझ है । जैसे चाहें कपड़े पहनें या फ़िर न पहनें । हम क्या करें , क्या न करें इसमें किसी राय की जरूरत हमें नहीं है । हमारा जब मन होगा जहाँ मन होगा ऐसे ही नाचेंगे । जिसे अच्छा नहीं लगता वह हमारी तरफ़ देखे ही क्यों ?
और रही बात राष्ट्रीय पक्षी होने की तो मैं पद का लालची कभी नहीं रहा । त्यागपत्र जेब में लेकर घूमता हूँ । पर यह देना किसे है यही मालूम नहीं । यहाँ जान के लाले पड़े रहते हैं और आप हमें पद की धमकी दे रहे हैं । मुझे मारते समय क्या कोई सोचता है कि मैं राष्ट्रीय पक्षी हूँ इसलिए मुझ पर रहम किया जाय ?
बाघ भी तो राष्ट्रीय पशु है उससे कभी किसी ने सवाल किया है कि भाई तू राष्ट्रीय पशु है तो हिंसा क्यों करता है ? महात्मा गाँधी के देश में क्या राष्ट्रीय पशु बनाने के लिए बाघ ही मिला था ?"
रविवार, जून 28, 2009
गरमी की सरकार निरंकुश
गरमी की सरकार
निरंकुश, कोई रोक न टोक यहाँ ।
यदा कदा जो रहें
बरसते, हैं विपक्ष वे मेघ कहाँ ॥
सूर्य धूप तो देते
हैं, पर अब उनमें मृदुभाव नहीं ।
जब सरकार बन गई तो
जनता से रहा लगाव नहीं ।।
यूँ सरकार प्रमुख
का पद तो, गर्म हवा ने पाया है ।
लेकिन इसकी गरमी तो
बस, तेज धूप की माया है ॥
पंखों ने तो इसे
समर्थन, बिना शर्त ही दे डाला ।
कूलर सिर्फ़ नाम के
कूलर, उर में बसती है ज्वाला ॥
एसी सदा ध्यान रखते
हैं, बस अपने ही लोगों का ।
ये गैरों की ओर
बढ़ाते, बन्द लिफ़ाफ़ा रोगों का ॥
जो साधन सम्पन्न
लोग बस, उनसे ही यारी इनकी ।
उन्हें कदापि न
पहचानेंगे, खाली जेब पड़ी जिनकी ॥
कुएं विधायक
भूतपूर्व, ज्यों राजनीति हों छोड़ चुके ।
इनका फैशन पड़ा
पुराना, मतदाता मुंह मोड़ चुके ।।
एक समय था जब न,
ढूँढ़ने से मिलता नल सा दानी ।
गला स्वयं का सूख
रहा अब, हमको कैसे दे पानी ।।
दल-बदलू वे पेड़
जिन्होंने, गिरा दिए पत्ते अपने ।
कड़ी धूप में घनी
छाँव के, पूरे हो न सके सपने ।।
धूल असामाजिक है पर, पा मौन समर्थन
सरकारी ।
सबकी शुचिता भंग
करे, हो निडर फ़िरे अत्याचारी ॥
भले लोग बस आँख
बन्दकर, इसे सहन कर लेते हैं ।
जैसे नाविक तूफ़ानों
में, नौका अपनी खेते हैं ॥
बूढ़े बच्चों को
समझाते, " दुनिया आनी जानी है ।
जो उठता वह गिरता
भी है, सबकी यही कहानी है ॥
धीरज से लो काम हाल
यह, सदा नहीं रह पायेगा ।
कट-कट दाँत बजेंगे
ऐसा शीत भयंकर आयेगा ॥ "
शनिवार, जून 27, 2009
मेरे हाथों मर जाओगे
मेरी तुमसे न थी शत्रुता, फ़िर भी तुमने वार किया ।
मेरे ही घर आकर तुमने, मुझ पर अत्याचार किया ॥
मैं सोया तुमने शोर किया, मैंने समझा उसको लोरी ।
मैं करता रहा क्षमा तुमको, तुम समझे मेरी कमजोरी ॥
मैं चला अहिंसा के पथ पर, इसलिए न तुमको कष्ट दिया ।
पर तुमने उकसा उकसाकर, आखिर मुझको पथभ्रष्ट किया ॥
तुम रक्त-पिपासा के कारण ही, फ़िदायीन बन पाते हो ।
पर जैविक हमले करके तो, सब हदें पार कर जाते हो ॥
मैंने माना तुम क्षुद्र जीव, तुम तीसमारखाँ बनते हो ।
जितना अनदेखा करता हूँ, तुम और ऐंठकर तनते हो ॥
मुझमें कितनी है शक्ति, तुम्हें शायद इसका अहसास नहीं ।
यदि फ़ूँकूँ तो उड़ जाओगे, छू दूँ तो लोगे साँस नहीं ॥
सारा घर तुमको सौंप दिया, यह जगह चुनी अनजानी सी ।
तुम किन्तु यहां भी आ पहुँचे, यह बात लगी बेमानी सी ॥
मच्छर ! तुम बच न सकोगे अब, मेरे हाथों मर जाओगे ।
पर देकर अपनी जान हाय, हिंसक मुझको कर जाओगे ॥
सूचना : हर्ष का विषय है कि श्री समीर लाल जी 'उडनतश्तरी' वाले स्वप्नलोक पर टिप्पणियों का अर्धशतक ठोकने में कामयाब रहे हैं । उन्हें कम्पनी की ओर से बहुत बहुत बधाइयाँ !
गुरुवार, जून 25, 2009
मेरे प्यारे मानसून
पलक पाँवड़े बिछा रखे थे, इन आँखों में नींद न थी ।
आते आते रुक जाओगे, ऐसी तो उम्मीद न थी ॥
यद्यपि पहली बार नहीं यह, जब तुमने मुँह मोड़ा है ।
मुझे याद है तुमने मेरा पहले भी दिल तोड़ा है ॥
उत्सव की सब तैयारी थी, जबकि दिवाली-ईद न थी ।
आते आते रुक जाओगे, ऐसी तो उम्मीद न थी ॥
यूँ तो पानी मुझमें भी है, यह भी देन तुम्हारी है ।
तुम इतना तो मानो जनता, मेरी नहीं हमारी है ॥
छोड़ा साथ अचानक तुमने, पहले से ताकीद न थी ।
आते-आते रुक जाओगे ऐसी तो उम्मीद न थी ॥
तुम तो कहकर अलग पड़ोगे,"मेरी कोई खता नहीं " ।
कितने लोग रहेंगे भूखे, शायद तुमको पता नहीं ॥
था सम्बन्ध सनातन अपना,बिक्री और खरीद न थी ।
आते-आते रुक जाओगे, ऐसी तो उम्मीद न थी ॥
तुम आते हो और बरसकर खुद को हल्का करते हो ।
अनजाने ही सही, किन्तु मेरी भी पीड़ा हरते हो ॥
मेरे प्यारे मानसून कब, वसुधा तेरी मुरीद न थी ।
आते-आते रुक जाओगे ऐसी तो उम्मीद न थी ॥
पलक पाँवड़े बिछा रखे थे, इन आँखों में नींद न थी ।
शनिवार, जून 13, 2009
स्वप्नलोक में फ़िर स्वागत है !
फ़ेर न पायें जिन्हें पाठ वे,
जल्दी बहुत विसरते हैं .
एक बार फ़िर से बतला दो,
ब्लॉगिंग कैसे करते हैं .
तारतम्य सा टूट गया है,
कोई विषय नहीं मिलता .
कीचड़ है मौजूद अभी भी,
लेकिन कमल नहीं खिलता .
जिस ब्लॉगिंग बिन चैन नहीं था,
उसको छोड़ जिये कैसे ?
परखा स्टेमिना स्वयं ही,
निकल गए इस लत में से .
प्रथम सूत्र यह फ़ुरसतिया का,
पालन हुआ सफ़लता से .
कार्य कठिन था फ़िर भी हमने,
पूरा किया चपलता से .
निपटाये सब काम जरूरी,
अब फ़िर से फ़ुरसत पाई .
चलो गिरा दें सब दीवारें,
और पाट दें सब खाई .
स्वप्नलोक में फ़िर स्वागत है,
सपने फ़िर से देखेंगे .
शायद अब हम जल्दी जल्दी,
यहाँ हाज़िरी दे देंगे ..
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