बुधवार, अक्तूबर 13, 2010

वर्धा के गलियारों से (कुछ झूठ कुछ सच )

  वर्धा ब्लॉगर सम्मलेन  के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है . हम भी कुछ आँखों देखा कानों सुना न कह लें तब यह कैसे लगेगा की हम वर्धा गए थे ?
वर्धा के गलियारों से (कुछ झूठ कुछ सच )
 प्रयास किया गया था की सभी विचारधाराओं के प्रतिनिधि  ब्लागरों को  बुलाया जाय . विचारधारा के चर्चे  यहाँ कभी कभार सुनाई भी दे रहे थे . मसलन एक ख़ास विचारधारा वाले ब्लॉगर दूसरी ख़ास विचारधारा वाले ब्लॉगर को कमरे में बंद करके टहलने चले गए .

कहा तो यह भी जा रहा है की विचारधाराओं के टकराव की वजह से ही कुछ ब्लागरों ने आना टाल दिया क्योंकि उनको भनक लग गयी थी कि विरोधी विचारधारा वाले पहले ही पहुंचकर कब्जा जमा सकते हैं .

ब्लागरों के ठहरने  के  लिए कमरों का इंतजाम भी विचाराधारा के अनुसार किया गया था . दक्षिणपंथियों  को दक्षिण में और उत्तरपंथियों को उत्तर में कमरे मिले हुए थे . जो लोग विचारधारा से जितना ऊपर उठ चुके हैं उन्हें उतना ही ऊपर कमरा दिया गया था .

सेवाग्राम आश्रम देखने  गए ब्लागरों ने शिकायत की कि गांधीजी स्वयं टब में स्नान करते थे तो बा के स्नानगृह में टब की व्यवस्था क्यों नहीं कराई गयी गयी ?

विनोबा भावे आश्रम देखने गए लोगों में से कई ब्लॉगर पवनार नदी में कूदकर नहाने के इच्छुक थे जैसे तैसे मनाने  पर  बड़ी मुश्किल से वे माने .

एक ब्लॉगर सड़क पर जोश में बेतहाशा भाग रहा था . बेचारा ठोकर लगाने से गिर गया और घुटनों में और माथे पर काफी चोट खा गया .

एक ब्लॉगर कैमरा और लैपटाप किसी पडौसी से मांग लाए थे . पर इतने से ही काम कैसे चलता ? उनको चलाना  भी तो आना चाहिए ? बड़ी मुश्किल से बात फैलने से रोकी गयी .

कार्यशाला में उपस्थित  विद्यार्थियों को शायद ब्लॉग बनाने में ज्यादा दिलचस्पी  नहीं थी इसीलिए दो समूहों  में से एक समूह  के विद्यार्थियों ने दूसरे समूह और बस के  जाने का हवाला देकर अपनी जान छुड़ाई और भाग निकले . 

ज्यादातर ब्लॉगर बिना परिचय के एक दूसरे को पहचान नहीं सके . आप ब्लॉग पर तो ऐसे दिखते हैं वैसे दिखते हैं आदि वाक्य बहुतायत में सुनने  को मिले . 

कई महिला ब्लागरों से जब बातचीत  के बहाने उनकी असल उम्र पूछने की कोशिश की गयी तो वे साफ़ इनकार कर गईं .

कुछ ब्लॉगर दूसरों को अपनी डिग्रियां गिनाने में लगे रहे . सुनने वाले ब्लागरों को बाद में छुपकर कान खुजलाते देखा गया .

सम्मलेन में आलआउट   नाम के एक ब्लॉगर को भी बुलाया गया था ताकि मच्छरों की समस्या से निजात मिल सके .

ब्लॉगर सम्मलेन का आयोजन करने वाले  महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी  विश्वविद्यालय के सम्बन्ध में एक  ब्लॉगर का मासूम सवाल था कि जब यह विश्वविद्यालय है तो फिर नाम में अंतरराष्ट्रीय लिखने की क्या जरूरत है ? विश्वविद्यालय तो पहले ही अंतरराष्ट्रीय होता है .  इसका जबाब कम से कम हमारे  पास तो नहीं था . 

खाने पीने की व्यवस्था टनाटन थी . यहाँ तक कि आते समय रास्ते के लिए भी परोसा दिया गया था . चाय पीने के लिए किसी को बाहर जाने की आवश्यकता न थी . मजे की बात तो यह कि चाय में कितनी चीनी डालनी है इसकी स्वतन्त्रता हर  ब्लॉगर को थी .

हाँ दवाओं की व्यवस्था ज़रा सोचनीय थी . एक ब्लॉगर को डिस्प्रिन माँगते  हुए देखा गया . लेकिन लोग उसे पैरासीटामौल ऑफर कर रहे थे .
कुछ  ऐसे ब्लॉगर भी मिले जिन्हें लोग अलग अलग समझते थे लेकिन वहां पता चला कि वे एक ही परिवार के सदस्य हैं .
कुछ ब्लॉगर  अपने जीवनसाथी को तो कुछ अपने भाई या बहन को लेकर पधारे थे .  

कुछ महिला ब्लागरों को  एक नौसिखिये ब्लॉगर को एकान्त में हड़काते देखा गया . बेचारे ब्लॉगर ने जैसे तैसे पीछा छुडाया .

अंतिम समय में सभी ब्लॉगर को एक दूसरे से फोटो आदान प्रदान करते देखा गया .  वैसे तो सभी ब्लॉगर पेनड्राइव, मेमोरीकार्ड, मोबाइल, कैमरा, लैपटाप आदि से लैस होकर मौक़ा-ए-वारदात पर  पधारे थे . किन्तु  एक ठो  ब्लॉगर ने बहाना बनाया कि उसका  मोबाइल ट्रेन में गुम हो गया है . इसपर दूसरे ब्लागरों ने आयोजक से मौज ली कि मोबाइल की क्षतिपूर्ती होनी चाहिए . इस पर एक स्वस्थ बहस की शुरूआत हो गयी जो नाश्ता आते ही ख़त्म भी हो गयी .

जाते जाते कुछ लोग साथियों को  हिदायत देते देखे गए  कि उनके फोटो मेल से उन्हें भेज दिए जायं .

35 टिप्‍पणियां:

  1. ई तो भंडाफ़ोड है जी ..हम तो सोचिए रहे थे कि अभी तकले एको ठो भंडाफ़ोड रपट नहीं आया है ..लो आ गया न ..सब सच है एक दम टनाटन सच ..झूठे कहीं के ..हुंह जाओ कुट्टा कुट्टा

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  2. यह आँखों देखा हाल सबसे अच्छा रहा ....
    शुभकामनायें !

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  3. भाई विवेक तुमने हमसे उम्र नहीं पूछी थी, यदि पूछी होती तो एकदम सच ही बताते कि अभी तो हम ब्‍लाग जगत में दो वर्ष भी पूरे नहीं कर पाए हैं। कुछ-कुछ बोल लेते हैं और हाँ चलना आ गया है। इतनी सी क्‍या रपट, और भी कुछ लिखते ना?

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  4. जिस ब्लॉगर का घुटना और माथा चोटग्रस्त हुआ था वह दूसरे ब्लॉगर्स से मिलने की बात सुनते ही उठ खड़ा हुआ और आँसू पोछकर गेस्ट हाउस की ओर दौड़ पड़ा। चोट खाने का कोई मलाल न रहा।

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  5. और इसी बीच हम अपनी पहचान बताये बिना एक स्टुडेंट की तरह क्लास लेकर चल दिए.. किसी को कानो कान भनक नहीं लगने दी..

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  6. हा हा हा क्या खूब अंदाज है.... मजा आ गया. एक बार फिर से पढ़ता हूँ मेरा भाँड़ा तो नहीं फूटा कहीं :)

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  7. हाँ ये हुई रिपोर्ट… अब हम भी ऐसी ही बनायेंगे…
    बकिया सब तो दूसरे लोग बता ही दिये हैं… नया कुछ बताने में मजा आयेगा ना… :)

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  8. @ जो लोग विचारधारा से जितना ऊपर उठ चुके हैं उन्हें उतना ही ऊपर कमरा दिया गया था .

    इस विचारधारा के हिसाब से तो आप सभी blogger जो वहां पहुंचे थे, तो आप लोग भी ऊपर उठ चुके लोग हैं क्योंकि सुना है वर्धा समुद्र तल से काफी उंचाई पर स्थित है :)

    मैं भी उपर उठना चाहता था लेकिन आ नहीं पाया सो अलग बात है।

    पोस्ट मजइत अंदाज में कुछ कुछखुरपेंचियात्मक सी लग रही है :)

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  9. ` विचारधाराओं के टकराव .......'
    आचार संहिता से?????????????? :)

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  10. एक बड़ी दुर्घटना ने बहुत सी छोटी दुर्घटनाओं से हमें बचा लिया।

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  11. विवेक जी
    आपने इस पोस्ट को व्यंग से भरने का प्रयास तो किया है लेकिन इसमें झूठ का ज्यादा सहारा लिया है जिसके बदले आपके सामने सत्य की भरमार थी जिसे आप व्यंग के लिए प्रयोग कर सकते थे ..जैसे पहले दिन आलोक धन्वा जी ने कहा था की ब्लोगिंग की स्थिति अभी रेलगारी के अविष्कार के समय की स्थिति के समान है जब लोग रेलगारी पर चढ़ने से डरते थे और लोगों को भी उस पर चढ़ने से यह कह कर रोकते थे की इस पर चढो लेकिन अगर यह चल गयी और नहीं रुकी तो उसके अंजाम के लिए भी सोच लो ...?

    दरअसल आज लोग आलोचना का बहाना ढूंढ़तें है ऐसे में अगर उन्हें थोडा सा भी धुआं दीखता है तो उससे पूरी बस्ती जलाने का प्रयास भी करने से बाज नहीं आतें हैं और ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है इस ब्लॉग जगत में ..इसलिए मुझे इस सन्दर्भ से देखने पर आपका यह व्यंग ठीक नहीं लगा ..वैसे अपना-अपना विचार है ....मेरा तो यही आग्रह है की हम सब सार्थक लिखें तो बेहतर होगा ...

    सिद्धार्थ जी की बात से मैं भी सहमत हूँ की जिस ब्लॉगर का घुटना और माथा चोटग्रस्त हुआ था वह दूसरे ब्लॉगर्स से मिलने की बात सुनते ही उठ खड़ा हुआ और आँसू पोछकर गेस्ट हाउस की ओर दौड़ पड़ा। चोट खाने का कोई मलाल न रहा। इसमें मैं इतना और जोड़ना चाहूँगा की ये महाशय भावी ब्लोगर हैं लेकिन इनका नाम ब्लॉग के रूप में मशहूर हो चूका है और इनका उत्साह किसी अनुभवी ब्लोगर से कम नहीं दिखा इस ब्लोगर संगोष्ठी में ..

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  12. - अरे, तब तो हम विचारधारा से कत्तई ऊपर नहीं उठे हैं. एक ठौ हमीं सब से नीचे रह रहे थे.

    - `जिस ब्लॉगर का घुटना और माथा चोटग्रस्त हुआ था वह दूसरे ब्लॉगर्स से मिलने की बात सुनते ही उठ खड़ा हुआ और आँसू पोछकर गेस्ट हाउस की ओर दौड़ पड़ा। चोट खाने का कोई मलाल न रहा।' वह नन्हा ब्लॉगर हमारी गोद में अपनी पीड़ा भूल कर मुस्काने भी तो लगा था.

    - क्या क्या याद दिला दिया तुमने. कई मनोहारी चित्र कौंध गए

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  13. मजेदार जी वेसे आप तारीफ़ कर रहे हे या उन सब की पोल खोल रहे हे:)

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  14. पोल तो अब खुलेगी ?
    कुछ ब्‍लॉगर
    वो ब्‍लॉगर
    आचार संहिता
    नैतिकता
    नाम किसी का
    नहीं लिखा।

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  15. हम्म अब कम्पलीट हुई वर्धा की ख़बर :)

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  16. ये अंदाज भी सटीक रहा...मुन्नी खामखां बदनाम हुई.

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  17. 6/10

    नया अंदाज - मनोरंजक प्रस्तुति

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  18. हम तो ब्लॉग्गर नहीं हैं। हम को कोई नहीं पूछेगा।
    क्या कभी टिप्प्णीकारों का एक सम्मेलन आयोजित किया जाएगा?
    उसमें भाग लेने के लिए हम "क्वालिफ़ाइड" हैं, जी।

    पढकर मज़ा आ गया।
    शुभकामनाएं
    जी विश्वनाथ

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  19. हा हा ! विवेक ये है असली विवेकिया पोस्ट, वहीं जानी पहचानी लेखनी की धार व्यंग की स्याही में डूबी हुई, मजा आ गया। वो जो पड़ौसियों से लेपटॉप और केमरा मांग लाये थे उनकी मदद करते तुम फ़ोटो में बंद हो प्रमाण स्वरूप्। बहुत सी यादें ताजा कर दीं तुम्हारी इस पोस्ट ने, कमाल की ओबसर्वेशन है तुम्हारी और यादाश्त भी…:)

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  20. Mere to kuchh samajh nahi aaya bhai sahab ye kya sammelan hai aur kaun karata hai.. agar mujhe bhi jankari bhejengey to badi kripa hogi..
    mai bhi kisi kone se us bheed me ghusne ki koshish karunga.. jaha bade budhijiviyo ki sangat mil sake.

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  21. Lagta hai Mahatma Gandhi Hindi Vishwavidyalaya men saare moorkh wahan ka blog chala rahe hain . Shukrawari ki ek 15 November ki report Priti Sagar ne post ki hai . Report is not in Unicode and thus not readable on Net …Fraud Moderator Priti Sagar Technically bhi zero hain . Any one can check…aur sabse bada turra ye ki Siddharth Shankar Tripathi ne us report ko padh bhi liya aur apna comment bhi post kar diya…Ab tripathi se koi poonche ki bhai jab report online readable hi nahin hai to tune kahan se padh li aur apna comment bhi de diya…ye nikammepan ke tamashe kewal Mahatma Gandhi Hindi Vishwavidyalaya, Wardha mein hi possible hain…. Besharmi ki bhi had hai….Lagta hai is university mein har shakh par ullu baitha hai….Yahan to kuen mein hi bhang padi hai…sab ke sab nikamme…

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  22. Praveen Pandey has made a comment on the blog of Mahatma Gandhi Hindi University , Wardha on quality control in education...He has correctly said that a lot is to be done in education khas taur per MGAHV, Wardha Jaisi University mein Jahan ka Publication Incharge Devnagri mein 'Web site' tak sahi nahin likh sakta hai..jahan University ke Teachers non exhisting employees ke fake ICard banwa kar us per sim khareed kar use karte hain aur CBI aur Vigilance mein case jaane ke baad us SIM ko apne naam per transfer karwa lete hain...Jahan ke teachers bina kisi literary work ke University ki web site per literary Writer declare kar diye jaate hain..Jahan ke blog ki moderator English padh aur likh na paane ke bawzood english ke post per comment kar deti hain...jahan ki moderator ko basic technical samajh tak nahi hai aur wo University ke blog per jo post bhejti hain wo fonts ki compatibility na hone ke kaaran readable hi nain hai aur sabse bada Ttamasha Siddharth Shankar Tripathi Jaise log karte hain jo aisi non readable posts per apne comment tak post kar dete hain...sach mein Sudhar to Mahatma Handhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya , Wardha mein hona hai jahan ke teachers ko ayyashi chod kar bhavishya mein aisa kaam na karne ka sankalp lena hai jisse university per CBI aur Vigilance enquiry ka future mein koi dhabba na lage...Sach mein Praveen Pandey ji..U R Correct.... बहुत कुछ कर देने की आवश्यकता है।

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  23. MAHATMA Gandhi Hindi University , Wardha ke blog per wahan ke teacher Ashok nath Tripathi nein 16 november ki post per ek comment kiya hai …Tripathi ji padhe likhe aadmi hain ..Wo website bhi shuddha likh lete hain..unhone shayad university ke kisi non exhisting employee ki fake id bhi nahin banwai hai..aur unhone program mein present na rahne ke karan pogram ke baare mein koi comment nahin kia..I respect his honesty ..yahan to non readable post per bhi log apne comment de dete hain...really he is honest...Unhen salaam….

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  24. महोदय/महोदया
    आपकी प्रतिक्रया से सिद्धार्थ जी को अवगत करा दिया गया है, जिसपर उनकी प्रतिक्रया आई है वह इसप्रकार है -

    प्रभात जी,
    मेरे कंप्यूटर पर तो पोस्ट साफ -साफ़ पढ़ने में आयी है। आप खुद चेक कीजिए।
    बल्कि मैंने उस पोस्ट के अधूरेपन को लेकर टिप्पणी की है।
    ये प्रीति कृष्ण कोई छद्मनामी है जिसे वर्धा से काफी शिकायतें हैं। लेकिन दुर्भाग्य से इस ब्लॉग के संचालन के बारे में उन्होंने जो बातें लिखी हैं वह आंशिक रूप से सही भी कही जा सकती हैं। मैं खुद ही दुविधा में हूँ।:(
    सादर!
    सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
    महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
    वर्धा, महाराष्ट्र-442001
    ब्लॉग: सत्यार्थमित्र
    वेबसाइट:हिंदीसमय

    इसपर मैंने अपनी प्रतिक्रया दे दी है -
    सिद्धार्थ जी,
    मैंने इसे चेक किया, सचमुच यह यूनिकोड में नहीं है शायद कृतिदेव में है इसीलिए पढ़ा नही जा सका है , संभव हो तो इसे दुरुस्त करा दें, विवाद से बचा जा सकता है !

    सादर-
    रवीन्द्र प्रभात

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  25. There is an article on the blog of Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya , Wardha ‘ Hindi-Vishwa’ of RajKishore entitled ज्योतिबा फुले का रास्ता ..Article ends with the line.....दलित समाज में भी अब दहेज प्रथा और स्त्रियों पर पारिवारिक नियंत्रण की बुराई शुरू हो गई है…. Ab Rajkishore ji se koi poonche ki kya Rajkishore Chahte hai ki dalit striyan Parivatik Niyantran se Mukt ho kar Sex aur enjoyment ke liye freely available hoon jaisa pahle hota tha..Kya Rajkishore Wardha mein dalit Callgirls ki factory chalana chahte hain… besharmi ki had hai … really he is mentally sick and frustrated ……V N Rai Ke Chinal Culture Ki Jai Ho !!!

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  26. महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय वर्धा के ब्लॉग हिन्दी-विश्‍व पर २ पोस्ट आई हैं.-हिंदी प्रदेश की संस्थाएं: निर्माण और ध्वंस और गांधी ने पत्रकारिता को बनाया परिवर्तन का हथियार .इन दोनों में इतनी ग़लतियाँ हैं कि लगता है यह किसी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय का ब्लॉग ना हो कर किसी प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे का ब्लॉग हो ! हिंदी प्रदेश की संस्थाएं: निर्माण और ध्वंस पोस्ट में - विश्वविद्यालय,उद्बोधन,संस्थओं,रहीं,(इलाहबाद),(इलाहबाद) ,प्रश्न , टिपण्णी जैसी अशुद्धियाँ हैं ! गांधी ने पत्रकारिता को बनाया परिवर्तन का हथियार- गिरिराज किशोर पोस्ट में विश्वविद्यालय, उद्बोधन,पत्नी,कस्तूरबाजी,शारला एक्ट,विश्व,विश्वविद्यालय,साहित्यहकार जैसे अशुद्ध शब्द भरे हैं ! अंधों के द्वारा छीनाल संस्कृति के तहत चलाए जा रहे किसी ब्लॉग में इससे ज़्यादा शुद्धि की उम्मीद भी नहीं की जा सकती ! सुअर की खाल से रेशम का पर्स नहीं बनाया जा सकता ! इस ब्लॉग की फ्रॉड मॉडरेटर प्रीति सागर से इससे ज़्यादा की उम्मीद भी नहीं की जा सकती !

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