पिछ्ली पोस्ट में हमने आपको बताया था कि एक और अंग्रेजी कविता लिखने का प्रयास जारी था । वह कविता आखिर हमने लिख ही डाली है । बच्चे को रटने हेतु लिखकर देदी गयी है । आपको भी एक प्रति उपलब्ध करायी जा रही है ।
पिछली पोस्ट पर अंग्रेजी कविता पढ़कर श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी को ताव आ गया था । लिहाजा उन्होंने कविता का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत कर दिया, वह ऐसा जिसे पढ़कर हम उनके भक्त हो गए हैं ।
वास्तव में अंग्रेजी पोस्ट ठेलते समय हमारे मन में थोड़ी झिझक अवश्य थी और हमने भी उसका हिन्दी अनुवाद छापने का मन बनाया था । लेकिन कविता का कविता में ही अनुवाद करना वह भी बिना मूलभाव को बदले हमसे न हो सका ।
वह तो भला हो त्रिपाठी जी के ताव का जो उनसे ऐसी सुन्दर कविता लिखवा डाली । वैसे हमें विश्वास नहीं होता कि अंग्रेजी कविता पढ़कर किसी को ताव(बुखार) आ सकता है और उसके कारण आदमी अनुवाद करने लग जाता है । अवश्य ही ताव आने का कारण रात को देर तक जागना रहा होगा जिसके त्रिपाठी जी अभ्यस्त नहीं हैं ।
पर इस सबसे आपको क्या आप तो कविता पढ़िये । लेकिन पहले पिछली पोस्ट पर ठेली गयी अंग्रेजी कविता का त्रिपाठी जी द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है :
गलती मेरी नहीं है काफी
प्रभुजी दे दो फिर भी माफी
मैं गरीब तू बड़ा महान
भाग्यविधाता लूँ मैं मान
पर इतना तुम रखना ध्यान
नर, नाहर, बिल्ली और श्वान
सबको रखता एक समान
मौन प्रहार करे भगवान
जिसने परपीड़ा पहुँचाई
वह अभिशप्त रहेगा भाई
निर्बल को मारन है पाप
दुनिया कहती सुन लो आप
सुन उपदेश शिकारी भड़का
ले बन्दूक जोर से कड़का
धाँय-धाँय... पर नहीं तड़पना
शुक्र खुदा का यह था सपना
अब अंग्रेजी की दूसरी कविता :
We were waiting for monsoon,
asking,"Is it late or soon ?"
In temples, farmers worshipped.
Finally it arrived.
Then the rainy season came.
Sun played a hide and seek game.
clouds called the wind to help.
Sun too surrendered himself.
It began a heavy rain,
that stopped the bus and train.
All around water filled.
Elders worried, children thrilled.
शायद फिर किसी को ताव आ जाए तो एक और कविता मिले हिन्दी को ।
संभव है कि इस ब्लॉग पर लिखी बातें मेरी विचारधारा का प्रतिनिधित्व न करती हों । यहाँ लिखी बातें विभिन्न दृष्टिकोणों से सोचने का परिणाम हैं । कृपया किसी प्रकार का पूर्वाग्रह न रखें ।
मंगलवार, जुलाई 13, 2010
रविवार, जुलाई 11, 2010
Tiger's Nightmare
प्रस्तुत कविता बच्चे के स्कूल के लिए लिखी गई थी, ताकि वह इसे मंच पर सुना सके । लेकिन लिखने के बाद लगा कि कुछ गम्भीर हो गई । इसलिए स्कूल के लिए दूसरी कविता लिखने का प्रयास जारी है । इसे ब्लॉग पर डाल दिया है । पड़ी रहेगी । क्या पता कोई पढ़ ही ले ।

“Though I have done no mistake,
Excuse me for God’s sake.
I am poor, you are great.
You are master of my fate.
But remember always that,
human, lion, dog or cat,
all creatures are same for God.
No sound is, in his rod.
He, who will afflict others,
will be facing horrid curse.
Killing weak is not correct.
This is universal fact.”
Listening this the hunter said,
“Don’t teach me good and bad.”
Gun fire ! but no scream ?
Thank God it was a dream !
“Though I have done no mistake,
Excuse me for God’s sake.
I am poor, you are great.
You are master of my fate.
But remember always that,
human, lion, dog or cat,
all creatures are same for God.
No sound is, in his rod.
He, who will afflict others,
will be facing horrid curse.
Killing weak is not correct.
This is universal fact.”
Listening this the hunter said,
“Don’t teach me good and bad.”
Gun fire ! but no scream ?
Thank God it was a dream !
बुधवार, जून 23, 2010
समथिंग डिफ़रेण्ट करो जी
लाइफ में रखिए सदा, पॉज़ीटिव ऐप्रोच ।
ओल्ड थॉट्स को बेचकर, ब्रिंग होम न्यू सोच ॥
ब्रिंग होम न्यू सोच, ज़माना नया आ गया ।
अखिल वर्ल्ड स्टोरी में, न्यू ट्विस्ट आ गया ॥
विवेक सिंह यों कहें, ओल्ड को अलग धरो जी ।
दिल कहता है, अब समथिंग डिफ़रेण्ट करो जी ॥
शनिवार, मई 15, 2010
बचपन करे कठिन मजदूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
हमने करी तरक्की काफी
लेकिन अभी अधूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
नंगे पैर घूमता दिनभर
पालीथिन भी उठा उठाकर
हों न जरूरत पूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
रातों में देर तक जागता
प्लेटफार्म पर बोल भागता
"लो पेठा अंगूरी"
बचपन करे कठिन मजदूरी
रोज चाय के गिलास धोता
पिटने पर भी कभी न रोता
पिटाई लगने लगी जरूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
पीने में बस पानी पीता
रूखी-सूखी खाकर जीता
रोटियां भी न मिलें तंदूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
चाचा नेहरू ? नहीं जानता
बाल-दिवस को नहीं मानता
न जाने शिमला, मंसूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
पता नहीं कब बडा हो गया
मिला न उसको कभी कुछ नया
कुछ न कुछ सदा रही मजबूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
हमने करी तरक्की काफी
लेकिन अभी अधूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
हमने करी तरक्की काफी
लेकिन अभी अधूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
नंगे पैर घूमता दिनभर
पालीथिन भी उठा उठाकर
हों न जरूरत पूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
रातों में देर तक जागता
प्लेटफार्म पर बोल भागता
"लो पेठा अंगूरी"
बचपन करे कठिन मजदूरी
रोज चाय के गिलास धोता
पिटने पर भी कभी न रोता
पिटाई लगने लगी जरूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
पीने में बस पानी पीता
रूखी-सूखी खाकर जीता
रोटियां भी न मिलें तंदूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
चाचा नेहरू ? नहीं जानता
बाल-दिवस को नहीं मानता
न जाने शिमला, मंसूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
पता नहीं कब बडा हो गया
मिला न उसको कभी कुछ नया
कुछ न कुछ सदा रही मजबूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
हमने करी तरक्की काफी
लेकिन अभी अधूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
रविवार, अप्रैल 25, 2010
आल्हा ए आईपीएल
आई पी एल तीसरी पारी धूमधाम से हुइ आगाज़ ।
आकर्षण कुछ कहा न जाए, मंत्री चले छोड़कर राज ॥
खिलाड़ियों की पैंठ लगाकर मोलभाव की हुई शुरुआत ।
जिस कम्पनी पै जैसा पैसा लिए खिलाड़ी वैसे साथ ॥
पाकिस्तानी नहीं बिक सके पूरा हुआ पैंठ व्यापार ।
अफ़रीदी यह पचा न पावै खूब मचाई चीख पुकार ॥
उदघाटन हो गया अन्त में इसका जोश कहा ना जाय ।
जिनके पास न अपना टीवी उनसा कोई अभागा नाय ॥
हल्ला हो गया बड़े टिकिट का हुई इनामों की बौछार ।
नेता भागे इसके पीछे छोड़ चुनावी टिकिट पिछार ॥
चीयर लीडर लगीं नाचने होने लगे मैच पर मैच ।
बड़े खिलाड़ी छक्का मारें छोटे छोड़ रहे थे कैच ॥
आतंकी भी भरे जोश में फोड़ दिये बम भी दो चार ।
फिर भी मैच न रुका देखकर भाग गए सब हिम्मत हार ॥
आईपीएल की बातें हों और मोदी का ले नाम न कोय ।
अब तक एसा कभी न देखा, ना भविष्य में शायद होय ॥
फ्रेंचाइजियों की बल्ले बल्ले मिला लक्ष्मी का वरदान ।
नहीं टैक्स का कोई चक्कर करते खूब पुण्य अरु दान ॥
जनता पैसा लुटा रही थी लूटो जितना लूटा जाय ।
बँटवारे में चूक हो गई, बनी बात अब बिगड़ी हाय ॥
सत्यानाश ट्विटर का जिसने, किंचित राज दिए खुलवाय ।
कान खड़े नेतन के हुइ गए, नथुने खूब रहे फड़काय ॥
बात निकलकर संसद पहुँची, नेता खूब ले रहे मौज़ ।
धक्का मुक्की मारपीट ना, ना गाली ना कोई गलौज़ ॥
सबको चिन्ता, पछतावा यह मौका हम कैसे गए चूक ।
मंत्री जी को जाना होगा, माँग करी सबने दो टूक ॥
प्रेम कहानी ने आखिर ले लिया प्रेमियों का बलिदान ।
दोनों ने अपने पद छोड़े, आग लगी हो ज्यों खलिहान ॥
यहाँ की बातें यहीं छोड़कर, मोदी के जानें हालात ।
सीना फूला जाय गर्व से, दुश्मन को क्या दी है मात ॥
मोदी वीर नाम है मेरा, सेकिण्डन में दिया पछाड़ ।
आशिर्वाद पवार देव का, सकै न दुश्मन कच्छु बिगाड़ ॥
होनी को मंजूर और था, ढीले पड़ गए देव पवार ।
मोदी वीर काँपते थर थर, खड़ी सामने दिखती हार ॥
चीयर लीडर, चौके-छक्के, कुछ भी अच्छा लगता नाय ।
पतली गली निकल भागूँगा, आईपीएल भाड़ में जाय ॥
ऐसे कैसे भाग सकोगे, हिसाब चुकता करते जाउ ।
अभी फ़ाइनल कहाँ हुआ है, देखें हू विल विन, एण्ड हाउ ?
आकर्षण कुछ कहा न जाए, मंत्री चले छोड़कर राज ॥
खिलाड़ियों की पैंठ लगाकर मोलभाव की हुई शुरुआत ।
जिस कम्पनी पै जैसा पैसा लिए खिलाड़ी वैसे साथ ॥
पाकिस्तानी नहीं बिक सके पूरा हुआ पैंठ व्यापार ।
अफ़रीदी यह पचा न पावै खूब मचाई चीख पुकार ॥
उदघाटन हो गया अन्त में इसका जोश कहा ना जाय ।
जिनके पास न अपना टीवी उनसा कोई अभागा नाय ॥
हल्ला हो गया बड़े टिकिट का हुई इनामों की बौछार ।
नेता भागे इसके पीछे छोड़ चुनावी टिकिट पिछार ॥
चीयर लीडर लगीं नाचने होने लगे मैच पर मैच ।
बड़े खिलाड़ी छक्का मारें छोटे छोड़ रहे थे कैच ॥
आतंकी भी भरे जोश में फोड़ दिये बम भी दो चार ।
फिर भी मैच न रुका देखकर भाग गए सब हिम्मत हार ॥
आईपीएल की बातें हों और मोदी का ले नाम न कोय ।
अब तक एसा कभी न देखा, ना भविष्य में शायद होय ॥
फ्रेंचाइजियों की बल्ले बल्ले मिला लक्ष्मी का वरदान ।
नहीं टैक्स का कोई चक्कर करते खूब पुण्य अरु दान ॥
जनता पैसा लुटा रही थी लूटो जितना लूटा जाय ।
बँटवारे में चूक हो गई, बनी बात अब बिगड़ी हाय ॥
सत्यानाश ट्विटर का जिसने, किंचित राज दिए खुलवाय ।
कान खड़े नेतन के हुइ गए, नथुने खूब रहे फड़काय ॥
बात निकलकर संसद पहुँची, नेता खूब ले रहे मौज़ ।
धक्का मुक्की मारपीट ना, ना गाली ना कोई गलौज़ ॥
सबको चिन्ता, पछतावा यह मौका हम कैसे गए चूक ।
मंत्री जी को जाना होगा, माँग करी सबने दो टूक ॥
प्रेम कहानी ने आखिर ले लिया प्रेमियों का बलिदान ।
दोनों ने अपने पद छोड़े, आग लगी हो ज्यों खलिहान ॥
यहाँ की बातें यहीं छोड़कर, मोदी के जानें हालात ।
सीना फूला जाय गर्व से, दुश्मन को क्या दी है मात ॥
मोदी वीर नाम है मेरा, सेकिण्डन में दिया पछाड़ ।
आशिर्वाद पवार देव का, सकै न दुश्मन कच्छु बिगाड़ ॥
होनी को मंजूर और था, ढीले पड़ गए देव पवार ।
मोदी वीर काँपते थर थर, खड़ी सामने दिखती हार ॥
चीयर लीडर, चौके-छक्के, कुछ भी अच्छा लगता नाय ।
पतली गली निकल भागूँगा, आईपीएल भाड़ में जाय ॥
ऐसे कैसे भाग सकोगे, हिसाब चुकता करते जाउ ।
अभी फ़ाइनल कहाँ हुआ है, देखें हू विल विन, एण्ड हाउ ?
शनिवार, अप्रैल 24, 2010
गबन की राशि लौटाने को कोषाध्यक्ष के नाम खुला पत्र
आदरणीय कोषाध्यक्ष जी !
आपकी तरक्की पर आपको बहुत-बहुत बधाई । यह अलग बात है कि यह बधाई मेरे हृदय की गहराई से नहीं निकल रही है । हृदय में तो प्रतिशोध की भावना ने उपनिवेश स्थापित कर लिया है । लेकिन फिर भी एक सभ्य नागरिक होने के नाते तरक्की पर बधाई दे रहा हूँ ।
इतिहास में धोखेबाजी के उदाहरणों की कोई कमी नहीं है । अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी की पीठ में तलवार भौंककर उसकी हत्या करवा दी थी और स्वयं सुल्तान बन बैठा था ।
आपने हालाँकि मेरी हत्या तो नहीं की है ( लेकिन इसके लिए भी आप धन्यवाद के पात्र नहीं हैं क्योंकि मेरी हत्या करवाने के बाद आपको भी भूखों मरना पड़ता ) लेकिन मुझे कमजोर अवश्य कर दिया है । आपने जब जितने संसाधनों की माँग की, मैंने उसकी पूर्ति करने में कोई कसर न उठा रखी थी । उचित अनुचित तरीकों से संसाधन जुटाकर आपको मुहैया कराए ताकि उनका समझदारी से सदुपयोग करके मेरी भलाई कर सकें । किन्तु आपने आवश्यकता से अधिक संसाधनों की माँग करके अतिरिक्त संसाधनों का निजी संग्रह कर लिया । और आज स्थित यह हो गई है कि आपका कद मेरे गर्व से फूले हुए सीने से अधिक हो गया है । मुझे न चाहते हुए भी आपको बधाई प्रेषित करनी पड़ रही है । मेरा विश्वास है कि आपको इतना तो मालुम ही होगा कि आपको अपना खर्चा लेने की छूट अवश्य है लेकिन संग्रह करने की आज्ञा नहीं है ।
मुझे आपको इस बात का धन्यवाद तो कहना ही होगा कि आपके कारण मुझे यह सबक मिला कि आँख मूँदकर भरोसा किसी घनिष्ट से घनिष्ट साथी पर भी नहीं करना चाहिये । मैं जानता हूँ कि भविष्य में भी आपके बिना मेरा और मेरे बिना आपका काम चलने वाला नहीं है । इसलिए मैं इस गबन के लिए आपके विरुद्ध कोई कड़ी कार्रवाई न कर पाऊँगा । तथापि गबन की गई राशि को वसूल किए बिना मुझे चैन न पड़ेगा । यह राशि आपके खर्च की राशि से धीरे-धीरे काट ली जाएगी । आगे से माँग और पूर्ति का लेखा-जोखा मैं स्वयं सँभालूँगा ।
मुझे ज्ञात हुआ है कि पिछले काफी समय से आपने शारीरिक श्रम करना बिल्कुल ही बन्द कर दिया है । अब आपको शारीरिक श्रम करना अनिवार्य होगा ताकि आपकी उपयोगिता अपने द्वारा लिए जा रहे खर्च से अधिक हो सके ।
अन्त में मैं इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि मेरा आपको भूखों मारने का कोई उद्देश्य नहीं है । आखिर आप मेरे पेट हो ।
आपकी तरक्की पर आपको बहुत-बहुत बधाई । यह अलग बात है कि यह बधाई मेरे हृदय की गहराई से नहीं निकल रही है । हृदय में तो प्रतिशोध की भावना ने उपनिवेश स्थापित कर लिया है । लेकिन फिर भी एक सभ्य नागरिक होने के नाते तरक्की पर बधाई दे रहा हूँ ।
इतिहास में धोखेबाजी के उदाहरणों की कोई कमी नहीं है । अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी की पीठ में तलवार भौंककर उसकी हत्या करवा दी थी और स्वयं सुल्तान बन बैठा था ।
आपने हालाँकि मेरी हत्या तो नहीं की है ( लेकिन इसके लिए भी आप धन्यवाद के पात्र नहीं हैं क्योंकि मेरी हत्या करवाने के बाद आपको भी भूखों मरना पड़ता ) लेकिन मुझे कमजोर अवश्य कर दिया है । आपने जब जितने संसाधनों की माँग की, मैंने उसकी पूर्ति करने में कोई कसर न उठा रखी थी । उचित अनुचित तरीकों से संसाधन जुटाकर आपको मुहैया कराए ताकि उनका समझदारी से सदुपयोग करके मेरी भलाई कर सकें । किन्तु आपने आवश्यकता से अधिक संसाधनों की माँग करके अतिरिक्त संसाधनों का निजी संग्रह कर लिया । और आज स्थित यह हो गई है कि आपका कद मेरे गर्व से फूले हुए सीने से अधिक हो गया है । मुझे न चाहते हुए भी आपको बधाई प्रेषित करनी पड़ रही है । मेरा विश्वास है कि आपको इतना तो मालुम ही होगा कि आपको अपना खर्चा लेने की छूट अवश्य है लेकिन संग्रह करने की आज्ञा नहीं है ।
मुझे आपको इस बात का धन्यवाद तो कहना ही होगा कि आपके कारण मुझे यह सबक मिला कि आँख मूँदकर भरोसा किसी घनिष्ट से घनिष्ट साथी पर भी नहीं करना चाहिये । मैं जानता हूँ कि भविष्य में भी आपके बिना मेरा और मेरे बिना आपका काम चलने वाला नहीं है । इसलिए मैं इस गबन के लिए आपके विरुद्ध कोई कड़ी कार्रवाई न कर पाऊँगा । तथापि गबन की गई राशि को वसूल किए बिना मुझे चैन न पड़ेगा । यह राशि आपके खर्च की राशि से धीरे-धीरे काट ली जाएगी । आगे से माँग और पूर्ति का लेखा-जोखा मैं स्वयं सँभालूँगा ।
मुझे ज्ञात हुआ है कि पिछले काफी समय से आपने शारीरिक श्रम करना बिल्कुल ही बन्द कर दिया है । अब आपको शारीरिक श्रम करना अनिवार्य होगा ताकि आपकी उपयोगिता अपने द्वारा लिए जा रहे खर्च से अधिक हो सके ।
अन्त में मैं इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि मेरा आपको भूखों मारने का कोई उद्देश्य नहीं है । आखिर आप मेरे पेट हो ।
गुरुवार, अप्रैल 22, 2010
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के
कितने आये, चले गए सब, हाथ झाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ ने दुनिया बुरी बताई, रोते रह गए ।
कुछ ईश्वर की रचना को, 'अतिसुन्दर' कह गए ॥
लेकिन कुछ ने देखा इसको, आँखें फाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ की शादी ना हो पायी, कुआँरे मर लिए ।
कुछ ने कीर्तिमान शादी के, नाम कर लिए ॥
किन्तु कुछ हुए सन्यासी, सब छोड़ छाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ घूमे जंगल-जंगल की, खाक छानते ।
कुछ सागर के तल में जाना, अच्छा मानते ॥
कुछ चढ़ते-चढ़ते पहुँचे, ऊपर पहाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
आती जाती रही यहाँ पर, फैशन नित नई ।
कुछ को भाया बुरका, कुछ को, जीन्स भा गई ॥
लेकिन कुछ ने जीवन काटा, तन उघाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ खेतों में अन्न उगाते थे, किसान थे ।
पाली कुछ ने तालाबों में, मछली शान से ॥
लेकिन कुछ बस रहे लगाते, बाग ताड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ उद्योगों के मालिक, पैसा अकूत था ।
घर में धन के ढेर किन्तु, बेटा कपूत था ॥
ढेर बचे दर्शन को अब, केवल कबाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
ऐसे भी साम्राज्य कि जिनमें, सूरज कभी न डूबा ।
कई मुल्क से मिलकर जिसका, बना एक ही सूबा ॥
रखा समय ने उनका भी, नक्शा बिगाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ सस्ते दामों में देश, बेचे जा रहे ।
कुछ सीमाओं पर दुश्मन की, गोली खा रहे ॥
कदम हटाए पीछे, दुश्मन को पछाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ बिल्ली की म्याऊँ सुनकर, बिल में घुस गए ।
कुछ खतरों से डरकर, चापलूस बन गए ॥
लेकिन कुछ ने हिला दिया, जंगल दहाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ ने तख्ता-पलट कर दिया, क्रांति हो गई ।
कुछ को 'मैं हूँ ईश्वर' ऐसी, भ्रान्ति हो गई ॥
कुछ सहमे से खड़े रहे, पीछे किवाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कितने आये, चले गए सब, हाथ झाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ ने दुनिया बुरी बताई, रोते रह गए ।
कुछ ईश्वर की रचना को, 'अतिसुन्दर' कह गए ॥
लेकिन कुछ ने देखा इसको, आँखें फाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ की शादी ना हो पायी, कुआँरे मर लिए ।
कुछ ने कीर्तिमान शादी के, नाम कर लिए ॥
किन्तु कुछ हुए सन्यासी, सब छोड़ छाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ घूमे जंगल-जंगल की, खाक छानते ।
कुछ सागर के तल में जाना, अच्छा मानते ॥
कुछ चढ़ते-चढ़ते पहुँचे, ऊपर पहाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
आती जाती रही यहाँ पर, फैशन नित नई ।
कुछ को भाया बुरका, कुछ को, जीन्स भा गई ॥
लेकिन कुछ ने जीवन काटा, तन उघाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ खेतों में अन्न उगाते थे, किसान थे ।
पाली कुछ ने तालाबों में, मछली शान से ॥
लेकिन कुछ बस रहे लगाते, बाग ताड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ उद्योगों के मालिक, पैसा अकूत था ।
घर में धन के ढेर किन्तु, बेटा कपूत था ॥
ढेर बचे दर्शन को अब, केवल कबाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
ऐसे भी साम्राज्य कि जिनमें, सूरज कभी न डूबा ।
कई मुल्क से मिलकर जिसका, बना एक ही सूबा ॥
रखा समय ने उनका भी, नक्शा बिगाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ सस्ते दामों में देश, बेचे जा रहे ।
कुछ सीमाओं पर दुश्मन की, गोली खा रहे ॥
कदम हटाए पीछे, दुश्मन को पछाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ बिल्ली की म्याऊँ सुनकर, बिल में घुस गए ।
कुछ खतरों से डरकर, चापलूस बन गए ॥
लेकिन कुछ ने हिला दिया, जंगल दहाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ ने तख्ता-पलट कर दिया, क्रांति हो गई ।
कुछ को 'मैं हूँ ईश्वर' ऐसी, भ्रान्ति हो गई ॥
कुछ सहमे से खड़े रहे, पीछे किवाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कितने आये, चले गए सब, हाथ झाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
बुधवार, अप्रैल 21, 2010
कब तक यह सिलसिला चलेगा
शाम ढले आ बैठा घर में,
अतिथि एक अनजाना ।
मुस्काया वह बता स्वयं को,
मेरा मित्र पुराना ॥
बोला, "यूँ क्यों घूर रहे हो,
क्या अब तक हो रूठे ?
बात-बात पर गाल फुलाते,
तुम हो बड़े अनूठे ॥
बड़े दिनों से चाह रहा था,
तुमसे मिलने आना ।
मौसम अब अनुकूल हो गया,
मैंने कल ही जाना ॥
हवा मार्ग से आया हूँ,
जैसे ही देखा मौका ।
लेकिन भाई मुझे देखकर,
तू ऐसे क्यों चौंका ?
पिछली बार गया था जल्दी,
थी मेरी मजबूरी ।
जाड़ा समयपूर्व आया था,
तन पर सिर्फ़ फतूरी ॥
तुमको तो मालुम होगा,
मैं जाड़े से डरता हूँ ।
मित्रों के घर टूर सिर्फ़,
गरमी में ही करता हूँ ॥
कला पारखी मुझको कोई,
नहीं मिला है ऐसा ।
कद्रदान यदि मिले किसी को,
मिले तुम्हारे जैसा ॥
मेरे करतब देख देख तुम,
ताली खूब बजाते ।
गरमी में पंखा झलकर,
मुझको ठंडक पहुंचाते ॥
सुन मेरा संगीत मधुर,
तुम ऐसे खो जाते हो ।
चाँटा मार गाल पर अपने
खुद ही, रो जाते हो ॥
मैंने नहीं अतिथि सत्कारी,
देखा कोई ऐसा ।
मेरे लिए हवन-पूजा में,
खर्च करे जो पैसा ॥
जला अगर बत्तियाँ,
धुआँ करने में तुम जुटते हो ।
मेरी साँसे महकाते हो,
यद्यपि खुद घुटते हो ॥
अब तुमसे क्या शरमाना,
जब खुला हुआ ही खत है ।
बुरा कहो या भला मित्र,
मुझको पीने की लत है ॥
शायद कुछ अटपटा लगे,
पर मेरी है अभिलाषा ।
रक्तदान कर शान्त करो,
तुम मेरी रक्त-पिपासा ॥
टूटे कितने नाते लेकिन,
यह मित्रता न तोड़ी ।
मच्छर और आदमी की,
यह कैसी सुन्दर जोड़ी !"
इतना कहकर झपट पड़ा,
मेरी गर्दन पर पीछे ।
जब तक मैं सँभलूँ, तब तक
वह उतर गया था नीचे ॥
मैंने खूब प्रयास किया,
मैं उसको मजा चखाऊँ ।
इसको समझौता कह लो,
क्यों अपनी हार बताऊँ ॥
युद्ध-विराम हो गया,
वह उड़कर जा बैठा ऊपर ।
ठगा हुआ सा उसे देखता,
बैठ गया मैं भू पर ॥
जब उसका मन हो, आकर
वह लहू चूस लेता है ।
लेकर वोट भाग जाता है,
जैसे वह नेता है ॥
कब तक यह सिलसिला चलेगा,
यही सोच रह जाते ।
उसे रोकने के साधन,
लगता है, रिश्वत खाते ॥
फिर लगता है, यही नियति है,
अपना खून चुसाओ ।
अपने ही गालों पर खुद ही,
चाँटे रोज लगाओ ॥
अतिथि एक अनजाना ।
मुस्काया वह बता स्वयं को,
मेरा मित्र पुराना ॥
बोला, "यूँ क्यों घूर रहे हो,
क्या अब तक हो रूठे ?
बात-बात पर गाल फुलाते,
तुम हो बड़े अनूठे ॥
बड़े दिनों से चाह रहा था,
तुमसे मिलने आना ।
मौसम अब अनुकूल हो गया,
मैंने कल ही जाना ॥
हवा मार्ग से आया हूँ,
जैसे ही देखा मौका ।
लेकिन भाई मुझे देखकर,
तू ऐसे क्यों चौंका ?
पिछली बार गया था जल्दी,
थी मेरी मजबूरी ।
जाड़ा समयपूर्व आया था,
तन पर सिर्फ़ फतूरी ॥
तुमको तो मालुम होगा,
मैं जाड़े से डरता हूँ ।
मित्रों के घर टूर सिर्फ़,
गरमी में ही करता हूँ ॥
कला पारखी मुझको कोई,
नहीं मिला है ऐसा ।
कद्रदान यदि मिले किसी को,
मिले तुम्हारे जैसा ॥
मेरे करतब देख देख तुम,
ताली खूब बजाते ।
गरमी में पंखा झलकर,
मुझको ठंडक पहुंचाते ॥
सुन मेरा संगीत मधुर,
तुम ऐसे खो जाते हो ।
चाँटा मार गाल पर अपने
खुद ही, रो जाते हो ॥
मैंने नहीं अतिथि सत्कारी,
देखा कोई ऐसा ।
मेरे लिए हवन-पूजा में,
खर्च करे जो पैसा ॥
जला अगर बत्तियाँ,
धुआँ करने में तुम जुटते हो ।
मेरी साँसे महकाते हो,
यद्यपि खुद घुटते हो ॥
अब तुमसे क्या शरमाना,
जब खुला हुआ ही खत है ।
बुरा कहो या भला मित्र,
मुझको पीने की लत है ॥
शायद कुछ अटपटा लगे,
पर मेरी है अभिलाषा ।
रक्तदान कर शान्त करो,
तुम मेरी रक्त-पिपासा ॥
टूटे कितने नाते लेकिन,
यह मित्रता न तोड़ी ।
मच्छर और आदमी की,
यह कैसी सुन्दर जोड़ी !"
इतना कहकर झपट पड़ा,
मेरी गर्दन पर पीछे ।
जब तक मैं सँभलूँ, तब तक
वह उतर गया था नीचे ॥
मैंने खूब प्रयास किया,
मैं उसको मजा चखाऊँ ।
इसको समझौता कह लो,
क्यों अपनी हार बताऊँ ॥
युद्ध-विराम हो गया,
वह उड़कर जा बैठा ऊपर ।
ठगा हुआ सा उसे देखता,
बैठ गया मैं भू पर ॥
जब उसका मन हो, आकर
वह लहू चूस लेता है ।
लेकर वोट भाग जाता है,
जैसे वह नेता है ॥
कब तक यह सिलसिला चलेगा,
यही सोच रह जाते ।
उसे रोकने के साधन,
लगता है, रिश्वत खाते ॥
फिर लगता है, यही नियति है,
अपना खून चुसाओ ।
अपने ही गालों पर खुद ही,
चाँटे रोज लगाओ ॥
मंगलवार, अप्रैल 20, 2010
मच्छी में काँटा
गरमी का मौसम है । पारा थर्मामीटर को फाड़कर निकल जाने की फ़िराक में है । डाक्टर लोगों का कहना है कि गरमी से बचकर रहें । कहीं ऐसा न हो कि बाद में दवा खानी पड़े या सुई लगवानी पड़े ।सुई चुभती है । सुई लगने का अपना अलग ही डर होता है । बच्चों को सबसे ज्यादा डर सुई से लगता है । अस्पताल का नाम सुनते ही वे कल्पना कर लेते हैं कि सुई लगाई जा रही है । रोने लगते हैं और ठीक होने का बहाना करते हैं । सुई का डर बड़ों को भी कम नहीं होता । कुछ लोग तो बुढ़ापे तक भी इस डर से नहीं उबर पाते । सुई छुआते ही बच्चों की भाँति बिलखने लगते हैं । जितना सुई लगने में नहीं तड़पेंगे उससे ज्यादा पहले ही कराह लेते हैं । जो आदमी भालों और तलवारों से नहीं डरता उसे सुई से डरते देखा गया है । शायद ऐसे लोगों के लिए ही रहीम जी ने लिखा होगा:
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवारि ॥
सुई को आदमी ने बनाया है तो भगवान ने काँटे को बनाया है । काँटा भी चुभता है । काँटों से तो श्री राम जी भी डरते थे । इसीलिए तो वनवास जाते समय सीता जी को काँटों से भयभीत करने का प्रयास किया । काटें के कारण ही खड़ाऊँ का आविष्कार हुआ होगा । कांटे से प्रेरणा लेकर ही तीर की खोज हुई होगी ।
वैसे तो आँख में कुछ भी चुभने पर काँटे के चुभने जैसा दर्द होता है पर असल में काँटा लगे तो तीव्र वेदना होती होगी । इसीलिए आँख का कांटा मुहावरा बना है । कहा जाता है कि काँटा और शत्रु रात को सोने से पहले अवश्य याद आते है और कष्ट पहुँचाते हैं । इसीलिए यथासंभव काँटा लगने पर उसे दिन में ही निकाल दिया जाता है । मछली में भी काँटा होता है । जहाँ हमें जानकारी है, काँटे वाली मछली को लोग कम पसंद करते हैं ।
बचपन में एक गाना गाते थे:
एक, दो, तीन
बुड्ढे की मशीन
बुड्ढा गया जेल
हम गए रेल
रेल करती छुक-छुक
हमने खाए बिस्कुट
बिस्कुट बड़े खराब
हमने पी शराब
शराब बड़ी अच्छी
हमने खायी मच्छी
मच्छी में काँटा
हमने मारा चाँटा
और पास में बैठे साथी को चाँटा मार देते थे ।
काँटे केवल अनुपयोगी ही नहीं हैं । काँटों का सदुपयोग भी किया जा सकता है और किया जाता है । काँटे का उपयोग छुरी के साथ खाना खाने के लिए भी किया जाता है । खाना खाते समय छुरी किस हाथ में पकड़नी है और काँटा किस हाथ में पकड़ना है इसका भी संविधान है । जिसे यह नहीं पता उसे सभ्य समाज में एकदम गँवार समझा जाता है । सच कहें तो हमें खुद नहीं पता यह छुरी काँटे का यह नियम ।
सीमा पर काँटेदार तार लगाकर आतंकवादियों की घुसपैठ को रोकने की कोशिश हमारी सरकार करती रही है । जब कुएं में बाल्टी गिर जाती है तो काँटे से ही उसे निकालने का प्रयास किया जाता है । अधिकतर मामलों में सफलता मिल ही जाती है ।
धर्मकाँटा भी बहुत उपयोगी साधन है । इसका उपयोग बड़े भारी वाहनों का वजन ज्ञात करने के लिए होता है।
यह कहावत तो सबने सुनी होगी कि काँटे से ही काँटा निकाला जाता है । काँटे को ही भगवान ने फूलों की रक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा है । जिस फूल की रक्षा काँटा नहीं करता उसे दुनिया वाले बड़ी आसानी ने मसल देते हैं । कुछ जीवों को भी भगवान ने अपनी सुरक्षा के लिए काँटा नामक हथियार प्रदान किया है । ततैया, मधुमक्खी और बिच्छू के डंक भी काँटे के ही रूप हैं ।
बॉलीवुड ने भी काँटे को खूब भुनाया है । 'फूल और काँटे' फिल्म बड़ी हिट हुई थी । राजेश खन्ना जी की फिल्म 'आपकी कसम' का गाना 'काँटा लागे न कंकर' तो सभी को याद हो होगा । इसके अलावा 'काँटा लगा.. बेरी के पीछे.' नामक गाना तो धमाल ही कर गया था ।
कुल मिलाकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि काँटे को उसका वह स्थान कभी समाज ने नहीं दिया जिसका वह वास्तव में हकदार है । उसे जब चाहा काम निकाल लिया । जब चाहा काँटा कहकर उपेक्षित कर दिया । सरकार से हमारी माँग है कि काँटे को उसका उचित स्थान मिलना ही चाहिये ।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवारि ॥
सुई को आदमी ने बनाया है तो भगवान ने काँटे को बनाया है । काँटा भी चुभता है । काँटों से तो श्री राम जी भी डरते थे । इसीलिए तो वनवास जाते समय सीता जी को काँटों से भयभीत करने का प्रयास किया । काटें के कारण ही खड़ाऊँ का आविष्कार हुआ होगा । कांटे से प्रेरणा लेकर ही तीर की खोज हुई होगी ।
वैसे तो आँख में कुछ भी चुभने पर काँटे के चुभने जैसा दर्द होता है पर असल में काँटा लगे तो तीव्र वेदना होती होगी । इसीलिए आँख का कांटा मुहावरा बना है । कहा जाता है कि काँटा और शत्रु रात को सोने से पहले अवश्य याद आते है और कष्ट पहुँचाते हैं । इसीलिए यथासंभव काँटा लगने पर उसे दिन में ही निकाल दिया जाता है । मछली में भी काँटा होता है । जहाँ हमें जानकारी है, काँटे वाली मछली को लोग कम पसंद करते हैं ।
बचपन में एक गाना गाते थे:
एक, दो, तीन
बुड्ढे की मशीन
बुड्ढा गया जेल
हम गए रेल
रेल करती छुक-छुक
हमने खाए बिस्कुट
बिस्कुट बड़े खराब
हमने पी शराब
शराब बड़ी अच्छी
हमने खायी मच्छी
मच्छी में काँटा
हमने मारा चाँटा
और पास में बैठे साथी को चाँटा मार देते थे ।
काँटे केवल अनुपयोगी ही नहीं हैं । काँटों का सदुपयोग भी किया जा सकता है और किया जाता है । काँटे का उपयोग छुरी के साथ खाना खाने के लिए भी किया जाता है । खाना खाते समय छुरी किस हाथ में पकड़नी है और काँटा किस हाथ में पकड़ना है इसका भी संविधान है । जिसे यह नहीं पता उसे सभ्य समाज में एकदम गँवार समझा जाता है । सच कहें तो हमें खुद नहीं पता यह छुरी काँटे का यह नियम ।
सीमा पर काँटेदार तार लगाकर आतंकवादियों की घुसपैठ को रोकने की कोशिश हमारी सरकार करती रही है । जब कुएं में बाल्टी गिर जाती है तो काँटे से ही उसे निकालने का प्रयास किया जाता है । अधिकतर मामलों में सफलता मिल ही जाती है ।
धर्मकाँटा भी बहुत उपयोगी साधन है । इसका उपयोग बड़े भारी वाहनों का वजन ज्ञात करने के लिए होता है।
यह कहावत तो सबने सुनी होगी कि काँटे से ही काँटा निकाला जाता है । काँटे को ही भगवान ने फूलों की रक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा है । जिस फूल की रक्षा काँटा नहीं करता उसे दुनिया वाले बड़ी आसानी ने मसल देते हैं । कुछ जीवों को भी भगवान ने अपनी सुरक्षा के लिए काँटा नामक हथियार प्रदान किया है । ततैया, मधुमक्खी और बिच्छू के डंक भी काँटे के ही रूप हैं ।
बॉलीवुड ने भी काँटे को खूब भुनाया है । 'फूल और काँटे' फिल्म बड़ी हिट हुई थी । राजेश खन्ना जी की फिल्म 'आपकी कसम' का गाना 'काँटा लागे न कंकर' तो सभी को याद हो होगा । इसके अलावा 'काँटा लगा.. बेरी के पीछे.' नामक गाना तो धमाल ही कर गया था ।
कुल मिलाकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि काँटे को उसका वह स्थान कभी समाज ने नहीं दिया जिसका वह वास्तव में हकदार है । उसे जब चाहा काम निकाल लिया । जब चाहा काँटा कहकर उपेक्षित कर दिया । सरकार से हमारी माँग है कि काँटे को उसका उचित स्थान मिलना ही चाहिये ।
रविवार, अप्रैल 18, 2010
कोंपल की करुण कहानी
शाखा में छिप सर्दी काटी,
लम्बा समय बिताया ।
कोंपल ने जब बाहर देखा,
उसका मन हरषाया ॥
जाड़ा मिला नदारद उसको,
बसन्त का मौसम था ।
दिन में कुछ गरमाया सा था,
रातों को कुछ नम था ॥
अवसर यह अनुकूल जान,
उसने बाहर आने का ।
किया पैक सामान सभी,
इस दुनिया में लाने का ॥
परमीशन पेढ़ से माँगकर,
कोंपल बाहर आयी ।
आसपास की शाखाओं ने,
भेजी उसे बधाई ॥
उसका सपना था, बढ़कर वह,
डाली एक बनेगी ।
किसी धूप से त्रस्त पथिक के,
ऊपर कभी तनेगी ॥
करके पर-उपकार, लक्ष्य
जीवन का मिल जाएगा ।
होगा जीना व्यर्थ, किसी के
काम न यदि आयेगा ॥
किन्तु हाय वह क्या जाने,
उसका जीवन अब कम था ।
समझा जिसे बसन्त, असल में
गरमी का मौसम था ।
अत्याचारी लू ने,
बेचारी को आ धमकाया ।
प्राण पखेरू उड़े, रह गयी,
केवल नश्वर काया ॥
देख देखकर मृत शरीर,
कोंपल का सूखा-सूखा ।
आज रो दिया कौआ भी,
जो था कुछ रूखा-रूखा ॥
हमने अपनी आँखों से,
देखी यह करुण कहानी ।
अपनी भी आँखों में आया
मामूली सा पानी ॥
किसी धूप से त्रस्त पथिक के,
ऊपर कभी तनेगी ॥
करके पर-उपकार, लक्ष्य
जीवन का मिल जाएगा ।
होगा जीना व्यर्थ, किसी के
काम न यदि आयेगा ॥
किन्तु हाय वह क्या जाने,
उसका जीवन अब कम था ।
समझा जिसे बसन्त, असल में
गरमी का मौसम था ।
अत्याचारी लू ने,
बेचारी को आ धमकाया ।
प्राण पखेरू उड़े, रह गयी,
केवल नश्वर काया ॥
देख देखकर मृत शरीर,
कोंपल का सूखा-सूखा ।
आज रो दिया कौआ भी,
जो था कुछ रूखा-रूखा ॥
हमने अपनी आँखों से,
देखी यह करुण कहानी ।
अपनी भी आँखों में आया
मामूली सा पानी ॥
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