बचपन करे कठिन मजदूरी
हमने करी तरक्की काफी
लेकिन अभी अधूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
नंगे पैर घूमता दिनभर
पालीथिन भी उठा उठाकर
हों न जरूरत पूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
रातों में देर तक जागता
प्लेटफार्म पर बोल भागता
"लो पेठा अंगूरी"
बचपन करे कठिन मजदूरी
रोज चाय के गिलास धोता
पिटने पर भी कभी न रोता
पिटाई लगने लगी जरूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
पीने में बस पानी पीता
रूखी-सूखी खाकर जीता
रोटियां भी न मिलें तंदूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
चाचा नेहरू ? नहीं जानता
बाल-दिवस को नहीं मानता
न जाने शिमला, मंसूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
पता नहीं कब बडा हो गया
मिला न उसको कभी कुछ नया
कुछ न कुछ सदा रही मजबूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
हमने करी तरक्की काफी
लेकिन अभी अधूरी
बचपन करे कठिन मजदूरी
संभव है कि इस ब्लॉग पर लिखी बातें मेरी विचारधारा का प्रतिनिधित्व न करती हों । यहाँ लिखी बातें विभिन्न दृष्टिकोणों से सोचने का परिणाम हैं । कृपया किसी प्रकार का पूर्वाग्रह न रखें ।
शनिवार, मई 15, 2010
रविवार, अप्रैल 25, 2010
आल्हा ए आईपीएल
आई पी एल तीसरी पारी धूमधाम से हुइ आगाज़ ।
आकर्षण कुछ कहा न जाए, मंत्री चले छोड़कर राज ॥
खिलाड़ियों की पैंठ लगाकर मोलभाव की हुई शुरुआत ।
जिस कम्पनी पै जैसा पैसा लिए खिलाड़ी वैसे साथ ॥
पाकिस्तानी नहीं बिक सके पूरा हुआ पैंठ व्यापार ।
अफ़रीदी यह पचा न पावै खूब मचाई चीख पुकार ॥
उदघाटन हो गया अन्त में इसका जोश कहा ना जाय ।
जिनके पास न अपना टीवी उनसा कोई अभागा नाय ॥
हल्ला हो गया बड़े टिकिट का हुई इनामों की बौछार ।
नेता भागे इसके पीछे छोड़ चुनावी टिकिट पिछार ॥
चीयर लीडर लगीं नाचने होने लगे मैच पर मैच ।
बड़े खिलाड़ी छक्का मारें छोटे छोड़ रहे थे कैच ॥
आतंकी भी भरे जोश में फोड़ दिये बम भी दो चार ।
फिर भी मैच न रुका देखकर भाग गए सब हिम्मत हार ॥
आईपीएल की बातें हों और मोदी का ले नाम न कोय ।
अब तक एसा कभी न देखा, ना भविष्य में शायद होय ॥
फ्रेंचाइजियों की बल्ले बल्ले मिला लक्ष्मी का वरदान ।
नहीं टैक्स का कोई चक्कर करते खूब पुण्य अरु दान ॥
जनता पैसा लुटा रही थी लूटो जितना लूटा जाय ।
बँटवारे में चूक हो गई, बनी बात अब बिगड़ी हाय ॥
सत्यानाश ट्विटर का जिसने, किंचित राज दिए खुलवाय ।
कान खड़े नेतन के हुइ गए, नथुने खूब रहे फड़काय ॥
बात निकलकर संसद पहुँची, नेता खूब ले रहे मौज़ ।
धक्का मुक्की मारपीट ना, ना गाली ना कोई गलौज़ ॥
सबको चिन्ता, पछतावा यह मौका हम कैसे गए चूक ।
मंत्री जी को जाना होगा, माँग करी सबने दो टूक ॥
प्रेम कहानी ने आखिर ले लिया प्रेमियों का बलिदान ।
दोनों ने अपने पद छोड़े, आग लगी हो ज्यों खलिहान ॥
यहाँ की बातें यहीं छोड़कर, मोदी के जानें हालात ।
सीना फूला जाय गर्व से, दुश्मन को क्या दी है मात ॥
मोदी वीर नाम है मेरा, सेकिण्डन में दिया पछाड़ ।
आशिर्वाद पवार देव का, सकै न दुश्मन कच्छु बिगाड़ ॥
होनी को मंजूर और था, ढीले पड़ गए देव पवार ।
मोदी वीर काँपते थर थर, खड़ी सामने दिखती हार ॥
चीयर लीडर, चौके-छक्के, कुछ भी अच्छा लगता नाय ।
पतली गली निकल भागूँगा, आईपीएल भाड़ में जाय ॥
ऐसे कैसे भाग सकोगे, हिसाब चुकता करते जाउ ।
अभी फ़ाइनल कहाँ हुआ है, देखें हू विल विन, एण्ड हाउ ?
आकर्षण कुछ कहा न जाए, मंत्री चले छोड़कर राज ॥
खिलाड़ियों की पैंठ लगाकर मोलभाव की हुई शुरुआत ।
जिस कम्पनी पै जैसा पैसा लिए खिलाड़ी वैसे साथ ॥
पाकिस्तानी नहीं बिक सके पूरा हुआ पैंठ व्यापार ।
अफ़रीदी यह पचा न पावै खूब मचाई चीख पुकार ॥
उदघाटन हो गया अन्त में इसका जोश कहा ना जाय ।
जिनके पास न अपना टीवी उनसा कोई अभागा नाय ॥
हल्ला हो गया बड़े टिकिट का हुई इनामों की बौछार ।
नेता भागे इसके पीछे छोड़ चुनावी टिकिट पिछार ॥
चीयर लीडर लगीं नाचने होने लगे मैच पर मैच ।
बड़े खिलाड़ी छक्का मारें छोटे छोड़ रहे थे कैच ॥
आतंकी भी भरे जोश में फोड़ दिये बम भी दो चार ।
फिर भी मैच न रुका देखकर भाग गए सब हिम्मत हार ॥
आईपीएल की बातें हों और मोदी का ले नाम न कोय ।
अब तक एसा कभी न देखा, ना भविष्य में शायद होय ॥
फ्रेंचाइजियों की बल्ले बल्ले मिला लक्ष्मी का वरदान ।
नहीं टैक्स का कोई चक्कर करते खूब पुण्य अरु दान ॥
जनता पैसा लुटा रही थी लूटो जितना लूटा जाय ।
बँटवारे में चूक हो गई, बनी बात अब बिगड़ी हाय ॥
सत्यानाश ट्विटर का जिसने, किंचित राज दिए खुलवाय ।
कान खड़े नेतन के हुइ गए, नथुने खूब रहे फड़काय ॥
बात निकलकर संसद पहुँची, नेता खूब ले रहे मौज़ ।
धक्का मुक्की मारपीट ना, ना गाली ना कोई गलौज़ ॥
सबको चिन्ता, पछतावा यह मौका हम कैसे गए चूक ।
मंत्री जी को जाना होगा, माँग करी सबने दो टूक ॥
प्रेम कहानी ने आखिर ले लिया प्रेमियों का बलिदान ।
दोनों ने अपने पद छोड़े, आग लगी हो ज्यों खलिहान ॥
यहाँ की बातें यहीं छोड़कर, मोदी के जानें हालात ।
सीना फूला जाय गर्व से, दुश्मन को क्या दी है मात ॥
मोदी वीर नाम है मेरा, सेकिण्डन में दिया पछाड़ ।
आशिर्वाद पवार देव का, सकै न दुश्मन कच्छु बिगाड़ ॥
होनी को मंजूर और था, ढीले पड़ गए देव पवार ।
मोदी वीर काँपते थर थर, खड़ी सामने दिखती हार ॥
चीयर लीडर, चौके-छक्के, कुछ भी अच्छा लगता नाय ।
पतली गली निकल भागूँगा, आईपीएल भाड़ में जाय ॥
ऐसे कैसे भाग सकोगे, हिसाब चुकता करते जाउ ।
अभी फ़ाइनल कहाँ हुआ है, देखें हू विल विन, एण्ड हाउ ?
शनिवार, अप्रैल 24, 2010
गबन की राशि लौटाने को कोषाध्यक्ष के नाम खुला पत्र
आदरणीय कोषाध्यक्ष जी !
आपकी तरक्की पर आपको बहुत-बहुत बधाई । यह अलग बात है कि यह बधाई मेरे हृदय की गहराई से नहीं निकल रही है । हृदय में तो प्रतिशोध की भावना ने उपनिवेश स्थापित कर लिया है । लेकिन फिर भी एक सभ्य नागरिक होने के नाते तरक्की पर बधाई दे रहा हूँ ।
इतिहास में धोखेबाजी के उदाहरणों की कोई कमी नहीं है । अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी की पीठ में तलवार भौंककर उसकी हत्या करवा दी थी और स्वयं सुल्तान बन बैठा था ।
आपने हालाँकि मेरी हत्या तो नहीं की है ( लेकिन इसके लिए भी आप धन्यवाद के पात्र नहीं हैं क्योंकि मेरी हत्या करवाने के बाद आपको भी भूखों मरना पड़ता ) लेकिन मुझे कमजोर अवश्य कर दिया है । आपने जब जितने संसाधनों की माँग की, मैंने उसकी पूर्ति करने में कोई कसर न उठा रखी थी । उचित अनुचित तरीकों से संसाधन जुटाकर आपको मुहैया कराए ताकि उनका समझदारी से सदुपयोग करके मेरी भलाई कर सकें । किन्तु आपने आवश्यकता से अधिक संसाधनों की माँग करके अतिरिक्त संसाधनों का निजी संग्रह कर लिया । और आज स्थित यह हो गई है कि आपका कद मेरे गर्व से फूले हुए सीने से अधिक हो गया है । मुझे न चाहते हुए भी आपको बधाई प्रेषित करनी पड़ रही है । मेरा विश्वास है कि आपको इतना तो मालुम ही होगा कि आपको अपना खर्चा लेने की छूट अवश्य है लेकिन संग्रह करने की आज्ञा नहीं है ।
मुझे आपको इस बात का धन्यवाद तो कहना ही होगा कि आपके कारण मुझे यह सबक मिला कि आँख मूँदकर भरोसा किसी घनिष्ट से घनिष्ट साथी पर भी नहीं करना चाहिये । मैं जानता हूँ कि भविष्य में भी आपके बिना मेरा और मेरे बिना आपका काम चलने वाला नहीं है । इसलिए मैं इस गबन के लिए आपके विरुद्ध कोई कड़ी कार्रवाई न कर पाऊँगा । तथापि गबन की गई राशि को वसूल किए बिना मुझे चैन न पड़ेगा । यह राशि आपके खर्च की राशि से धीरे-धीरे काट ली जाएगी । आगे से माँग और पूर्ति का लेखा-जोखा मैं स्वयं सँभालूँगा ।
मुझे ज्ञात हुआ है कि पिछले काफी समय से आपने शारीरिक श्रम करना बिल्कुल ही बन्द कर दिया है । अब आपको शारीरिक श्रम करना अनिवार्य होगा ताकि आपकी उपयोगिता अपने द्वारा लिए जा रहे खर्च से अधिक हो सके ।
अन्त में मैं इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि मेरा आपको भूखों मारने का कोई उद्देश्य नहीं है । आखिर आप मेरे पेट हो ।
आपकी तरक्की पर आपको बहुत-बहुत बधाई । यह अलग बात है कि यह बधाई मेरे हृदय की गहराई से नहीं निकल रही है । हृदय में तो प्रतिशोध की भावना ने उपनिवेश स्थापित कर लिया है । लेकिन फिर भी एक सभ्य नागरिक होने के नाते तरक्की पर बधाई दे रहा हूँ ।
इतिहास में धोखेबाजी के उदाहरणों की कोई कमी नहीं है । अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी की पीठ में तलवार भौंककर उसकी हत्या करवा दी थी और स्वयं सुल्तान बन बैठा था ।
आपने हालाँकि मेरी हत्या तो नहीं की है ( लेकिन इसके लिए भी आप धन्यवाद के पात्र नहीं हैं क्योंकि मेरी हत्या करवाने के बाद आपको भी भूखों मरना पड़ता ) लेकिन मुझे कमजोर अवश्य कर दिया है । आपने जब जितने संसाधनों की माँग की, मैंने उसकी पूर्ति करने में कोई कसर न उठा रखी थी । उचित अनुचित तरीकों से संसाधन जुटाकर आपको मुहैया कराए ताकि उनका समझदारी से सदुपयोग करके मेरी भलाई कर सकें । किन्तु आपने आवश्यकता से अधिक संसाधनों की माँग करके अतिरिक्त संसाधनों का निजी संग्रह कर लिया । और आज स्थित यह हो गई है कि आपका कद मेरे गर्व से फूले हुए सीने से अधिक हो गया है । मुझे न चाहते हुए भी आपको बधाई प्रेषित करनी पड़ रही है । मेरा विश्वास है कि आपको इतना तो मालुम ही होगा कि आपको अपना खर्चा लेने की छूट अवश्य है लेकिन संग्रह करने की आज्ञा नहीं है ।
मुझे आपको इस बात का धन्यवाद तो कहना ही होगा कि आपके कारण मुझे यह सबक मिला कि आँख मूँदकर भरोसा किसी घनिष्ट से घनिष्ट साथी पर भी नहीं करना चाहिये । मैं जानता हूँ कि भविष्य में भी आपके बिना मेरा और मेरे बिना आपका काम चलने वाला नहीं है । इसलिए मैं इस गबन के लिए आपके विरुद्ध कोई कड़ी कार्रवाई न कर पाऊँगा । तथापि गबन की गई राशि को वसूल किए बिना मुझे चैन न पड़ेगा । यह राशि आपके खर्च की राशि से धीरे-धीरे काट ली जाएगी । आगे से माँग और पूर्ति का लेखा-जोखा मैं स्वयं सँभालूँगा ।
मुझे ज्ञात हुआ है कि पिछले काफी समय से आपने शारीरिक श्रम करना बिल्कुल ही बन्द कर दिया है । अब आपको शारीरिक श्रम करना अनिवार्य होगा ताकि आपकी उपयोगिता अपने द्वारा लिए जा रहे खर्च से अधिक हो सके ।
अन्त में मैं इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि मेरा आपको भूखों मारने का कोई उद्देश्य नहीं है । आखिर आप मेरे पेट हो ।
गुरुवार, अप्रैल 22, 2010
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के
कितने आये, चले गए सब, हाथ झाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ ने दुनिया बुरी बताई, रोते रह गए ।
कुछ ईश्वर की रचना को, 'अतिसुन्दर' कह गए ॥
लेकिन कुछ ने देखा इसको, आँखें फाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ की शादी ना हो पायी, कुआँरे मर लिए ।
कुछ ने कीर्तिमान शादी के, नाम कर लिए ॥
किन्तु कुछ हुए सन्यासी, सब छोड़ छाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ घूमे जंगल-जंगल की, खाक छानते ।
कुछ सागर के तल में जाना, अच्छा मानते ॥
कुछ चढ़ते-चढ़ते पहुँचे, ऊपर पहाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
आती जाती रही यहाँ पर, फैशन नित नई ।
कुछ को भाया बुरका, कुछ को, जीन्स भा गई ॥
लेकिन कुछ ने जीवन काटा, तन उघाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ खेतों में अन्न उगाते थे, किसान थे ।
पाली कुछ ने तालाबों में, मछली शान से ॥
लेकिन कुछ बस रहे लगाते, बाग ताड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ उद्योगों के मालिक, पैसा अकूत था ।
घर में धन के ढेर किन्तु, बेटा कपूत था ॥
ढेर बचे दर्शन को अब, केवल कबाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
ऐसे भी साम्राज्य कि जिनमें, सूरज कभी न डूबा ।
कई मुल्क से मिलकर जिसका, बना एक ही सूबा ॥
रखा समय ने उनका भी, नक्शा बिगाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ सस्ते दामों में देश, बेचे जा रहे ।
कुछ सीमाओं पर दुश्मन की, गोली खा रहे ॥
कदम हटाए पीछे, दुश्मन को पछाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ बिल्ली की म्याऊँ सुनकर, बिल में घुस गए ।
कुछ खतरों से डरकर, चापलूस बन गए ॥
लेकिन कुछ ने हिला दिया, जंगल दहाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ ने तख्ता-पलट कर दिया, क्रांति हो गई ।
कुछ को 'मैं हूँ ईश्वर' ऐसी, भ्रान्ति हो गई ॥
कुछ सहमे से खड़े रहे, पीछे किवाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कितने आये, चले गए सब, हाथ झाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ ने दुनिया बुरी बताई, रोते रह गए ।
कुछ ईश्वर की रचना को, 'अतिसुन्दर' कह गए ॥
लेकिन कुछ ने देखा इसको, आँखें फाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ की शादी ना हो पायी, कुआँरे मर लिए ।
कुछ ने कीर्तिमान शादी के, नाम कर लिए ॥
किन्तु कुछ हुए सन्यासी, सब छोड़ छाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ घूमे जंगल-जंगल की, खाक छानते ।
कुछ सागर के तल में जाना, अच्छा मानते ॥
कुछ चढ़ते-चढ़ते पहुँचे, ऊपर पहाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
आती जाती रही यहाँ पर, फैशन नित नई ।
कुछ को भाया बुरका, कुछ को, जीन्स भा गई ॥
लेकिन कुछ ने जीवन काटा, तन उघाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ खेतों में अन्न उगाते थे, किसान थे ।
पाली कुछ ने तालाबों में, मछली शान से ॥
लेकिन कुछ बस रहे लगाते, बाग ताड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ उद्योगों के मालिक, पैसा अकूत था ।
घर में धन के ढेर किन्तु, बेटा कपूत था ॥
ढेर बचे दर्शन को अब, केवल कबाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
ऐसे भी साम्राज्य कि जिनमें, सूरज कभी न डूबा ।
कई मुल्क से मिलकर जिसका, बना एक ही सूबा ॥
रखा समय ने उनका भी, नक्शा बिगाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ सस्ते दामों में देश, बेचे जा रहे ।
कुछ सीमाओं पर दुश्मन की, गोली खा रहे ॥
कदम हटाए पीछे, दुश्मन को पछाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ बिल्ली की म्याऊँ सुनकर, बिल में घुस गए ।
कुछ खतरों से डरकर, चापलूस बन गए ॥
लेकिन कुछ ने हिला दिया, जंगल दहाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कुछ ने तख्ता-पलट कर दिया, क्रांति हो गई ।
कुछ को 'मैं हूँ ईश्वर' ऐसी, भ्रान्ति हो गई ॥
कुछ सहमे से खड़े रहे, पीछे किवाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
कितने आये, चले गए सब, हाथ झाड़ के ।
ले ना जा पाए दुनिया से, कुछ उखाड़ के ॥
बुधवार, अप्रैल 21, 2010
कब तक यह सिलसिला चलेगा
शाम ढले आ बैठा घर में,
अतिथि एक अनजाना ।
मुस्काया वह बता स्वयं को,
मेरा मित्र पुराना ॥
बोला, "यूँ क्यों घूर रहे हो,
क्या अब तक हो रूठे ?
बात-बात पर गाल फुलाते,
तुम हो बड़े अनूठे ॥
बड़े दिनों से चाह रहा था,
तुमसे मिलने आना ।
मौसम अब अनुकूल हो गया,
मैंने कल ही जाना ॥
हवा मार्ग से आया हूँ,
जैसे ही देखा मौका ।
लेकिन भाई मुझे देखकर,
तू ऐसे क्यों चौंका ?
पिछली बार गया था जल्दी,
थी मेरी मजबूरी ।
जाड़ा समयपूर्व आया था,
तन पर सिर्फ़ फतूरी ॥
तुमको तो मालुम होगा,
मैं जाड़े से डरता हूँ ।
मित्रों के घर टूर सिर्फ़,
गरमी में ही करता हूँ ॥
कला पारखी मुझको कोई,
नहीं मिला है ऐसा ।
कद्रदान यदि मिले किसी को,
मिले तुम्हारे जैसा ॥
मेरे करतब देख देख तुम,
ताली खूब बजाते ।
गरमी में पंखा झलकर,
मुझको ठंडक पहुंचाते ॥
सुन मेरा संगीत मधुर,
तुम ऐसे खो जाते हो ।
चाँटा मार गाल पर अपने
खुद ही, रो जाते हो ॥
मैंने नहीं अतिथि सत्कारी,
देखा कोई ऐसा ।
मेरे लिए हवन-पूजा में,
खर्च करे जो पैसा ॥
जला अगर बत्तियाँ,
धुआँ करने में तुम जुटते हो ।
मेरी साँसे महकाते हो,
यद्यपि खुद घुटते हो ॥
अब तुमसे क्या शरमाना,
जब खुला हुआ ही खत है ।
बुरा कहो या भला मित्र,
मुझको पीने की लत है ॥
शायद कुछ अटपटा लगे,
पर मेरी है अभिलाषा ।
रक्तदान कर शान्त करो,
तुम मेरी रक्त-पिपासा ॥
टूटे कितने नाते लेकिन,
यह मित्रता न तोड़ी ।
मच्छर और आदमी की,
यह कैसी सुन्दर जोड़ी !"
इतना कहकर झपट पड़ा,
मेरी गर्दन पर पीछे ।
जब तक मैं सँभलूँ, तब तक
वह उतर गया था नीचे ॥
मैंने खूब प्रयास किया,
मैं उसको मजा चखाऊँ ।
इसको समझौता कह लो,
क्यों अपनी हार बताऊँ ॥
युद्ध-विराम हो गया,
वह उड़कर जा बैठा ऊपर ।
ठगा हुआ सा उसे देखता,
बैठ गया मैं भू पर ॥
जब उसका मन हो, आकर
वह लहू चूस लेता है ।
लेकर वोट भाग जाता है,
जैसे वह नेता है ॥
कब तक यह सिलसिला चलेगा,
यही सोच रह जाते ।
उसे रोकने के साधन,
लगता है, रिश्वत खाते ॥
फिर लगता है, यही नियति है,
अपना खून चुसाओ ।
अपने ही गालों पर खुद ही,
चाँटे रोज लगाओ ॥
अतिथि एक अनजाना ।
मुस्काया वह बता स्वयं को,
मेरा मित्र पुराना ॥
बोला, "यूँ क्यों घूर रहे हो,
क्या अब तक हो रूठे ?
बात-बात पर गाल फुलाते,
तुम हो बड़े अनूठे ॥
बड़े दिनों से चाह रहा था,
तुमसे मिलने आना ।
मौसम अब अनुकूल हो गया,
मैंने कल ही जाना ॥
हवा मार्ग से आया हूँ,
जैसे ही देखा मौका ।
लेकिन भाई मुझे देखकर,
तू ऐसे क्यों चौंका ?
पिछली बार गया था जल्दी,
थी मेरी मजबूरी ।
जाड़ा समयपूर्व आया था,
तन पर सिर्फ़ फतूरी ॥
तुमको तो मालुम होगा,
मैं जाड़े से डरता हूँ ।
मित्रों के घर टूर सिर्फ़,
गरमी में ही करता हूँ ॥
कला पारखी मुझको कोई,
नहीं मिला है ऐसा ।
कद्रदान यदि मिले किसी को,
मिले तुम्हारे जैसा ॥
मेरे करतब देख देख तुम,
ताली खूब बजाते ।
गरमी में पंखा झलकर,
मुझको ठंडक पहुंचाते ॥
सुन मेरा संगीत मधुर,
तुम ऐसे खो जाते हो ।
चाँटा मार गाल पर अपने
खुद ही, रो जाते हो ॥
मैंने नहीं अतिथि सत्कारी,
देखा कोई ऐसा ।
मेरे लिए हवन-पूजा में,
खर्च करे जो पैसा ॥
जला अगर बत्तियाँ,
धुआँ करने में तुम जुटते हो ।
मेरी साँसे महकाते हो,
यद्यपि खुद घुटते हो ॥
अब तुमसे क्या शरमाना,
जब खुला हुआ ही खत है ।
बुरा कहो या भला मित्र,
मुझको पीने की लत है ॥
शायद कुछ अटपटा लगे,
पर मेरी है अभिलाषा ।
रक्तदान कर शान्त करो,
तुम मेरी रक्त-पिपासा ॥
टूटे कितने नाते लेकिन,
यह मित्रता न तोड़ी ।
मच्छर और आदमी की,
यह कैसी सुन्दर जोड़ी !"
इतना कहकर झपट पड़ा,
मेरी गर्दन पर पीछे ।
जब तक मैं सँभलूँ, तब तक
वह उतर गया था नीचे ॥
मैंने खूब प्रयास किया,
मैं उसको मजा चखाऊँ ।
इसको समझौता कह लो,
क्यों अपनी हार बताऊँ ॥
युद्ध-विराम हो गया,
वह उड़कर जा बैठा ऊपर ।
ठगा हुआ सा उसे देखता,
बैठ गया मैं भू पर ॥
जब उसका मन हो, आकर
वह लहू चूस लेता है ।
लेकर वोट भाग जाता है,
जैसे वह नेता है ॥
कब तक यह सिलसिला चलेगा,
यही सोच रह जाते ।
उसे रोकने के साधन,
लगता है, रिश्वत खाते ॥
फिर लगता है, यही नियति है,
अपना खून चुसाओ ।
अपने ही गालों पर खुद ही,
चाँटे रोज लगाओ ॥
मंगलवार, अप्रैल 20, 2010
मच्छी में काँटा
गरमी का मौसम है । पारा थर्मामीटर को फाड़कर निकल जाने की फ़िराक में है । डाक्टर लोगों का कहना है कि गरमी से बचकर रहें । कहीं ऐसा न हो कि बाद में दवा खानी पड़े या सुई लगवानी पड़े ।सुई चुभती है । सुई लगने का अपना अलग ही डर होता है । बच्चों को सबसे ज्यादा डर सुई से लगता है । अस्पताल का नाम सुनते ही वे कल्पना कर लेते हैं कि सुई लगाई जा रही है । रोने लगते हैं और ठीक होने का बहाना करते हैं । सुई का डर बड़ों को भी कम नहीं होता । कुछ लोग तो बुढ़ापे तक भी इस डर से नहीं उबर पाते । सुई छुआते ही बच्चों की भाँति बिलखने लगते हैं । जितना सुई लगने में नहीं तड़पेंगे उससे ज्यादा पहले ही कराह लेते हैं । जो आदमी भालों और तलवारों से नहीं डरता उसे सुई से डरते देखा गया है । शायद ऐसे लोगों के लिए ही रहीम जी ने लिखा होगा:
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवारि ॥
सुई को आदमी ने बनाया है तो भगवान ने काँटे को बनाया है । काँटा भी चुभता है । काँटों से तो श्री राम जी भी डरते थे । इसीलिए तो वनवास जाते समय सीता जी को काँटों से भयभीत करने का प्रयास किया । काटें के कारण ही खड़ाऊँ का आविष्कार हुआ होगा । कांटे से प्रेरणा लेकर ही तीर की खोज हुई होगी ।
वैसे तो आँख में कुछ भी चुभने पर काँटे के चुभने जैसा दर्द होता है पर असल में काँटा लगे तो तीव्र वेदना होती होगी । इसीलिए आँख का कांटा मुहावरा बना है । कहा जाता है कि काँटा और शत्रु रात को सोने से पहले अवश्य याद आते है और कष्ट पहुँचाते हैं । इसीलिए यथासंभव काँटा लगने पर उसे दिन में ही निकाल दिया जाता है । मछली में भी काँटा होता है । जहाँ हमें जानकारी है, काँटे वाली मछली को लोग कम पसंद करते हैं ।
बचपन में एक गाना गाते थे:
एक, दो, तीन
बुड्ढे की मशीन
बुड्ढा गया जेल
हम गए रेल
रेल करती छुक-छुक
हमने खाए बिस्कुट
बिस्कुट बड़े खराब
हमने पी शराब
शराब बड़ी अच्छी
हमने खायी मच्छी
मच्छी में काँटा
हमने मारा चाँटा
और पास में बैठे साथी को चाँटा मार देते थे ।
काँटे केवल अनुपयोगी ही नहीं हैं । काँटों का सदुपयोग भी किया जा सकता है और किया जाता है । काँटे का उपयोग छुरी के साथ खाना खाने के लिए भी किया जाता है । खाना खाते समय छुरी किस हाथ में पकड़नी है और काँटा किस हाथ में पकड़ना है इसका भी संविधान है । जिसे यह नहीं पता उसे सभ्य समाज में एकदम गँवार समझा जाता है । सच कहें तो हमें खुद नहीं पता यह छुरी काँटे का यह नियम ।
सीमा पर काँटेदार तार लगाकर आतंकवादियों की घुसपैठ को रोकने की कोशिश हमारी सरकार करती रही है । जब कुएं में बाल्टी गिर जाती है तो काँटे से ही उसे निकालने का प्रयास किया जाता है । अधिकतर मामलों में सफलता मिल ही जाती है ।
धर्मकाँटा भी बहुत उपयोगी साधन है । इसका उपयोग बड़े भारी वाहनों का वजन ज्ञात करने के लिए होता है।
यह कहावत तो सबने सुनी होगी कि काँटे से ही काँटा निकाला जाता है । काँटे को ही भगवान ने फूलों की रक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा है । जिस फूल की रक्षा काँटा नहीं करता उसे दुनिया वाले बड़ी आसानी ने मसल देते हैं । कुछ जीवों को भी भगवान ने अपनी सुरक्षा के लिए काँटा नामक हथियार प्रदान किया है । ततैया, मधुमक्खी और बिच्छू के डंक भी काँटे के ही रूप हैं ।
बॉलीवुड ने भी काँटे को खूब भुनाया है । 'फूल और काँटे' फिल्म बड़ी हिट हुई थी । राजेश खन्ना जी की फिल्म 'आपकी कसम' का गाना 'काँटा लागे न कंकर' तो सभी को याद हो होगा । इसके अलावा 'काँटा लगा.. बेरी के पीछे.' नामक गाना तो धमाल ही कर गया था ।
कुल मिलाकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि काँटे को उसका वह स्थान कभी समाज ने नहीं दिया जिसका वह वास्तव में हकदार है । उसे जब चाहा काम निकाल लिया । जब चाहा काँटा कहकर उपेक्षित कर दिया । सरकार से हमारी माँग है कि काँटे को उसका उचित स्थान मिलना ही चाहिये ।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवारि ॥
सुई को आदमी ने बनाया है तो भगवान ने काँटे को बनाया है । काँटा भी चुभता है । काँटों से तो श्री राम जी भी डरते थे । इसीलिए तो वनवास जाते समय सीता जी को काँटों से भयभीत करने का प्रयास किया । काटें के कारण ही खड़ाऊँ का आविष्कार हुआ होगा । कांटे से प्रेरणा लेकर ही तीर की खोज हुई होगी ।
वैसे तो आँख में कुछ भी चुभने पर काँटे के चुभने जैसा दर्द होता है पर असल में काँटा लगे तो तीव्र वेदना होती होगी । इसीलिए आँख का कांटा मुहावरा बना है । कहा जाता है कि काँटा और शत्रु रात को सोने से पहले अवश्य याद आते है और कष्ट पहुँचाते हैं । इसीलिए यथासंभव काँटा लगने पर उसे दिन में ही निकाल दिया जाता है । मछली में भी काँटा होता है । जहाँ हमें जानकारी है, काँटे वाली मछली को लोग कम पसंद करते हैं ।
बचपन में एक गाना गाते थे:
एक, दो, तीन
बुड्ढे की मशीन
बुड्ढा गया जेल
हम गए रेल
रेल करती छुक-छुक
हमने खाए बिस्कुट
बिस्कुट बड़े खराब
हमने पी शराब
शराब बड़ी अच्छी
हमने खायी मच्छी
मच्छी में काँटा
हमने मारा चाँटा
और पास में बैठे साथी को चाँटा मार देते थे ।
काँटे केवल अनुपयोगी ही नहीं हैं । काँटों का सदुपयोग भी किया जा सकता है और किया जाता है । काँटे का उपयोग छुरी के साथ खाना खाने के लिए भी किया जाता है । खाना खाते समय छुरी किस हाथ में पकड़नी है और काँटा किस हाथ में पकड़ना है इसका भी संविधान है । जिसे यह नहीं पता उसे सभ्य समाज में एकदम गँवार समझा जाता है । सच कहें तो हमें खुद नहीं पता यह छुरी काँटे का यह नियम ।
सीमा पर काँटेदार तार लगाकर आतंकवादियों की घुसपैठ को रोकने की कोशिश हमारी सरकार करती रही है । जब कुएं में बाल्टी गिर जाती है तो काँटे से ही उसे निकालने का प्रयास किया जाता है । अधिकतर मामलों में सफलता मिल ही जाती है ।
धर्मकाँटा भी बहुत उपयोगी साधन है । इसका उपयोग बड़े भारी वाहनों का वजन ज्ञात करने के लिए होता है।
यह कहावत तो सबने सुनी होगी कि काँटे से ही काँटा निकाला जाता है । काँटे को ही भगवान ने फूलों की रक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा है । जिस फूल की रक्षा काँटा नहीं करता उसे दुनिया वाले बड़ी आसानी ने मसल देते हैं । कुछ जीवों को भी भगवान ने अपनी सुरक्षा के लिए काँटा नामक हथियार प्रदान किया है । ततैया, मधुमक्खी और बिच्छू के डंक भी काँटे के ही रूप हैं ।
बॉलीवुड ने भी काँटे को खूब भुनाया है । 'फूल और काँटे' फिल्म बड़ी हिट हुई थी । राजेश खन्ना जी की फिल्म 'आपकी कसम' का गाना 'काँटा लागे न कंकर' तो सभी को याद हो होगा । इसके अलावा 'काँटा लगा.. बेरी के पीछे.' नामक गाना तो धमाल ही कर गया था ।
कुल मिलाकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि काँटे को उसका वह स्थान कभी समाज ने नहीं दिया जिसका वह वास्तव में हकदार है । उसे जब चाहा काम निकाल लिया । जब चाहा काँटा कहकर उपेक्षित कर दिया । सरकार से हमारी माँग है कि काँटे को उसका उचित स्थान मिलना ही चाहिये ।
रविवार, अप्रैल 18, 2010
कोंपल की करुण कहानी
शाखा में छिप सर्दी काटी,
लम्बा समय बिताया ।
कोंपल ने जब बाहर देखा,
उसका मन हरषाया ॥
जाड़ा मिला नदारद उसको,
बसन्त का मौसम था ।
दिन में कुछ गरमाया सा था,
रातों को कुछ नम था ॥
अवसर यह अनुकूल जान,
उसने बाहर आने का ।
किया पैक सामान सभी,
इस दुनिया में लाने का ॥
परमीशन पेढ़ से माँगकर,
कोंपल बाहर आयी ।
आसपास की शाखाओं ने,
भेजी उसे बधाई ॥
उसका सपना था, बढ़कर वह,
डाली एक बनेगी ।
किसी धूप से त्रस्त पथिक के,
ऊपर कभी तनेगी ॥
करके पर-उपकार, लक्ष्य
जीवन का मिल जाएगा ।
होगा जीना व्यर्थ, किसी के
काम न यदि आयेगा ॥
किन्तु हाय वह क्या जाने,
उसका जीवन अब कम था ।
समझा जिसे बसन्त, असल में
गरमी का मौसम था ।
अत्याचारी लू ने,
बेचारी को आ धमकाया ।
प्राण पखेरू उड़े, रह गयी,
केवल नश्वर काया ॥
देख देखकर मृत शरीर,
कोंपल का सूखा-सूखा ।
आज रो दिया कौआ भी,
जो था कुछ रूखा-रूखा ॥
हमने अपनी आँखों से,
देखी यह करुण कहानी ।
अपनी भी आँखों में आया
मामूली सा पानी ॥
किसी धूप से त्रस्त पथिक के,
ऊपर कभी तनेगी ॥
करके पर-उपकार, लक्ष्य
जीवन का मिल जाएगा ।
होगा जीना व्यर्थ, किसी के
काम न यदि आयेगा ॥
किन्तु हाय वह क्या जाने,
उसका जीवन अब कम था ।
समझा जिसे बसन्त, असल में
गरमी का मौसम था ।
अत्याचारी लू ने,
बेचारी को आ धमकाया ।
प्राण पखेरू उड़े, रह गयी,
केवल नश्वर काया ॥
देख देखकर मृत शरीर,
कोंपल का सूखा-सूखा ।
आज रो दिया कौआ भी,
जो था कुछ रूखा-रूखा ॥
हमने अपनी आँखों से,
देखी यह करुण कहानी ।
अपनी भी आँखों में आया
मामूली सा पानी ॥
शनिवार, अप्रैल 17, 2010
यह सब तो होता रहता है
त्राहि माम् की आवाजों से ।
और कालिया की आहों से ॥
गूँज गया सब कोना कोना ।
गब्बर ने सुन रोना-धोना ॥
समझा सब माज़रा सहज ही ।
मँगा कालिया का कागज़ भी ॥
उसको साँबा से बुलवाया ।
बड़े प्यार से यूँ समझाया ॥
"ये सब तो होता रहता है ।
कहने दो कोई कहता है ॥
अपना काम रखो तुम जारी ।
बेज़ा वक्त करो मत ख्वारी ॥
तुमसे हमको आशाएं हैं ।
कहीं बोल मत जाना तुम टैं ॥
मैडम को मैं समझा लूँगा ।
कोई अच्छी गोली दूँगा ॥
लेकिन जरा सँभल के भाई ।
ज्यादा अपनी हो न हँसाई ॥"
गब्बर बोल रहा अविरामा ।
"पहले लेउ राम का नामा ॥
फिर सुमिरो हनुमत बलवीरा ।
हरहिं कृपानिधि दुर्जन पीरा ॥
मौका देख करो सब काजा।
डाकू को ना सोहे लाजा॥
तुम तो अभी नए डाकू हो ।
कभी छोड़ना मत चाकू को ॥
कभी कैमरे में मत फँसना ।
आरोपों पर पहले हँसना ॥
फिर कह देना, "सब साजिश है ।
मुझे मीडिया से ही रिस है ॥
सदा फालतू खबरें लाता ।
खुद ही बड़े बवाल बनाता॥
यूँ ही लोगों को बहकाता।
पूँजीपति की रिश्वत खाता ॥
कितनी और समस्याएं हैं ।
उनकी क्यों न खबर सब को दें ॥
लेकिन मेहनत कौन करेगा ?
हमने चालू किया मरेगा ॥
हम तो जनता के सेवक हैं ।
पहुँच हमारी दिल्ली तक है ॥
जनसेवा हम सदा करेंगे ।
इससे ज्यादा कुछ न कहेंगे ॥" "
और कालिया की आहों से ॥
गूँज गया सब कोना कोना ।
गब्बर ने सुन रोना-धोना ॥
समझा सब माज़रा सहज ही ।
मँगा कालिया का कागज़ भी ॥
उसको साँबा से बुलवाया ।
बड़े प्यार से यूँ समझाया ॥
"ये सब तो होता रहता है ।
कहने दो कोई कहता है ॥
अपना काम रखो तुम जारी ।
बेज़ा वक्त करो मत ख्वारी ॥
तुमसे हमको आशाएं हैं ।
कहीं बोल मत जाना तुम टैं ॥
मैडम को मैं समझा लूँगा ।
कोई अच्छी गोली दूँगा ॥
लेकिन जरा सँभल के भाई ।
ज्यादा अपनी हो न हँसाई ॥"
गब्बर बोल रहा अविरामा ।
"पहले लेउ राम का नामा ॥
फिर सुमिरो हनुमत बलवीरा ।
हरहिं कृपानिधि दुर्जन पीरा ॥
मौका देख करो सब काजा।
डाकू को ना सोहे लाजा॥
तुम तो अभी नए डाकू हो ।
कभी छोड़ना मत चाकू को ॥
कभी कैमरे में मत फँसना ।
आरोपों पर पहले हँसना ॥
फिर कह देना, "सब साजिश है ।
मुझे मीडिया से ही रिस है ॥
सदा फालतू खबरें लाता ।
खुद ही बड़े बवाल बनाता॥
यूँ ही लोगों को बहकाता।
पूँजीपति की रिश्वत खाता ॥
कितनी और समस्याएं हैं ।
उनकी क्यों न खबर सब को दें ॥
लेकिन मेहनत कौन करेगा ?
हमने चालू किया मरेगा ॥
हम तो जनता के सेवक हैं ।
पहुँच हमारी दिल्ली तक है ॥
जनसेवा हम सदा करेंगे ।
इससे ज्यादा कुछ न कहेंगे ॥" "
उठा दो ठेका
अभी हाल ही में सम्पन्न हाई-स्कूल की परीक्षाओं में हिन्दी विषय में 'ठेकेदारी प्रथा' पर निबंध लिखने को कहा गया । एक परीक्षार्थी ने निबंध तो लिख लिया किन्तु बाकी प्रश्नों के उत्तर न लिख सका । लिहाज़ा उत्तर-पुस्तिका लेकर भाग निकला । हड़कम्प मच गया । कई चपरासी उसके पीछे दौड़ाए गए । इस भाग-दौड़ में उत्तर पुस्तिका रास्ते में गिर गई । दैवयोग से आधा घण्टा हमें उसे पढ़ने का अवसर मिल गया । यहाँ हम अपनी स्मृति के आधार पर वह निबंध प्रस्तुत कर रहे हैं ।
प्रस्तावना : यह युग सूचना क्रान्ति का युग है । जब देखिए कहीं न कहीं से ज्ञान की बौछारें पड़ रही हैं । हर आदमी बेचारा ज्ञान से तर-ब-तर होकर इस फ़िराक में है कि ज्ञान से गीली इस नश्वर देह को कहीं ऐसी जगह जाकर सुखा ले जहाँ ज्ञान न हो, पर ऐसी जगह मिले तब न । ऐसी ज्ञानफुल दुनिया में भला कौन अज्ञानी होगा जो ठेकेदार के नाम से अपरिचित हो । संसार में तारों को तोड़कर पृथ्वी पर लाने के अलावा शायद ही कोई ऐसा कार्य होगा जो ठेकेदार न कर पाया हो । तारे भी नहीं तोड़े तो सिर्फ़ इसलिए कि पृथ्वी इतना ताप कैसे सहेगी भला ?
ठेकेदारी का इतिहास : ठेकेदारी प्रथा की शुरुआत के बारे में अभी सही सही जानकारी नहीं मिल सकी है कि यह प्रथा कब और किसके द्वारा शुरू की गयी । ठेकेदार संघ का मानना है कि ठेकेदारी की शुरूआत सृष्टि की रचना से भी पहले हो गयी थी जब ब्रह्मा जी को सृष्टि के निर्माण का ठेका मिला था । इसके बाद विष्णु भगवान को, और शिव को क्या ठेके मिले इसे तो सभी जानते ही हैं । हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से मिले मकानों की एक जैसी योजना देखकर भी लगता है कि वहाँ टाउनशिप बनाने का ठेका किसी एक ठेकेदार को ही दिया गया होगा ।
रामायण की ओर नज़र घुमाएं तो पाते हैं कि ऋषि विश्वामित्र ने जब यज्ञ करने का ठेका लिया तो उसकी सुरक्षा का उपठेका राम और लक्ष्मण को दे दिया था । आगे चलकर श्री राम ने सुग्रीव से बाली को मारने का ठेका लिया । सुग्रीव के लिए ठेका देना नई बात थी । आदिवासियों जैसे खून के बदले खून जैसी कई प्रथाएं चल रही हैं उसी तरह उन्होंने ठेके के बदले राम से ठेका ही लिया । सीताजी की खोज का ठेका ।
भारत में जब अंग्रेजों का दबदबा कायम हुआ तो उन्होंने भी कर वसूलने का ठेका जमींदारों को दे दिया । यहाँ के राजाओं ने अपनी सुरक्षा का ठेका अंग्रेजों को दे दिया ।
ठेकेदारी का महत्व : ठेकेदारी का महत्व इसी बात से पता लग जाता है कि आजकल जो काम असंभव दिखाई पड़ने लगे तो लोग ठेकेदार की शरण में जाते हैं । कोई अपने दुश्मन को टपकाने में असमर्थ है । ठेके पर टपकवा लेता है । किसी की शादी नहीं हो पा रही है तो ठेके पर दुल्हन ले आता है । पत्नी बच्चा पैदा नहीं कर पा रही या नहीं करना चाहती । ठेके पर पैदा करवा लेता है ।
ठेके देने और लेने में कम्पनियाँ भी पीछे नहीं हैं । हमारे देश की निजी कम्पनियाँ विदेशों में जा जाकर ठेके ले रहीं हैं । वहीं सार्वजनिक कम्पनियों को अपना काम ठेके पर करवाने में सहूलियत हो रही है ।
अगर कोई राजनीतिक दल अप्रत्याशित रूप से चुनाव में जीत जाय और उसका नेता सरकार चलाने के लिये मानसिक रूप से तैयार न हो तो सरकार भी ठेके पर चलवाई जा सकती है । सरकार भी जो काम खुद नहीं कर पाती उसे ठेके पर करवा लेती है ।
विकास की संभावना : यूँ तो ठेकेदारी प्रथा अपने चरम पर मालूम होती है लेकिन यह सत्य नहीं है । वास्तव में जब तक विश्व में कोई भी कार्य ऐसा है जो ठेके पर नहीं हो रहा है तब तक ठेकेदारों को चैन से न बैठना चाहिये । अगर कोई ठेका देने वाला नहीं तो ऐसे काम का ठेका लेने के लिए कुछ स्वयंभू ठेकेदार सामने आ जाते हैं । हमारे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र धर्म और संस्कृति तो ऐसे ही स्वयंभू ठेकेदारों के दम पर ही चल रहे हैं ।
उपसंहार : यदि ठेकेदारी के सभी गुणों का वर्णन करने लगें तो जितना कागज कबीर के गुरु के गुण वर्णन लगने में लगा था उससे एक पेज ज्यादा ही लगेगा । ठेकेदारी प्रथा को ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान मानकर इसका लाभ उठाने वाला ही कलयुग में सफलता प्राप्त करेगा । जैसे हथियारों में ब्रह्मास्त्र श्रेष्ठ है वैसे ही कार्य सम्पन्न करने के साधनों में ठेकेदारी श्रेष्ठ है ।
कैसी बिडम्बना है कि ठेकेदारी के होते हुए इस देश में अभी तक समस्याओं का नामोनिशान बचा हुआ है । क्यों नहीं हर समस्या को हल करने का ठेका एक ठेकेदार को दे दिया जाता ? फिर ठेकेदार जाने और उसका काम जाने । हम चिंता मुक्त हो जाएंगे ।
आतंकवाद की समस्या है ? उठा दो ठेका । नक्सलवाद की समस्या है ? उठा दो ठेका । और तो और, अगर कोई पार्टी चुनाव में बार बार हार जा रही है ? उठा दो ठेका ।
ठेकेदारी प्रथा पर निबंध
प्रस्तावना : यह युग सूचना क्रान्ति का युग है । जब देखिए कहीं न कहीं से ज्ञान की बौछारें पड़ रही हैं । हर आदमी बेचारा ज्ञान से तर-ब-तर होकर इस फ़िराक में है कि ज्ञान से गीली इस नश्वर देह को कहीं ऐसी जगह जाकर सुखा ले जहाँ ज्ञान न हो, पर ऐसी जगह मिले तब न । ऐसी ज्ञानफुल दुनिया में भला कौन अज्ञानी होगा जो ठेकेदार के नाम से अपरिचित हो । संसार में तारों को तोड़कर पृथ्वी पर लाने के अलावा शायद ही कोई ऐसा कार्य होगा जो ठेकेदार न कर पाया हो । तारे भी नहीं तोड़े तो सिर्फ़ इसलिए कि पृथ्वी इतना ताप कैसे सहेगी भला ?
ठेकेदारी का इतिहास : ठेकेदारी प्रथा की शुरुआत के बारे में अभी सही सही जानकारी नहीं मिल सकी है कि यह प्रथा कब और किसके द्वारा शुरू की गयी । ठेकेदार संघ का मानना है कि ठेकेदारी की शुरूआत सृष्टि की रचना से भी पहले हो गयी थी जब ब्रह्मा जी को सृष्टि के निर्माण का ठेका मिला था । इसके बाद विष्णु भगवान को, और शिव को क्या ठेके मिले इसे तो सभी जानते ही हैं । हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से मिले मकानों की एक जैसी योजना देखकर भी लगता है कि वहाँ टाउनशिप बनाने का ठेका किसी एक ठेकेदार को ही दिया गया होगा ।
रामायण की ओर नज़र घुमाएं तो पाते हैं कि ऋषि विश्वामित्र ने जब यज्ञ करने का ठेका लिया तो उसकी सुरक्षा का उपठेका राम और लक्ष्मण को दे दिया था । आगे चलकर श्री राम ने सुग्रीव से बाली को मारने का ठेका लिया । सुग्रीव के लिए ठेका देना नई बात थी । आदिवासियों जैसे खून के बदले खून जैसी कई प्रथाएं चल रही हैं उसी तरह उन्होंने ठेके के बदले राम से ठेका ही लिया । सीताजी की खोज का ठेका ।
भारत में जब अंग्रेजों का दबदबा कायम हुआ तो उन्होंने भी कर वसूलने का ठेका जमींदारों को दे दिया । यहाँ के राजाओं ने अपनी सुरक्षा का ठेका अंग्रेजों को दे दिया ।
ठेकेदारी का महत्व : ठेकेदारी का महत्व इसी बात से पता लग जाता है कि आजकल जो काम असंभव दिखाई पड़ने लगे तो लोग ठेकेदार की शरण में जाते हैं । कोई अपने दुश्मन को टपकाने में असमर्थ है । ठेके पर टपकवा लेता है । किसी की शादी नहीं हो पा रही है तो ठेके पर दुल्हन ले आता है । पत्नी बच्चा पैदा नहीं कर पा रही या नहीं करना चाहती । ठेके पर पैदा करवा लेता है ।
ठेके देने और लेने में कम्पनियाँ भी पीछे नहीं हैं । हमारे देश की निजी कम्पनियाँ विदेशों में जा जाकर ठेके ले रहीं हैं । वहीं सार्वजनिक कम्पनियों को अपना काम ठेके पर करवाने में सहूलियत हो रही है ।
अगर कोई राजनीतिक दल अप्रत्याशित रूप से चुनाव में जीत जाय और उसका नेता सरकार चलाने के लिये मानसिक रूप से तैयार न हो तो सरकार भी ठेके पर चलवाई जा सकती है । सरकार भी जो काम खुद नहीं कर पाती उसे ठेके पर करवा लेती है ।
विकास की संभावना : यूँ तो ठेकेदारी प्रथा अपने चरम पर मालूम होती है लेकिन यह सत्य नहीं है । वास्तव में जब तक विश्व में कोई भी कार्य ऐसा है जो ठेके पर नहीं हो रहा है तब तक ठेकेदारों को चैन से न बैठना चाहिये । अगर कोई ठेका देने वाला नहीं तो ऐसे काम का ठेका लेने के लिए कुछ स्वयंभू ठेकेदार सामने आ जाते हैं । हमारे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र धर्म और संस्कृति तो ऐसे ही स्वयंभू ठेकेदारों के दम पर ही चल रहे हैं ।
उपसंहार : यदि ठेकेदारी के सभी गुणों का वर्णन करने लगें तो जितना कागज कबीर के गुरु के गुण वर्णन लगने में लगा था उससे एक पेज ज्यादा ही लगेगा । ठेकेदारी प्रथा को ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान मानकर इसका लाभ उठाने वाला ही कलयुग में सफलता प्राप्त करेगा । जैसे हथियारों में ब्रह्मास्त्र श्रेष्ठ है वैसे ही कार्य सम्पन्न करने के साधनों में ठेकेदारी श्रेष्ठ है ।
कैसी बिडम्बना है कि ठेकेदारी के होते हुए इस देश में अभी तक समस्याओं का नामोनिशान बचा हुआ है । क्यों नहीं हर समस्या को हल करने का ठेका एक ठेकेदार को दे दिया जाता ? फिर ठेकेदार जाने और उसका काम जाने । हम चिंता मुक्त हो जाएंगे ।
आतंकवाद की समस्या है ? उठा दो ठेका । नक्सलवाद की समस्या है ? उठा दो ठेका । और तो और, अगर कोई पार्टी चुनाव में बार बार हार जा रही है ? उठा दो ठेका ।
गुरुवार, अप्रैल 15, 2010
कम परिश्रम से अधिक पुण्य कैसे कमाएं
हम बहुधा लोगों को पाप और पुण्य की चर्चा करते देखते हैं । सच कहें तो इनमें से किसी की कोई सर्वमान्य परिभाषा हमने न सुनी, न पढ़ी । भगवतीचरण वर्मा अपने उपन्यास चित्रलेखा में लिख गए हैं :
संसार में पाप कुछ भी नही है, वह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है।
वैसे भी पाप करने का हमारा कोई उद्देश्य नहीं है । जिस राह जाना ही नहीं उसके कोस क्यों गिनना ? हाँ पुण्य कमाने का इरादा अवश्य है । इस पर यदि विचार करें तो पाते हैं कि जो पाप नहीं है वह पुण्य ही है । अलग-अलग कर्मों से मिलने वाले पुण्य की मात्रा कम या ज्यादा हो सकती है । पर इस मात्रा की कोई सर्वमान्य यूनिट अभी हम नहीं जान पाए । वैसे तो जिस कार्य से कर्ता को जितना कष्ट हो पुण्य की मात्रा उतनी मानी जाती है । त्यौहार के दिन नहाने से, हवन करने से या दान करने से पुण्य मिलता है । बाकी कर्मों से मिलने वाले पुण्य की मात्रा निश्चित होती है । उसी हिसाब से पाप के नेगेटिव प्वॉइण्ट्स पुण्य के पॉजीटिव प्वॉइण्ट्स से कटते जाते हैं और शून्य के बाद पुण्य का स्टॉक बनने लगता है । पर गंगा-स्नान से आपके जितने भी पाप हैं सभी एक साथ धुल जाते हैं । मतलब गंगा जी के दरबार में जिसने ज्यादा पाप किए हैं उसे ज्यादा लाभ मिलता है । जैसे कि हमारी सरकार जब किसानों के कर्ज माफ़ करती है तो जिसने कर्ज लिया ही नहीं वह किसान घाटे में रहता है । इसलिए पुण्य करना आरम्भ करने से पहले गंगा-स्नान कर लें तो फायदे में रहेंगे ।
आपने कुछ विद्यार्थियों को देखा होगा जो आठों पहर किताब लिए दिखाई देगें । पर जब परीक्षा-परिणाम घोषित होता है तो पता चलता है कि पप्पू पास न हो सका । दरअसल वे प्लानिंग से नहीं पढ़ते । ऐसे चैप्टर ज्यादा पढ़ते रहते हैं जिनसे परीक्षा में कम अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं ।
पुण्य करने वाले को भी प्लानिंग से पुण्य करना चाहिए ताकि कम मेहनत करके अधिक पुण्य कमाया जा सके । नीचे हम आपकी सहायतार्थ कुछ सूत्र प्रस्तुत कर रहे हैं जिनसे आप पुण्य में लगने वाली मेहनत और पुण्य की मात्रा का अनुमान लगा सकते हैं ।
तो इन्तजार किस बात का है ? सलेक्ट कर लीजिए अपना पसंदीदा पुण्य । जिसमें मेहनत हो कम, पर पुण्य में फिर भी हो दम । पुण्य कमाने के इच्छुक लोगों की सहायता करके आशा है हमें भी कुछ पुण्य तो मिल ही जाएगा ।
संसार में पाप कुछ भी नही है, वह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है।
वैसे भी पाप करने का हमारा कोई उद्देश्य नहीं है । जिस राह जाना ही नहीं उसके कोस क्यों गिनना ? हाँ पुण्य कमाने का इरादा अवश्य है । इस पर यदि विचार करें तो पाते हैं कि जो पाप नहीं है वह पुण्य ही है । अलग-अलग कर्मों से मिलने वाले पुण्य की मात्रा कम या ज्यादा हो सकती है । पर इस मात्रा की कोई सर्वमान्य यूनिट अभी हम नहीं जान पाए । वैसे तो जिस कार्य से कर्ता को जितना कष्ट हो पुण्य की मात्रा उतनी मानी जाती है । त्यौहार के दिन नहाने से, हवन करने से या दान करने से पुण्य मिलता है । बाकी कर्मों से मिलने वाले पुण्य की मात्रा निश्चित होती है । उसी हिसाब से पाप के नेगेटिव प्वॉइण्ट्स पुण्य के पॉजीटिव प्वॉइण्ट्स से कटते जाते हैं और शून्य के बाद पुण्य का स्टॉक बनने लगता है । पर गंगा-स्नान से आपके जितने भी पाप हैं सभी एक साथ धुल जाते हैं । मतलब गंगा जी के दरबार में जिसने ज्यादा पाप किए हैं उसे ज्यादा लाभ मिलता है । जैसे कि हमारी सरकार जब किसानों के कर्ज माफ़ करती है तो जिसने कर्ज लिया ही नहीं वह किसान घाटे में रहता है । इसलिए पुण्य करना आरम्भ करने से पहले गंगा-स्नान कर लें तो फायदे में रहेंगे ।
आपने कुछ विद्यार्थियों को देखा होगा जो आठों पहर किताब लिए दिखाई देगें । पर जब परीक्षा-परिणाम घोषित होता है तो पता चलता है कि पप्पू पास न हो सका । दरअसल वे प्लानिंग से नहीं पढ़ते । ऐसे चैप्टर ज्यादा पढ़ते रहते हैं जिनसे परीक्षा में कम अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं ।
पुण्य करने वाले को भी प्लानिंग से पुण्य करना चाहिए ताकि कम मेहनत करके अधिक पुण्य कमाया जा सके । नीचे हम आपकी सहायतार्थ कुछ सूत्र प्रस्तुत कर रहे हैं जिनसे आप पुण्य में लगने वाली मेहनत और पुण्य की मात्रा का अनुमान लगा सकते हैं ।
- पीड़ित मानव की सेवा करके भी पुण्य कमाया जा सकता है ।
- यज्ञ करने से भी पुण्य मिलता है ।
- अश्वमेघ यज्ञ करने से और भी अधिक पुण्य मिलता है ।
- सौ अश्वमेघ यज्ञ करने से कोई व्यक्ति इंद्र पद का अधिकारी होने योग्य हो जाता है ।
- हजार अश्वमेघ यज्ञ करने से, १०० बाजपेय यज्ञ करने से और पृथ्वी की लाख बार प्रदक्षिणा करने से जो फल मिलता है सो फल कुम्भ स्नान से प्राप्त होता है।
- गंगा स्नान करने से पुण्य मिलता है ।
- माघ मास में तीन दिन स्नान करने मात्र से मानव को अश्वमेघ यज्ञ बराबर पुण्य मिलता है । प्रयाग में माघ मास के अन्दर तीन बार स्नान करने से जो फल होता है वह फल पृथ्वी में दस हजार अश्वमेघ यज्ञ करने से भी प्राप्त नहीं होता है। जो फल मनुष्यों को दस वर्ष नियम से माघ स्नान करने से होता है वह फल कुम्भ पर्व के समय तीन बार स्नान करने से प्राप्त होता है ।
- मौनी अमावस्या की शुभ घड़ी में मौन होकर किये गये स्नान से दस अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।
- कार्तिक मास में एक हजार बार यदि गंगा स्नान करें और माघ मास में सौ बार स्नान करें, बैशाख मास में नर्मदा में करोड़ बार स्नान करें तो उन स्नानों का जो फल होता है वह फल प्रयाग में कुम्भ के समय पर स्नान करने से प्राप्त होता है।।
- जब सूर्य और चंद्र मकर राशि पर हों, गुरू वृषभ राशि पर और अमावस्या भी हो तो प्रयाग में कुंभ योग पड़ता है। इस अवसर पर त्रिवेणी में स्नान करना सहस्त्रों अश्वमेघ यज्ञों के बराबर माना जाता है। यहां कुंभ सैकड़ों यज्ञों और एक लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से भी अधिक पुण्य प्रदान करता है।
- ब्राह्मण को भोजन कराने से भी पुण्य मिलता है ।
- ब्राह्मण को दान देने से भी पुण्य मिलता है ।
- ब्राह्मण को गोदान करने से और भी अधिक पुण्य मिलता है ।
- ब्राह्मण यदि वेदपाठी हो तो पुण्य क मात्रा और बढ़ जाती है ।
- तीर्थयात्रा करने से भी पुण्य मिलता है ।
- दूर के स्थान की तीर्थयात्रा का पुण्य अधिक होता है ।
- देश में मनाए जाने वाले महामहोत्सवों में जगन्नाथपुरी की रथयात्रा सबसे अहम और महत्वपूर्ण है। यह परंपरागत रथयात्रा न सिर्फ हिन्दुस्तान, बल्कि विदेशी सैलानियों के भी आकर्षण का केंद्र है। श्रीकृष्ण के अवतार जगन्नाथ की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना गया है। रथयात्रा के दौरान भक्तों को सीधे प्रतिमाओं तक पहुँचने का मौका जो मिलता है।
- श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि एकादशी व्रत का पुण्य हजार यज्ञों के पुण्य से भी अधिक है । शंखोद्धार तीर्थ एवं दर्शन करने से जो पुण्य मिलता है वह एकादशी व्रत के पुण्य के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं है । व्यतिपात योग में, संक्रान्ति में, चन्द्राग्रहण तथा सूर्यग्रहण में दान देने से और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो पुण्य मिलता है वही पुण्य एकादशी का व्रत रखने पर मिलता है । जो फल वेदपाठी ब्राह्मणों को एक हजार गौदान करने से मिलता है उससे दस गुना फल एकादशी का व्रत रखने पर मिलता है । दस श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो पुण्य मिलता है वह एकादशी व्रत के पुण्य के दशवें भाग के बराबर होता है । सहस्रों वाजपेय औरअश्वमेध यज्ञों से जो फल प्राप्त होता है, वह एकादशी के व्रत के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं होता है। संसार मेंएकादशी के बराबर कोई पुण्य नहीं।
- देवउठनी एकादशी को तुलसी-शालिग्राम विवाह में कन्यादान करने से असीम फल की प्राप्ति होती है इसमें कन्यादान करने से 100 बाजपेयी यज्ञ और 1000 अश्वमेघ करवाने के बराबर पुण्य मिलता है।
- ब्रह्मयोनि तीर्थ के बारे में मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना इसी तीर्थ के किनारे पर बैठकर की थी। इसलिए इस तीर्थ को जन्म मरण व मोक्ष का साक्षी माना जाता है। यहां बने मंदिर काफी प्राचीन हैं और यहां स्नान करने से सौ स्नानों के बराबर पुण्य मिलता है।
- कुम्भ के अवसर पर पुष्य नक्षत्र में पूर्णिमा को गंगा स्नान करने से सहस्रों यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है । कुंभ के अवसर पर सोमवती अमावस्या को गंगा स्नान करने से सहस्रों अश्वमेघ यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है ।
- वैसे यदि सोमवती अमावस्या के दिन मौनव्रत रहकर तीर्थयात्रा की जाए और वहाँ यथोचित दान-पुण्य भी किया जाय तो व्यक्ति को एक सौ गो-दान करने के बराबर पुण्य मिलता है । यही नहीं यदि इस दिन श्राद्ध किया जाय और 108 पत्तल पूरी व खीर कौओं और गायों को खिलाया जाय तो 108 अश्वमेघ यज्ञों का पुण्य मिलता है ।
- यमुना के सात दिन स्नान, गंगा में एक बार स्नान करने से जो पुण्य मिलता है उससे कहीं अधिक पुण्य मां नर्मदा के दर्शन मात्र से मिल जाता है ।
- मकर संक्रान्ति को दिये गए दान से सहस्रों गो-दान के बराबर पुण्य मिलता है ।
- ओंकारेश्वर मंदिर में पंचकेदारों के दर्शन से उतना ही पुण्य मिलता है, जितना कि केदारनाथ व अन्य चार केदार स्थानों पर दर्शन का मिलता है।
- जो स्वयं अथवा दूसरे के द्वारा तालाब बनवाता है, उसके पुण्य की संख्या बताना असंभव है।
- यदि एक राही भी पोखरे का जल पी ले तो उसके बनाने वाले पुरुष के सब पाप अवश्य नष्ट हो जाते हैं
- जो मनुष्य एक दिन भी भूमि पर जल का संग्रह एवं संरक्षण कर लेता है, वह सब पापों से छूट कर सौ वर्षों तक स्वर्गलोक में निवास करता है।
- जो मानव अपनी शक्ति भर तालाब खुदवाने में सहायता करता है, जो उससे संतुष्ट होकर उसको प्रेरणा देता है, वह भी पोखरे बनाने का पुण्य फल पा लेता है।
- जो सरसों बराबर मिट्टी भी तालाब से निकालकर बाहर फेंकता है, वह अनेक पापों से मुक्त हो, सौ वर्षों तक स्वर्ग में निवास करता है।
- जिस पर देवता अथवा गुरुजन सन्तुष्ट होते हैं, वह पोखरा खुदाने के पुण्य का भागी होता है- यह सनातन श्रुति है।
- ‘कासार’ (कच्चे पोखरे) बनाने पर तडाग (पक्के पोखरे) बनाने की अपेक्षा आधा फल बताया गया है।
- कुएँ बनाने पर चौथाई फल जानना चाहिए।
- बावड़ी (वापी) बनाने पर कमलों से भरे हुए सरोवर के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।
- नहर निकालने पर बावड़ी की अपेक्षा सौ गुना फल प्राप्त होता है।
- धनी पुरुष पत्थर से मंदिर या तालाब बनवावें और दरिद्र पुरुष मिट्टी से बनवावे तो इन दोनों को समान फल प्राप्त होता है, यह ब्रह्माजी का कथन है।
- जो धनी पुरुष उत्तम फल के साधन भूत ‘तडाग’ का निर्माण करता है और दरिद्र एक कुआँ बनवाता है, उन दोनों का पुण्य समान होता है।
- जो पोखरा खुदवाते हैं, वे भगवान् विष्णु के साथ पूजित होते हैं।
तो इन्तजार किस बात का है ? सलेक्ट कर लीजिए अपना पसंदीदा पुण्य । जिसमें मेहनत हो कम, पर पुण्य में फिर भी हो दम । पुण्य कमाने के इच्छुक लोगों की सहायता करके आशा है हमें भी कुछ पुण्य तो मिल ही जाएगा ।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
