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शुक्रवार, जनवरी 30, 2009

अगर ऐसा हो जाता



गांधी जी यदि स्वयं ही , होते न्यायाधीश ।
फाँसी नाथूराम का , कभी न छूती शीश ॥
कभी न छूती शीश, क्षमा उसको मिल जाती ।
और बडे आयाम , अहिंसा भी पा जाती ॥
विवेक सिंह यों कहें, अगर ऐसा हो जाता ।
गांधी जी का न्याय अलग इतिहास बनाता ॥

मित्रगण