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शुक्रवार, जनवरी 02, 2009

तू क्या है ?

हर इक बात पै कहते हो तुम कि तू क्या है .

तुम्हीं कहो कि ये अन्दाजे गुफ्तगू क्या है .

शायद मिर्ज़ा गालिब ने यह शेर काफी आजिज आकर कहा होगा . अगर कहने वाला यह कहता या कहती कि ," तुम क्या हो ?" तो शायद उनके दिल पर इतनी चोट न लगती . पर "तू" शब्द शायद ज्यादा चोट कर गया .

वैसे तो हिन्दी व्याकरण में हमने पढा है कि अपने से छोटों के लिए "तू" , बराबर वालों के लिए "तुम" और अपने से बडों के लिए "आप" का प्रयोग किया जाता है . मगर इस नियम का पालन व्यवहार में कम ही देखने को मिलता है . अक्सर देखते हैं कि गावँ में माँ को तू कहकर पुकारते हैं . स्वयं मैं भी अपनी मम्मी और अम्मा को तू कहकर सम्बोधित करता हूँ . सूरदास जी ने भी कहा था ," तू मो ही को मारन सीखी ." भगवान को भी तू कहा गया है .

हालाँकि शहरों में यह कम देखने को मिलता है . बल्कि यहाँ तो लोग छोटे छोटे बच्चों तक को आप ही कहकर पुकारते हैं . इससे तू शब्द लुप्तप्राय: सा हो चला है . हरियाणा में ऐसे स्थान भी हैं जहाँ पर तू के अलावा दूसरा सम्बोधन देखने को ही नहीं मिलता . माँ भी तू , बापू भी तू और भाई भी तू . शायद उसी का प्रभाव है कि हमारे ब्लॉगजगत के ताऊ को भी प्राय: लोग तू कह देते हैं . पर किसी को भी इसमें उनका अपमान होता नहीं दिखता क्योंकि ताऊ हरियाणा की पहचान हैं .

फिल्मों में तो माँ को अब तक तू कहा जा रहा है . फिर फिल्म चाहे नए जमाने का प्रतिनिधित्व करती हो या पुराने जमाने का . बल्कि फिल्म वाले तो प्रेमिका और प्रेमी को भी आपस में तू तडाक कराते हैं . किंतु इस मामले में हमारे फिल्म वाले काफी फ्लेक्सीबिल हैं जैसी तुक गाने में सही बैठे वैसा कहला देते हैं . कभी कभी तो एक ही गाने में तीनों रूप देखने को मिल जाएंगे .

कितने अपने लगते हैं बचपन के मित्र जो हमें तू कहकर बुलाते हैं ! और हम भी जिन्हें तू कहते हैं .

इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि तू में प्यार , अनन्यभाव और अपनापन छुपा है जबकि बाकी सम्बोधनों में औपचारिकता और डर छुपा रहता है . पर इसमें बहस की गुंजाइश पूरी है क्योंकि ये हमारे निहायत ही निजी विचार हैं . हमारी पार्टी लाइन का इससे कोई सम्बन्ध नहीं है .

आप भी अपने विचार रखें तो कुछ बात बने . क्या तू कहना असभ्यता है ? किसको तू कह सकते हैं ?

मित्रगण