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सोमवार, नवंबर 24, 2008

नीति-निर्धारकों का ओवरटाइम ?

सर्वविदित है कि किसी भी व्यक्ति की एक निर्धारित कार्यक्षमता होती है, जिससे अधिक जिम्मेदारी मिलने पर उसकी कार्यकुशलता प्रभावित होने लगती है । इस कार्यक्षमता का स्तर अलग अलग व्यक्तियों में अलग अलग हो सकता है, किन्तु असीमित किसी में भी नहीं होता । इसीलिए कोई भी जिम्मेदारी सौंपने से पहले व्यक्ति की सामर्थ्य को ध्यान में रखा जाना चाहिए । परन्तु हमारे देश में चलन है कि जहाँ कुछ व्यक्तियों के ऊपर जिम्मेदारियों का अम्बार है, वहीं दूसरे लोग खाली बैठे हैं ।
केन्द्र सरकार या राज्य सरकारों की बात करें तो जनता को लुभाने और वाहवाही लूटने के चक्कर में मन्त्रियों की संख्या को तो सीमित कर दिया गया पर यह नहीं सोचा गया कि एक ही मन्त्री कैसे कई विभागों की जिम्मेदारी सँभाल पाएगा । आखिर वे भी सुपरमैन तो हैं नहीं, आदमी ही हैं और ज्यादातर ऐसे हैं जो रिटायरमेंट की आयु पार कर चुके हैं तथा बिना सहारे के खड़े रह पाने की भी स्थित में नहीं हैं । अधिकतर सांसद अपनी दो करोड़ रुपये की धन राशि को ही ठिकाने नहीं लगा पाते, जो उन्हें अपने क्षेत्र में विकास कार्यों पर खर्च करने के लिए मिलती है । ऐसे में मन्त्रियों की संख्या घटाने की अपेक्षा उनके ऊपर होने वाले फालतू खर्चों को घटाना चाहिए था । उस स्थिति में कोई सांसद मन्त्री बनने के लिए राजी ही न होता, ऐसा तो लगता नहीं ।
यही हाल नौकरियों में है । मैन पॉवर शॉर्ट रखी जाती है । जहाँ एक ओर कुछ कर्मचारी वेतन से भी अधिक धनराशि ओवरटाइम के रूप में ले लेते हैं, वहीं अन्य पढे लिखे बेरोजगार चप्पल चटकाते घूमते हैं । जिस देश में इतनी बडी संख्या में लोग बेरोजगार हों वहाँ ओवरटाइम नाम की चिडिया को तो हर जगह से ढूँढ ढूँढकर उड़ा देना चाहिए । एक व्यक्ति एक पद के सिद्धान्त को हरसंभव अमल में लाया जाना चाहिए ।
पर क्या करें जब व्यवस्था के नीति निर्धारक स्वयं ओवरटाइम कर रहे हों तो उनके पास इस दिशा में सोचने की फुर्सत कहाँ ?

मित्रगण