त्राहि माम् की आवाजों से ।
और कालिया की आहों से ॥
गूँज गया सब कोना कोना ।
गब्बर ने सुन रोना-धोना ॥
समझा सब माज़रा सहज ही ।
मँगा कालिया का कागज़ भी ॥
उसको साँबा से बुलवाया ।
बड़े प्यार से यूँ समझाया ॥
"ये सब तो होता रहता है ।
कहने दो कोई कहता है ॥
अपना काम रखो तुम जारी ।
बेज़ा वक्त करो मत ख्वारी ॥
तुमसे हमको आशाएं हैं ।
कहीं बोल मत जाना तुम टैं ॥
मैडम को मैं समझा लूँगा ।
कोई अच्छी गोली दूँगा ॥
लेकिन जरा सँभल के भाई ।
ज्यादा अपनी हो न हँसाई ॥"
गब्बर बोल रहा अविरामा ।
"पहले लेउ राम का नामा ॥
फिर सुमिरो हनुमत बलवीरा ।
हरहिं कृपानिधि दुर्जन पीरा ॥
मौका देख करो सब काजा।
डाकू को ना सोहे लाजा॥
तुम तो अभी नए डाकू हो ।
कभी छोड़ना मत चाकू को ॥
कभी कैमरे में मत फँसना ।
आरोपों पर पहले हँसना ॥
फिर कह देना, "सब साजिश है ।
मुझे मीडिया से ही रिस है ॥
सदा फालतू खबरें लाता ।
खुद ही बड़े बवाल बनाता॥
यूँ ही लोगों को बहकाता।
पूँजीपति की रिश्वत खाता ॥
कितनी और समस्याएं हैं ।
उनकी क्यों न खबर सब को दें ॥
लेकिन मेहनत कौन करेगा ?
हमने चालू किया मरेगा ॥
हम तो जनता के सेवक हैं ।
पहुँच हमारी दिल्ली तक है ॥
जनसेवा हम सदा करेंगे ।
इससे ज्यादा कुछ न कहेंगे ॥" "
संभव है कि इस ब्लॉग पर लिखी बातें मेरी विचारधारा का प्रतिनिधित्व न करती हों । यहाँ लिखी बातें विभिन्न दृष्टिकोणों से सोचने का परिणाम हैं । कृपया किसी प्रकार का पूर्वाग्रह न रखें ।
शनिवार, अप्रैल 17, 2010
उठा दो ठेका
अभी हाल ही में सम्पन्न हाई-स्कूल की परीक्षाओं में हिन्दी विषय में 'ठेकेदारी प्रथा' पर निबंध लिखने को कहा गया । एक परीक्षार्थी ने निबंध तो लिख लिया किन्तु बाकी प्रश्नों के उत्तर न लिख सका । लिहाज़ा उत्तर-पुस्तिका लेकर भाग निकला । हड़कम्प मच गया । कई चपरासी उसके पीछे दौड़ाए गए । इस भाग-दौड़ में उत्तर पुस्तिका रास्ते में गिर गई । दैवयोग से आधा घण्टा हमें उसे पढ़ने का अवसर मिल गया । यहाँ हम अपनी स्मृति के आधार पर वह निबंध प्रस्तुत कर रहे हैं ।
प्रस्तावना : यह युग सूचना क्रान्ति का युग है । जब देखिए कहीं न कहीं से ज्ञान की बौछारें पड़ रही हैं । हर आदमी बेचारा ज्ञान से तर-ब-तर होकर इस फ़िराक में है कि ज्ञान से गीली इस नश्वर देह को कहीं ऐसी जगह जाकर सुखा ले जहाँ ज्ञान न हो, पर ऐसी जगह मिले तब न । ऐसी ज्ञानफुल दुनिया में भला कौन अज्ञानी होगा जो ठेकेदार के नाम से अपरिचित हो । संसार में तारों को तोड़कर पृथ्वी पर लाने के अलावा शायद ही कोई ऐसा कार्य होगा जो ठेकेदार न कर पाया हो । तारे भी नहीं तोड़े तो सिर्फ़ इसलिए कि पृथ्वी इतना ताप कैसे सहेगी भला ?
ठेकेदारी का इतिहास : ठेकेदारी प्रथा की शुरुआत के बारे में अभी सही सही जानकारी नहीं मिल सकी है कि यह प्रथा कब और किसके द्वारा शुरू की गयी । ठेकेदार संघ का मानना है कि ठेकेदारी की शुरूआत सृष्टि की रचना से भी पहले हो गयी थी जब ब्रह्मा जी को सृष्टि के निर्माण का ठेका मिला था । इसके बाद विष्णु भगवान को, और शिव को क्या ठेके मिले इसे तो सभी जानते ही हैं । हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से मिले मकानों की एक जैसी योजना देखकर भी लगता है कि वहाँ टाउनशिप बनाने का ठेका किसी एक ठेकेदार को ही दिया गया होगा ।
रामायण की ओर नज़र घुमाएं तो पाते हैं कि ऋषि विश्वामित्र ने जब यज्ञ करने का ठेका लिया तो उसकी सुरक्षा का उपठेका राम और लक्ष्मण को दे दिया था । आगे चलकर श्री राम ने सुग्रीव से बाली को मारने का ठेका लिया । सुग्रीव के लिए ठेका देना नई बात थी । आदिवासियों जैसे खून के बदले खून जैसी कई प्रथाएं चल रही हैं उसी तरह उन्होंने ठेके के बदले राम से ठेका ही लिया । सीताजी की खोज का ठेका ।
भारत में जब अंग्रेजों का दबदबा कायम हुआ तो उन्होंने भी कर वसूलने का ठेका जमींदारों को दे दिया । यहाँ के राजाओं ने अपनी सुरक्षा का ठेका अंग्रेजों को दे दिया ।
ठेकेदारी का महत्व : ठेकेदारी का महत्व इसी बात से पता लग जाता है कि आजकल जो काम असंभव दिखाई पड़ने लगे तो लोग ठेकेदार की शरण में जाते हैं । कोई अपने दुश्मन को टपकाने में असमर्थ है । ठेके पर टपकवा लेता है । किसी की शादी नहीं हो पा रही है तो ठेके पर दुल्हन ले आता है । पत्नी बच्चा पैदा नहीं कर पा रही या नहीं करना चाहती । ठेके पर पैदा करवा लेता है ।
ठेके देने और लेने में कम्पनियाँ भी पीछे नहीं हैं । हमारे देश की निजी कम्पनियाँ विदेशों में जा जाकर ठेके ले रहीं हैं । वहीं सार्वजनिक कम्पनियों को अपना काम ठेके पर करवाने में सहूलियत हो रही है ।
अगर कोई राजनीतिक दल अप्रत्याशित रूप से चुनाव में जीत जाय और उसका नेता सरकार चलाने के लिये मानसिक रूप से तैयार न हो तो सरकार भी ठेके पर चलवाई जा सकती है । सरकार भी जो काम खुद नहीं कर पाती उसे ठेके पर करवा लेती है ।
विकास की संभावना : यूँ तो ठेकेदारी प्रथा अपने चरम पर मालूम होती है लेकिन यह सत्य नहीं है । वास्तव में जब तक विश्व में कोई भी कार्य ऐसा है जो ठेके पर नहीं हो रहा है तब तक ठेकेदारों को चैन से न बैठना चाहिये । अगर कोई ठेका देने वाला नहीं तो ऐसे काम का ठेका लेने के लिए कुछ स्वयंभू ठेकेदार सामने आ जाते हैं । हमारे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र धर्म और संस्कृति तो ऐसे ही स्वयंभू ठेकेदारों के दम पर ही चल रहे हैं ।
उपसंहार : यदि ठेकेदारी के सभी गुणों का वर्णन करने लगें तो जितना कागज कबीर के गुरु के गुण वर्णन लगने में लगा था उससे एक पेज ज्यादा ही लगेगा । ठेकेदारी प्रथा को ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान मानकर इसका लाभ उठाने वाला ही कलयुग में सफलता प्राप्त करेगा । जैसे हथियारों में ब्रह्मास्त्र श्रेष्ठ है वैसे ही कार्य सम्पन्न करने के साधनों में ठेकेदारी श्रेष्ठ है ।
कैसी बिडम्बना है कि ठेकेदारी के होते हुए इस देश में अभी तक समस्याओं का नामोनिशान बचा हुआ है । क्यों नहीं हर समस्या को हल करने का ठेका एक ठेकेदार को दे दिया जाता ? फिर ठेकेदार जाने और उसका काम जाने । हम चिंता मुक्त हो जाएंगे ।
आतंकवाद की समस्या है ? उठा दो ठेका । नक्सलवाद की समस्या है ? उठा दो ठेका । और तो और, अगर कोई पार्टी चुनाव में बार बार हार जा रही है ? उठा दो ठेका ।
ठेकेदारी प्रथा पर निबंध
प्रस्तावना : यह युग सूचना क्रान्ति का युग है । जब देखिए कहीं न कहीं से ज्ञान की बौछारें पड़ रही हैं । हर आदमी बेचारा ज्ञान से तर-ब-तर होकर इस फ़िराक में है कि ज्ञान से गीली इस नश्वर देह को कहीं ऐसी जगह जाकर सुखा ले जहाँ ज्ञान न हो, पर ऐसी जगह मिले तब न । ऐसी ज्ञानफुल दुनिया में भला कौन अज्ञानी होगा जो ठेकेदार के नाम से अपरिचित हो । संसार में तारों को तोड़कर पृथ्वी पर लाने के अलावा शायद ही कोई ऐसा कार्य होगा जो ठेकेदार न कर पाया हो । तारे भी नहीं तोड़े तो सिर्फ़ इसलिए कि पृथ्वी इतना ताप कैसे सहेगी भला ?
ठेकेदारी का इतिहास : ठेकेदारी प्रथा की शुरुआत के बारे में अभी सही सही जानकारी नहीं मिल सकी है कि यह प्रथा कब और किसके द्वारा शुरू की गयी । ठेकेदार संघ का मानना है कि ठेकेदारी की शुरूआत सृष्टि की रचना से भी पहले हो गयी थी जब ब्रह्मा जी को सृष्टि के निर्माण का ठेका मिला था । इसके बाद विष्णु भगवान को, और शिव को क्या ठेके मिले इसे तो सभी जानते ही हैं । हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से मिले मकानों की एक जैसी योजना देखकर भी लगता है कि वहाँ टाउनशिप बनाने का ठेका किसी एक ठेकेदार को ही दिया गया होगा ।
रामायण की ओर नज़र घुमाएं तो पाते हैं कि ऋषि विश्वामित्र ने जब यज्ञ करने का ठेका लिया तो उसकी सुरक्षा का उपठेका राम और लक्ष्मण को दे दिया था । आगे चलकर श्री राम ने सुग्रीव से बाली को मारने का ठेका लिया । सुग्रीव के लिए ठेका देना नई बात थी । आदिवासियों जैसे खून के बदले खून जैसी कई प्रथाएं चल रही हैं उसी तरह उन्होंने ठेके के बदले राम से ठेका ही लिया । सीताजी की खोज का ठेका ।
भारत में जब अंग्रेजों का दबदबा कायम हुआ तो उन्होंने भी कर वसूलने का ठेका जमींदारों को दे दिया । यहाँ के राजाओं ने अपनी सुरक्षा का ठेका अंग्रेजों को दे दिया ।
ठेकेदारी का महत्व : ठेकेदारी का महत्व इसी बात से पता लग जाता है कि आजकल जो काम असंभव दिखाई पड़ने लगे तो लोग ठेकेदार की शरण में जाते हैं । कोई अपने दुश्मन को टपकाने में असमर्थ है । ठेके पर टपकवा लेता है । किसी की शादी नहीं हो पा रही है तो ठेके पर दुल्हन ले आता है । पत्नी बच्चा पैदा नहीं कर पा रही या नहीं करना चाहती । ठेके पर पैदा करवा लेता है ।
ठेके देने और लेने में कम्पनियाँ भी पीछे नहीं हैं । हमारे देश की निजी कम्पनियाँ विदेशों में जा जाकर ठेके ले रहीं हैं । वहीं सार्वजनिक कम्पनियों को अपना काम ठेके पर करवाने में सहूलियत हो रही है ।
अगर कोई राजनीतिक दल अप्रत्याशित रूप से चुनाव में जीत जाय और उसका नेता सरकार चलाने के लिये मानसिक रूप से तैयार न हो तो सरकार भी ठेके पर चलवाई जा सकती है । सरकार भी जो काम खुद नहीं कर पाती उसे ठेके पर करवा लेती है ।
विकास की संभावना : यूँ तो ठेकेदारी प्रथा अपने चरम पर मालूम होती है लेकिन यह सत्य नहीं है । वास्तव में जब तक विश्व में कोई भी कार्य ऐसा है जो ठेके पर नहीं हो रहा है तब तक ठेकेदारों को चैन से न बैठना चाहिये । अगर कोई ठेका देने वाला नहीं तो ऐसे काम का ठेका लेने के लिए कुछ स्वयंभू ठेकेदार सामने आ जाते हैं । हमारे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र धर्म और संस्कृति तो ऐसे ही स्वयंभू ठेकेदारों के दम पर ही चल रहे हैं ।
उपसंहार : यदि ठेकेदारी के सभी गुणों का वर्णन करने लगें तो जितना कागज कबीर के गुरु के गुण वर्णन लगने में लगा था उससे एक पेज ज्यादा ही लगेगा । ठेकेदारी प्रथा को ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान मानकर इसका लाभ उठाने वाला ही कलयुग में सफलता प्राप्त करेगा । जैसे हथियारों में ब्रह्मास्त्र श्रेष्ठ है वैसे ही कार्य सम्पन्न करने के साधनों में ठेकेदारी श्रेष्ठ है ।
कैसी बिडम्बना है कि ठेकेदारी के होते हुए इस देश में अभी तक समस्याओं का नामोनिशान बचा हुआ है । क्यों नहीं हर समस्या को हल करने का ठेका एक ठेकेदार को दे दिया जाता ? फिर ठेकेदार जाने और उसका काम जाने । हम चिंता मुक्त हो जाएंगे ।
आतंकवाद की समस्या है ? उठा दो ठेका । नक्सलवाद की समस्या है ? उठा दो ठेका । और तो और, अगर कोई पार्टी चुनाव में बार बार हार जा रही है ? उठा दो ठेका ।
गुरुवार, अप्रैल 15, 2010
कम परिश्रम से अधिक पुण्य कैसे कमाएं
हम बहुधा लोगों को पाप और पुण्य की चर्चा करते देखते हैं । सच कहें तो इनमें से किसी की कोई सर्वमान्य परिभाषा हमने न सुनी, न पढ़ी । भगवतीचरण वर्मा अपने उपन्यास चित्रलेखा में लिख गए हैं :
संसार में पाप कुछ भी नही है, वह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है।
वैसे भी पाप करने का हमारा कोई उद्देश्य नहीं है । जिस राह जाना ही नहीं उसके कोस क्यों गिनना ? हाँ पुण्य कमाने का इरादा अवश्य है । इस पर यदि विचार करें तो पाते हैं कि जो पाप नहीं है वह पुण्य ही है । अलग-अलग कर्मों से मिलने वाले पुण्य की मात्रा कम या ज्यादा हो सकती है । पर इस मात्रा की कोई सर्वमान्य यूनिट अभी हम नहीं जान पाए । वैसे तो जिस कार्य से कर्ता को जितना कष्ट हो पुण्य की मात्रा उतनी मानी जाती है । त्यौहार के दिन नहाने से, हवन करने से या दान करने से पुण्य मिलता है । बाकी कर्मों से मिलने वाले पुण्य की मात्रा निश्चित होती है । उसी हिसाब से पाप के नेगेटिव प्वॉइण्ट्स पुण्य के पॉजीटिव प्वॉइण्ट्स से कटते जाते हैं और शून्य के बाद पुण्य का स्टॉक बनने लगता है । पर गंगा-स्नान से आपके जितने भी पाप हैं सभी एक साथ धुल जाते हैं । मतलब गंगा जी के दरबार में जिसने ज्यादा पाप किए हैं उसे ज्यादा लाभ मिलता है । जैसे कि हमारी सरकार जब किसानों के कर्ज माफ़ करती है तो जिसने कर्ज लिया ही नहीं वह किसान घाटे में रहता है । इसलिए पुण्य करना आरम्भ करने से पहले गंगा-स्नान कर लें तो फायदे में रहेंगे ।
आपने कुछ विद्यार्थियों को देखा होगा जो आठों पहर किताब लिए दिखाई देगें । पर जब परीक्षा-परिणाम घोषित होता है तो पता चलता है कि पप्पू पास न हो सका । दरअसल वे प्लानिंग से नहीं पढ़ते । ऐसे चैप्टर ज्यादा पढ़ते रहते हैं जिनसे परीक्षा में कम अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं ।
पुण्य करने वाले को भी प्लानिंग से पुण्य करना चाहिए ताकि कम मेहनत करके अधिक पुण्य कमाया जा सके । नीचे हम आपकी सहायतार्थ कुछ सूत्र प्रस्तुत कर रहे हैं जिनसे आप पुण्य में लगने वाली मेहनत और पुण्य की मात्रा का अनुमान लगा सकते हैं ।
तो इन्तजार किस बात का है ? सलेक्ट कर लीजिए अपना पसंदीदा पुण्य । जिसमें मेहनत हो कम, पर पुण्य में फिर भी हो दम । पुण्य कमाने के इच्छुक लोगों की सहायता करके आशा है हमें भी कुछ पुण्य तो मिल ही जाएगा ।
संसार में पाप कुछ भी नही है, वह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है।
वैसे भी पाप करने का हमारा कोई उद्देश्य नहीं है । जिस राह जाना ही नहीं उसके कोस क्यों गिनना ? हाँ पुण्य कमाने का इरादा अवश्य है । इस पर यदि विचार करें तो पाते हैं कि जो पाप नहीं है वह पुण्य ही है । अलग-अलग कर्मों से मिलने वाले पुण्य की मात्रा कम या ज्यादा हो सकती है । पर इस मात्रा की कोई सर्वमान्य यूनिट अभी हम नहीं जान पाए । वैसे तो जिस कार्य से कर्ता को जितना कष्ट हो पुण्य की मात्रा उतनी मानी जाती है । त्यौहार के दिन नहाने से, हवन करने से या दान करने से पुण्य मिलता है । बाकी कर्मों से मिलने वाले पुण्य की मात्रा निश्चित होती है । उसी हिसाब से पाप के नेगेटिव प्वॉइण्ट्स पुण्य के पॉजीटिव प्वॉइण्ट्स से कटते जाते हैं और शून्य के बाद पुण्य का स्टॉक बनने लगता है । पर गंगा-स्नान से आपके जितने भी पाप हैं सभी एक साथ धुल जाते हैं । मतलब गंगा जी के दरबार में जिसने ज्यादा पाप किए हैं उसे ज्यादा लाभ मिलता है । जैसे कि हमारी सरकार जब किसानों के कर्ज माफ़ करती है तो जिसने कर्ज लिया ही नहीं वह किसान घाटे में रहता है । इसलिए पुण्य करना आरम्भ करने से पहले गंगा-स्नान कर लें तो फायदे में रहेंगे ।
आपने कुछ विद्यार्थियों को देखा होगा जो आठों पहर किताब लिए दिखाई देगें । पर जब परीक्षा-परिणाम घोषित होता है तो पता चलता है कि पप्पू पास न हो सका । दरअसल वे प्लानिंग से नहीं पढ़ते । ऐसे चैप्टर ज्यादा पढ़ते रहते हैं जिनसे परीक्षा में कम अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं ।
पुण्य करने वाले को भी प्लानिंग से पुण्य करना चाहिए ताकि कम मेहनत करके अधिक पुण्य कमाया जा सके । नीचे हम आपकी सहायतार्थ कुछ सूत्र प्रस्तुत कर रहे हैं जिनसे आप पुण्य में लगने वाली मेहनत और पुण्य की मात्रा का अनुमान लगा सकते हैं ।
- पीड़ित मानव की सेवा करके भी पुण्य कमाया जा सकता है ।
- यज्ञ करने से भी पुण्य मिलता है ।
- अश्वमेघ यज्ञ करने से और भी अधिक पुण्य मिलता है ।
- सौ अश्वमेघ यज्ञ करने से कोई व्यक्ति इंद्र पद का अधिकारी होने योग्य हो जाता है ।
- हजार अश्वमेघ यज्ञ करने से, १०० बाजपेय यज्ञ करने से और पृथ्वी की लाख बार प्रदक्षिणा करने से जो फल मिलता है सो फल कुम्भ स्नान से प्राप्त होता है।
- गंगा स्नान करने से पुण्य मिलता है ।
- माघ मास में तीन दिन स्नान करने मात्र से मानव को अश्वमेघ यज्ञ बराबर पुण्य मिलता है । प्रयाग में माघ मास के अन्दर तीन बार स्नान करने से जो फल होता है वह फल पृथ्वी में दस हजार अश्वमेघ यज्ञ करने से भी प्राप्त नहीं होता है। जो फल मनुष्यों को दस वर्ष नियम से माघ स्नान करने से होता है वह फल कुम्भ पर्व के समय तीन बार स्नान करने से प्राप्त होता है ।
- मौनी अमावस्या की शुभ घड़ी में मौन होकर किये गये स्नान से दस अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।
- कार्तिक मास में एक हजार बार यदि गंगा स्नान करें और माघ मास में सौ बार स्नान करें, बैशाख मास में नर्मदा में करोड़ बार स्नान करें तो उन स्नानों का जो फल होता है वह फल प्रयाग में कुम्भ के समय पर स्नान करने से प्राप्त होता है।।
- जब सूर्य और चंद्र मकर राशि पर हों, गुरू वृषभ राशि पर और अमावस्या भी हो तो प्रयाग में कुंभ योग पड़ता है। इस अवसर पर त्रिवेणी में स्नान करना सहस्त्रों अश्वमेघ यज्ञों के बराबर माना जाता है। यहां कुंभ सैकड़ों यज्ञों और एक लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से भी अधिक पुण्य प्रदान करता है।
- ब्राह्मण को भोजन कराने से भी पुण्य मिलता है ।
- ब्राह्मण को दान देने से भी पुण्य मिलता है ।
- ब्राह्मण को गोदान करने से और भी अधिक पुण्य मिलता है ।
- ब्राह्मण यदि वेदपाठी हो तो पुण्य क मात्रा और बढ़ जाती है ।
- तीर्थयात्रा करने से भी पुण्य मिलता है ।
- दूर के स्थान की तीर्थयात्रा का पुण्य अधिक होता है ।
- देश में मनाए जाने वाले महामहोत्सवों में जगन्नाथपुरी की रथयात्रा सबसे अहम और महत्वपूर्ण है। यह परंपरागत रथयात्रा न सिर्फ हिन्दुस्तान, बल्कि विदेशी सैलानियों के भी आकर्षण का केंद्र है। श्रीकृष्ण के अवतार जगन्नाथ की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना गया है। रथयात्रा के दौरान भक्तों को सीधे प्रतिमाओं तक पहुँचने का मौका जो मिलता है।
- श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि एकादशी व्रत का पुण्य हजार यज्ञों के पुण्य से भी अधिक है । शंखोद्धार तीर्थ एवं दर्शन करने से जो पुण्य मिलता है वह एकादशी व्रत के पुण्य के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं है । व्यतिपात योग में, संक्रान्ति में, चन्द्राग्रहण तथा सूर्यग्रहण में दान देने से और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो पुण्य मिलता है वही पुण्य एकादशी का व्रत रखने पर मिलता है । जो फल वेदपाठी ब्राह्मणों को एक हजार गौदान करने से मिलता है उससे दस गुना फल एकादशी का व्रत रखने पर मिलता है । दस श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो पुण्य मिलता है वह एकादशी व्रत के पुण्य के दशवें भाग के बराबर होता है । सहस्रों वाजपेय औरअश्वमेध यज्ञों से जो फल प्राप्त होता है, वह एकादशी के व्रत के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं होता है। संसार मेंएकादशी के बराबर कोई पुण्य नहीं।
- देवउठनी एकादशी को तुलसी-शालिग्राम विवाह में कन्यादान करने से असीम फल की प्राप्ति होती है इसमें कन्यादान करने से 100 बाजपेयी यज्ञ और 1000 अश्वमेघ करवाने के बराबर पुण्य मिलता है।
- ब्रह्मयोनि तीर्थ के बारे में मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना इसी तीर्थ के किनारे पर बैठकर की थी। इसलिए इस तीर्थ को जन्म मरण व मोक्ष का साक्षी माना जाता है। यहां बने मंदिर काफी प्राचीन हैं और यहां स्नान करने से सौ स्नानों के बराबर पुण्य मिलता है।
- कुम्भ के अवसर पर पुष्य नक्षत्र में पूर्णिमा को गंगा स्नान करने से सहस्रों यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है । कुंभ के अवसर पर सोमवती अमावस्या को गंगा स्नान करने से सहस्रों अश्वमेघ यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है ।
- वैसे यदि सोमवती अमावस्या के दिन मौनव्रत रहकर तीर्थयात्रा की जाए और वहाँ यथोचित दान-पुण्य भी किया जाय तो व्यक्ति को एक सौ गो-दान करने के बराबर पुण्य मिलता है । यही नहीं यदि इस दिन श्राद्ध किया जाय और 108 पत्तल पूरी व खीर कौओं और गायों को खिलाया जाय तो 108 अश्वमेघ यज्ञों का पुण्य मिलता है ।
- यमुना के सात दिन स्नान, गंगा में एक बार स्नान करने से जो पुण्य मिलता है उससे कहीं अधिक पुण्य मां नर्मदा के दर्शन मात्र से मिल जाता है ।
- मकर संक्रान्ति को दिये गए दान से सहस्रों गो-दान के बराबर पुण्य मिलता है ।
- ओंकारेश्वर मंदिर में पंचकेदारों के दर्शन से उतना ही पुण्य मिलता है, जितना कि केदारनाथ व अन्य चार केदार स्थानों पर दर्शन का मिलता है।
- जो स्वयं अथवा दूसरे के द्वारा तालाब बनवाता है, उसके पुण्य की संख्या बताना असंभव है।
- यदि एक राही भी पोखरे का जल पी ले तो उसके बनाने वाले पुरुष के सब पाप अवश्य नष्ट हो जाते हैं
- जो मनुष्य एक दिन भी भूमि पर जल का संग्रह एवं संरक्षण कर लेता है, वह सब पापों से छूट कर सौ वर्षों तक स्वर्गलोक में निवास करता है।
- जो मानव अपनी शक्ति भर तालाब खुदवाने में सहायता करता है, जो उससे संतुष्ट होकर उसको प्रेरणा देता है, वह भी पोखरे बनाने का पुण्य फल पा लेता है।
- जो सरसों बराबर मिट्टी भी तालाब से निकालकर बाहर फेंकता है, वह अनेक पापों से मुक्त हो, सौ वर्षों तक स्वर्ग में निवास करता है।
- जिस पर देवता अथवा गुरुजन सन्तुष्ट होते हैं, वह पोखरा खुदाने के पुण्य का भागी होता है- यह सनातन श्रुति है।
- ‘कासार’ (कच्चे पोखरे) बनाने पर तडाग (पक्के पोखरे) बनाने की अपेक्षा आधा फल बताया गया है।
- कुएँ बनाने पर चौथाई फल जानना चाहिए।
- बावड़ी (वापी) बनाने पर कमलों से भरे हुए सरोवर के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।
- नहर निकालने पर बावड़ी की अपेक्षा सौ गुना फल प्राप्त होता है।
- धनी पुरुष पत्थर से मंदिर या तालाब बनवावें और दरिद्र पुरुष मिट्टी से बनवावे तो इन दोनों को समान फल प्राप्त होता है, यह ब्रह्माजी का कथन है।
- जो धनी पुरुष उत्तम फल के साधन भूत ‘तडाग’ का निर्माण करता है और दरिद्र एक कुआँ बनवाता है, उन दोनों का पुण्य समान होता है।
- जो पोखरा खुदवाते हैं, वे भगवान् विष्णु के साथ पूजित होते हैं।
तो इन्तजार किस बात का है ? सलेक्ट कर लीजिए अपना पसंदीदा पुण्य । जिसमें मेहनत हो कम, पर पुण्य में फिर भी हो दम । पुण्य कमाने के इच्छुक लोगों की सहायता करके आशा है हमें भी कुछ पुण्य तो मिल ही जाएगा ।
बुधवार, अप्रैल 14, 2010
जिन्हें राष्ट्र ने जन्मा वे ही, राष्ट्रपिता कहलाएं
अपना क्या है, तुम कह दो तो, हम तो मान भी जाएं ।
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
देश तरक्की बहुत कर लिया, सर जी ! हमने माना
किन्तु आज भी सिर पर मानव ढोता है पाखाना
अगर न ढोये, शायद बच्चे भूखे ही रह जाएं।
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
उद्योगों ने करी तरक्की, खरबपति खुश होते
बिटिया बढ़ती देख बाप अब भी किस्मत पर रोते
शादी अच्छी जगह हो सके, क्या तिकड़म बैठाएं।
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
जो पिछड़े हैं संसाधन पर पहले उनका हक है
लेकिन यह वर्गाधारित हो, यह सब क्या बकबक है
उच्च जातियों के गरीब क्या भूखे ही मर जाएं ?
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
जनता मालिक ? कर मजदूरी अपना टाइम काटे
जनसेवक ऐसी में लेटे, भरते हैं खर्राटे
उनको है अधिकार कि वेतन, अपना स्वयं बढ़ाएं
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
कुछ बेचारे जैसे-तैसे अपने बच्चे पालें
कुछ उन बच्चों से अच्छे तो कुत्ते-बिल्ली पालें
उनकी जूठन उतनी, जितना ये सब खा ना पाएं ।
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
राष्ट्र व्यक्ति से सदा बड़ा है, तुमने ही बतलाया
लेकिन कभी आपने हमको यह तो नहीं पढ़ाया
जिन्हें राष्ट्र ने जन्मा वे ही, राष्ट्रपिता कहलाएं ।
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
दो दो पोस्ट एक दिन में, ऐसी भी क्या आफ़त थी
तुम तो नावाकिफ़ हो जी, यह बहुत पुरानी लत थी
आज लिखें कल करें प्रकाशित, सब्र न हम कर पाएं ।
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
अपना क्या है, तुम कह दो तो, हम तो मान भी जाएं ।
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
देश तरक्की बहुत कर लिया, सर जी ! हमने माना
किन्तु आज भी सिर पर मानव ढोता है पाखाना
अगर न ढोये, शायद बच्चे भूखे ही रह जाएं।
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
उद्योगों ने करी तरक्की, खरबपति खुश होते
बिटिया बढ़ती देख बाप अब भी किस्मत पर रोते
शादी अच्छी जगह हो सके, क्या तिकड़म बैठाएं।
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
जो पिछड़े हैं संसाधन पर पहले उनका हक है
लेकिन यह वर्गाधारित हो, यह सब क्या बकबक है
उच्च जातियों के गरीब क्या भूखे ही मर जाएं ?
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
जनता मालिक ? कर मजदूरी अपना टाइम काटे
जनसेवक ऐसी में लेटे, भरते हैं खर्राटे
उनको है अधिकार कि वेतन, अपना स्वयं बढ़ाएं
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
कुछ बेचारे जैसे-तैसे अपने बच्चे पालें
कुछ उन बच्चों से अच्छे तो कुत्ते-बिल्ली पालें
उनकी जूठन उतनी, जितना ये सब खा ना पाएं ।
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
राष्ट्र व्यक्ति से सदा बड़ा है, तुमने ही बतलाया
लेकिन कभी आपने हमको यह तो नहीं पढ़ाया
जिन्हें राष्ट्र ने जन्मा वे ही, राष्ट्रपिता कहलाएं ।
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
दो दो पोस्ट एक दिन में, ऐसी भी क्या आफ़त थी
तुम तो नावाकिफ़ हो जी, यह बहुत पुरानी लत थी
आज लिखें कल करें प्रकाशित, सब्र न हम कर पाएं ।
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
अपना क्या है, तुम कह दो तो, हम तो मान भी जाएं ।
पर यह पगला नहीं मानता, दिल को क्या समझाएं ॥
सूरज दादा से रिक्वेस्ट है

मौसम कैसा यह गरमी का,
घर से निकल न पायें ।
मम्मी के ये नियम कायदे,
बिल्कुल हमें न भायें ॥
मन करता है बाहर खेलें,
परमीशन जो पायें ।
गेट खुला मिल जाये तो हम,
चुपके बाहर जायें ॥
खेलें खूब, दोस्तों के संग
मिलकर मौज मनायें ।
भूख लगे तो घर आकर बस,
आइसक्रीम ही खायें ॥
सूरज दादा से रिक्वेस्ट है,
थोड़ी धूप बचायें ।
खूब इकट्ठी जब हो जाये,
जाड़ों में ले आयें ॥
मंगलवार, अप्रैल 13, 2010
बेचारे नेता हैं
हुए आमने-सामने, मोदी और थरूर ।
लेनदेन में हो गई, कोई चूक जरूर ॥
कोई चूक जरूर, उधारी का चक्कर है ।
डूब न जाए रकम, यही दाता को डर है ॥
विवेक सिंह यों कहें अजी कुछ तो कम ले लो ।
कुछ चन्दा करवा दो, बाकी कुछ तुम दे दो ॥
लेनदेन में हो गई, कोई चूक जरूर ॥
कोई चूक जरूर, उधारी का चक्कर है ।
डूब न जाए रकम, यही दाता को डर है ॥
विवेक सिंह यों कहें अजी कुछ तो कम ले लो ।
कुछ चन्दा करवा दो, बाकी कुछ तुम दे दो ॥
गुरुवार, अप्रैल 08, 2010
नक्सलवाद गरीब ?
नक्सलवाद गरीब के, महँगे सब हथियार !
किया प्रबंधन किस तरह, समझ आया यार ?
समझ न आया यार, मदद मिल रही कहाँ से ?
पीकर लहू शान्त होती हैं किसकी प्यासें ?
बोलो तुम गृहमंत्री होते तो क्या कर लेते ?
वोटबैंक धर ताक, कड़े आदेश न देते ?
.................................................
किस्मत तू यह कर रही, कैसा क्रूर मज़ाक ?
आपा को देना पड़ा, बिना निकाह तलाक ॥
बिना निकाह तलाक, बुरा फँस गया बिचारा ।
गुम होशोहवास हैं, कुछ सोचा न विचारा ॥
साधू रोम रोम डर से बालक का काँपा ।
उसको दिया तलाक जिसे कहता था आपा ॥
किया प्रबंधन किस तरह, समझ आया यार ?
समझ न आया यार, मदद मिल रही कहाँ से ?
पीकर लहू शान्त होती हैं किसकी प्यासें ?
बोलो तुम गृहमंत्री होते तो क्या कर लेते ?
वोटबैंक धर ताक, कड़े आदेश न देते ?
.................................................
किस्मत तू यह कर रही, कैसा क्रूर मज़ाक ?
आपा को देना पड़ा, बिना निकाह तलाक ॥
बिना निकाह तलाक, बुरा फँस गया बिचारा ।
गुम होशोहवास हैं, कुछ सोचा न विचारा ॥
साधू रोम रोम डर से बालक का काँपा ।
उसको दिया तलाक जिसे कहता था आपा ॥
मंगलवार, अप्रैल 06, 2010
अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता
1759 ईसवी में मुगल बादशाह आलमगीर द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अलीगौहर शाह आलम द्वितीय के नाम से मुगल बादशाह बना । कहने को वह मुगल बादशाह था लेकिन पूरी ताकत उसके वज़ीर गाज़ीउद्दीन खान फ़िरोज़जंग तृतीय के हाथों में थी ।
वैसे शाह आलम शब्द का अर्थ अखिल विश्व का शासक होता है परन्तु स्थितियाँ ऐसी बन गयीं थी कि एक कहावत उस समय प्रचलित हो गयी 'शाह-ए-आलम, दिल्ली से पालम' क्योंकि उसका हुक्म दिल्ली से पालम तक ही बमुश्किल चलता था ।
बादशाह को अपनी स्थिति का ज्ञान था इसलिए वह शर्म के मारे दिल्ली से भाग गया । और मुगलों के खोए गौरव को फिर से प्राप्त करने की कोशिशों में लगा रहा ।
अब आज की स्थिति को देखिए । आज का शाह आलम जवानों की लाश पर भी बैठकर शासन करेगा, लेकिन गद्दी नहीं छोड़ेगा । उसे बस गद्दी चाहिए । अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता ।
जब देश में समानान्तर सरकारें चल रही हों तो कोई शासक कैसे चैन से बैठ सकता है । समझ से परे है ।
अब कुछ बयान दे दिए जाएंगे । कुछ कड़ी से कड़ी निन्दा होगी और कुछ कड़ी से कड़ी कार्यवाही । बाकी और जो मैडम का हुक्म !
वैसे शाह आलम शब्द का अर्थ अखिल विश्व का शासक होता है परन्तु स्थितियाँ ऐसी बन गयीं थी कि एक कहावत उस समय प्रचलित हो गयी 'शाह-ए-आलम, दिल्ली से पालम' क्योंकि उसका हुक्म दिल्ली से पालम तक ही बमुश्किल चलता था ।
बादशाह को अपनी स्थिति का ज्ञान था इसलिए वह शर्म के मारे दिल्ली से भाग गया । और मुगलों के खोए गौरव को फिर से प्राप्त करने की कोशिशों में लगा रहा ।
अब आज की स्थिति को देखिए । आज का शाह आलम जवानों की लाश पर भी बैठकर शासन करेगा, लेकिन गद्दी नहीं छोड़ेगा । उसे बस गद्दी चाहिए । अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता ।
जब देश में समानान्तर सरकारें चल रही हों तो कोई शासक कैसे चैन से बैठ सकता है । समझ से परे है ।
अब कुछ बयान दे दिए जाएंगे । कुछ कड़ी से कड़ी निन्दा होगी और कुछ कड़ी से कड़ी कार्यवाही । बाकी और जो मैडम का हुक्म !
सोमवार, अप्रैल 05, 2010
जयति जय पब्लिसिटी माता
जयति जय पब्लिसिटी माता
अपनी बैंक खुला दो मैया, मेरा भी खाता
ऐरे गैरे तुम्हें पा गये
फ़र्श छोड़ अर्श पै छा गये
बन्धु बान्धवी सब भुला गए
तोड़ दिया नाता
जयति जय पब्लिसिटी माता
काम न जो बनता प्रयास से
असफलता जाती न पास से
किन्तु तुम्हारी एक साँस से
गूँगा भी गाता
जयति जय पब्लिसिटी माता
मैया यूँ अन्याय न करिये
अब आरक्षण लागू करिये
अनपब्लिश के ऊपर धरिये
पब्लिश का छाता
जयति जय पब्लिसिटी माता
मैंने होश सँभाला जबसे
दर्शन को लालायित तब से
राह आपकी देखूँ कब से
और न कुछ भाता
जयति जय पब्लिसिटी माता
तुम सौ ऐबों को भी देती
तुम हो बिना खाद की खेती
किन्तु न कभी कान में लेती
याचक की बाता ?
जयति जय पब्लिसिटी माता
अपनी बैंक खुला दो मैया, मेरा भी खाता
जयति जय पब्लिसिटी माता
अपनी बैंक खुला दो मैया, मेरा भी खाता
ऐरे गैरे तुम्हें पा गये
फ़र्श छोड़ अर्श पै छा गये
बन्धु बान्धवी सब भुला गए
तोड़ दिया नाता
जयति जय पब्लिसिटी माता
काम न जो बनता प्रयास से
असफलता जाती न पास से
किन्तु तुम्हारी एक साँस से
गूँगा भी गाता
जयति जय पब्लिसिटी माता
मैया यूँ अन्याय न करिये
अब आरक्षण लागू करिये
अनपब्लिश के ऊपर धरिये
पब्लिश का छाता
जयति जय पब्लिसिटी माता
मैंने होश सँभाला जबसे
दर्शन को लालायित तब से
राह आपकी देखूँ कब से
और न कुछ भाता
जयति जय पब्लिसिटी माता
तुम सौ ऐबों को भी देती
तुम हो बिना खाद की खेती
किन्तु न कभी कान में लेती
याचक की बाता ?
जयति जय पब्लिसिटी माता
अपनी बैंक खुला दो मैया, मेरा भी खाता
जयति जय पब्लिसिटी माता
शेर का ऑफिस
चींटी रोज सुबह जल्दी ही अपने काम में लग जाती और देर शाम तक कठोर परिश्रम करती । जब जंगल के बॉस शेर ने यह देखा तो सोचा कि जब यह चींटी बिना किसी प्रेरणा के इतना उत्पादन कर रही है तो इसे सहयोग दिया जाय तो उत्पादन निश्चित ही बढ़ जाएगा । अत: उसने तिलचट्टे को चींटी का सुपरवाइजर नियुक्त कर दिया । और उससे नियमित रिपोर्ट बनाने को कहा । तिलचट्टे ने सबसे पहले काम के घण्टे निर्धारित किए और आने जाने का समय नोट करने के लिए कार्यस्थल पर एक घड़ी लगा दी । उसने टाइपिंग करने, रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने और फोन काल्स रिसीव करने के लिए एक मकड़ी को नौकरी पर रख लिया ।
शेर तिलचट्टे की रिपोर्ट देखकर बहुत खुश हुआ और उसने तिलचट्टे को ग्राफ पर चार्ट बनाने को कहा जिससे उत्पादन की दर के कम ज्यादा होने का अनुमान लगाया जा सके और विश्लेषण को बोर्ड मीटिंग में प्रस्तुत किया जा सके । इसके लिए तिलचट्टे ने एक कम्प्यूटर और एक प्रिंटर खरीदा । तितली को उसने सूचना और तकनीक विभाग की अधिकारी बना दिया ।
चींटी इस कागजी कार्य और मीटिंग्स की अधिकता से आज़िज़ आ गई क्योंकि उसका ज्यादातर समय इसी सब में चला जाता था ।
अब शेर ने सोचा कि किसी को विभागाध्यक्ष बनाना चाहिये । उसने झींगुर को इस पद पर बैठा दिया । झींगुर ने सबसे पहले एक अच्छी कुर्सी और अच्छा कालीन मँगवाया । उसने अपने पहले ऑफिस से सहाय्क को बुला लिया ताकि वह बजट बनाने और रिपोर्ट तैयार करने में उसकी मदद कर सके ।
अब वह कार्यस्थल उदास लगने लगा जहाँ कोई हँसता नहीं था । झींगुर ने बॉस को जलवायु संबन्धी जाँच कराने के लिए राजी कर लिया ।
इसी बीच शेर को पता चला कि उत्पादन तो बढ़ने के बजाय कम होता जा रहा है । उसने पूरे मामले की जाँच एक नामी गिरामी जाँच अधिकारी उल्लू के हवाले कर दी ।
उल्लू ने अपनी रिपोर्ट दी कि विभाग में कर्मचारियों की संख्या आवश्यकता से बहुत अधिक है ।
अनुमान लगाइये शेर ने किस पर क्रोध किया ?
( मित्र से मिले e-mail पर आधारित )
शेर तिलचट्टे की रिपोर्ट देखकर बहुत खुश हुआ और उसने तिलचट्टे को ग्राफ पर चार्ट बनाने को कहा जिससे उत्पादन की दर के कम ज्यादा होने का अनुमान लगाया जा सके और विश्लेषण को बोर्ड मीटिंग में प्रस्तुत किया जा सके । इसके लिए तिलचट्टे ने एक कम्प्यूटर और एक प्रिंटर खरीदा । तितली को उसने सूचना और तकनीक विभाग की अधिकारी बना दिया ।
चींटी इस कागजी कार्य और मीटिंग्स की अधिकता से आज़िज़ आ गई क्योंकि उसका ज्यादातर समय इसी सब में चला जाता था ।
अब शेर ने सोचा कि किसी को विभागाध्यक्ष बनाना चाहिये । उसने झींगुर को इस पद पर बैठा दिया । झींगुर ने सबसे पहले एक अच्छी कुर्सी और अच्छा कालीन मँगवाया । उसने अपने पहले ऑफिस से सहाय्क को बुला लिया ताकि वह बजट बनाने और रिपोर्ट तैयार करने में उसकी मदद कर सके ।
अब वह कार्यस्थल उदास लगने लगा जहाँ कोई हँसता नहीं था । झींगुर ने बॉस को जलवायु संबन्धी जाँच कराने के लिए राजी कर लिया ।
इसी बीच शेर को पता चला कि उत्पादन तो बढ़ने के बजाय कम होता जा रहा है । उसने पूरे मामले की जाँच एक नामी गिरामी जाँच अधिकारी उल्लू के हवाले कर दी ।
उल्लू ने अपनी रिपोर्ट दी कि विभाग में कर्मचारियों की संख्या आवश्यकता से बहुत अधिक है ।
अनुमान लगाइये शेर ने किस पर क्रोध किया ?
( मित्र से मिले e-mail पर आधारित )
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