रविवार, नवंबर 07, 2010

ओ मामा कुछ देते जाना

ओ मामा कुछ देते जाना
सीट सुरक्षा परिषद की दो
या देने का करो बहाना
ओ मामा कुछ देते जाना
 
थोड़ी सी तारीफ हमारी
कर दोगे यदि अबकी बारी
बिगड़ेगी न तबीयत थारी
फिर यूँ काहे का शरमाना
ओ मामा कुछ देते जाना
 
"भ्रष्टाचार कहीं भारत में
मिला न मुझे किसी हालत में
है ईमान यहाँ नीयत में"
दुनिया को ऐसा बतलाना
ओ मामा कुछ देते जाना
 
पाक पड़ौसी को हड़काना
खुलेआम कुछ डाँट पिलाना
बेशक करके फोन मनाना
खेप डालरों की भिजवाना
ओ मामा कुछ देते जाना
 
संकट में देश की लाज है
दकियानूसी यह समाज है
ऊपर से कोढ़ में खाज है
चलन गाल से गाल मिलाना
ओ मामा कुछ देते जाना
 
सीट सुरक्षा परिषद की दो
या देने का करो बहाना
ओ मामा कुछ देते जाना

मंगलवार, अक्टूबर 19, 2010

जली तो जली पर सिकी भी खूब

यूँ तो हम सभी जानते हैं कि जो आया है उसे कभी न कभी जाना ही है । फिर भी अपने प्रिय से बिछुड़ जाने पर दुख तो होता ही है ।
यही दुख मुझे तब हुआ जब लगभग तीन साल तक उठते-बैठते, सोते-जागते, खाते-पीते हमेशा मेरे साथ रहने वाला मेरा प्रिय मोबाइल नोकिया 6085 मेरा साथ छोड़ गया ।
उसके साथ मेरी कितनी यादें जुड़ी हैं, न पूछिए । बात दिसम्बर 2007 की है । डीमैट एकाउण्ट के लिये जीपीआरएस कनेक्शन लेने पर जब पता चला कि मेरे पास उपलब्ध मोबाइल से काम नहीं चलेगा तो झटके में नया मोबाइल लाया गया था । एक सनक थी कि आज ही इन्टरनेट चलाना है ।
विधि का विधान तो देखिए कि वह मोबाइल झटके के साथ ही गया । वर्धा जाते समय यह झटके के साथ जेब से गिरकर यह ऐसा गया कि मैं इसे बाय भी न बोल सका । इसके जाने से मुझे दुख तो होना ही था । साथ ही परेशानी भी खूब हुई होती । पर आयोजकों के हाथ बहुत लम्बे थे और मुझे परेशानी से निकाल लिया ।

मोबाइल खोया तो एक कहावत सच होती हुई लगी कि जली तो जली पर सिकी भी खूब । नया मोबाइल लेने का मन बहुत दिन से था लेकिन पुराने का क्या करें यही सवाल हल नहीं हो पा रहा था । शायद उसे इसका भान हो गया था और वह खुद ही शहीद हो गया ।

अब वर्धा से आते ही  नए मोबाइल की खोज शुरू हुई । खोजते खोजते प्रवीण पाण्डेय जी की एक पोस्ट मिली तो उन्हीं से सलाह लेने की ठानी । उन्हीं सिफारिशों को लागू करते हुए यह नोकिया C3 सेट लिया जिससे यह पोस्ट लिखी जा रही है ।

बुधवार, अक्टूबर 13, 2010

वर्धा के गलियारों से (कुछ झूठ कुछ सच )

  वर्धा ब्लॉगर सम्मलेन  के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है . हम भी कुछ आँखों देखा कानों सुना न कह लें तब यह कैसे लगेगा की हम वर्धा गए थे ?
वर्धा के गलियारों से (कुछ झूठ कुछ सच )
 प्रयास किया गया था की सभी विचारधाराओं के प्रतिनिधि  ब्लागरों को  बुलाया जाय . विचारधारा के चर्चे  यहाँ कभी कभार सुनाई भी दे रहे थे . मसलन एक ख़ास विचारधारा वाले ब्लॉगर दूसरी ख़ास विचारधारा वाले ब्लॉगर को कमरे में बंद करके टहलने चले गए .

कहा तो यह भी जा रहा है की विचारधाराओं के टकराव की वजह से ही कुछ ब्लागरों ने आना टाल दिया क्योंकि उनको भनक लग गयी थी कि विरोधी विचारधारा वाले पहले ही पहुंचकर कब्जा जमा सकते हैं .

ब्लागरों के ठहरने  के  लिए कमरों का इंतजाम भी विचाराधारा के अनुसार किया गया था . दक्षिणपंथियों  को दक्षिण में और उत्तरपंथियों को उत्तर में कमरे मिले हुए थे . जो लोग विचारधारा से जितना ऊपर उठ चुके हैं उन्हें उतना ही ऊपर कमरा दिया गया था .

सेवाग्राम आश्रम देखने  गए ब्लागरों ने शिकायत की कि गांधीजी स्वयं टब में स्नान करते थे तो बा के स्नानगृह में टब की व्यवस्था क्यों नहीं कराई गयी गयी ?

विनोबा भावे आश्रम देखने गए लोगों में से कई ब्लॉगर पवनार नदी में कूदकर नहाने के इच्छुक थे जैसे तैसे मनाने  पर  बड़ी मुश्किल से वे माने .

एक ब्लॉगर सड़क पर जोश में बेतहाशा भाग रहा था . बेचारा ठोकर लगाने से गिर गया और घुटनों में और माथे पर काफी चोट खा गया .

एक ब्लॉगर कैमरा और लैपटाप किसी पडौसी से मांग लाए थे . पर इतने से ही काम कैसे चलता ? उनको चलाना  भी तो आना चाहिए ? बड़ी मुश्किल से बात फैलने से रोकी गयी .

कार्यशाला में उपस्थित  विद्यार्थियों को शायद ब्लॉग बनाने में ज्यादा दिलचस्पी  नहीं थी इसीलिए दो समूहों  में से एक समूह  के विद्यार्थियों ने दूसरे समूह और बस के  जाने का हवाला देकर अपनी जान छुड़ाई और भाग निकले . 

ज्यादातर ब्लॉगर बिना परिचय के एक दूसरे को पहचान नहीं सके . आप ब्लॉग पर तो ऐसे दिखते हैं वैसे दिखते हैं आदि वाक्य बहुतायत में सुनने  को मिले . 

कई महिला ब्लागरों से जब बातचीत  के बहाने उनकी असल उम्र पूछने की कोशिश की गयी तो वे साफ़ इनकार कर गईं .

कुछ ब्लॉगर दूसरों को अपनी डिग्रियां गिनाने में लगे रहे . सुनने वाले ब्लागरों को बाद में छुपकर कान खुजलाते देखा गया .

सम्मलेन में आलआउट   नाम के एक ब्लॉगर को भी बुलाया गया था ताकि मच्छरों की समस्या से निजात मिल सके .

ब्लॉगर सम्मलेन का आयोजन करने वाले  महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी  विश्वविद्यालय के सम्बन्ध में एक  ब्लॉगर का मासूम सवाल था कि जब यह विश्वविद्यालय है तो फिर नाम में अंतरराष्ट्रीय लिखने की क्या जरूरत है ? विश्वविद्यालय तो पहले ही अंतरराष्ट्रीय होता है .  इसका जबाब कम से कम हमारे  पास तो नहीं था . 

खाने पीने की व्यवस्था टनाटन थी . यहाँ तक कि आते समय रास्ते के लिए भी परोसा दिया गया था . चाय पीने के लिए किसी को बाहर जाने की आवश्यकता न थी . मजे की बात तो यह कि चाय में कितनी चीनी डालनी है इसकी स्वतन्त्रता हर  ब्लॉगर को थी .

हाँ दवाओं की व्यवस्था ज़रा सोचनीय थी . एक ब्लॉगर को डिस्प्रिन माँगते  हुए देखा गया . लेकिन लोग उसे पैरासीटामौल ऑफर कर रहे थे .
कुछ  ऐसे ब्लॉगर भी मिले जिन्हें लोग अलग अलग समझते थे लेकिन वहां पता चला कि वे एक ही परिवार के सदस्य हैं .
कुछ ब्लॉगर  अपने जीवनसाथी को तो कुछ अपने भाई या बहन को लेकर पधारे थे .  

कुछ महिला ब्लागरों को  एक नौसिखिये ब्लॉगर को एकान्त में हड़काते देखा गया . बेचारे ब्लॉगर ने जैसे तैसे पीछा छुडाया .

अंतिम समय में सभी ब्लॉगर को एक दूसरे से फोटो आदान प्रदान करते देखा गया .  वैसे तो सभी ब्लॉगर पेनड्राइव, मेमोरीकार्ड, मोबाइल, कैमरा, लैपटाप आदि से लैस होकर मौक़ा-ए-वारदात पर  पधारे थे . किन्तु  एक ठो  ब्लॉगर ने बहाना बनाया कि उसका  मोबाइल ट्रेन में गुम हो गया है . इसपर दूसरे ब्लागरों ने आयोजक से मौज ली कि मोबाइल की क्षतिपूर्ती होनी चाहिए . इस पर एक स्वस्थ बहस की शुरूआत हो गयी जो नाश्ता आते ही ख़त्म भी हो गयी .

जाते जाते कुछ लोग साथियों को  हिदायत देते देखे गए  कि उनके फोटो मेल से उन्हें भेज दिए जायं .

बुधवार, अक्टूबर 06, 2010

बगुला














लगता है शर्मीला बगुला
होता किन्तु हठीला बगुला

कई रंग में मिलता बगुला
श्वेत रंग अति खिलता बगुला

श्वेत रंग यदि है भी बगुला
दूध-धुला नहिं वह भी बगुला

टेढ़ी गरदन वाला बगुला
लम्बी टाँगों वाला बगुला

पानी में न फिसलता बगुला
मछली पकड़ निगलता बगुला

नहीं चूककर रोता बगुला
फिर से चोंच डुबोता बगुला

ध्यान-मग्न हो खोता बगुला
दिखता जैसे सोता बगुला

नहीं बदलता सूरत बगुला
मानो कोई मूरत बगुला

मौका देख अकड़ता बगुला
तुरत शिकार पकड़ता बगुला

खेतों में आ जाता बगुला
दावत खूब उड़ाता बगुला

कीट पतंगे खाता बगुला
फिर भी भगत कहाता बगुला

हमको राह दिखाता बगुला
बको-ध्यान सिखलाता बगुला

सदा झुण्ड में रहता बगुला
रहो संगठित कहता बगुला

मंगलवार, अक्टूबर 05, 2010

भारत माता खुश हुई

खाता खोला स्वर्ण का, सही निशाना मार
बिन्द्रा-नारंग को कहें, बहुत बहुत आभार
बहुत बहुत आभार बनाया कीर्तिमान है
अर्जुन की इस मातृभूमि की बढ़ी शान है
विवेक सिंह यों कहें खुश हुई भारत माता
सही निशाना लगा स्वर्ण का खोला खाता

शनिवार, अक्टूबर 02, 2010

बापू फिर से आइये

























बापू फिर से आइये, भारत में इक बार ।
नीति अहिंसा की यहाँ, लागू भली प्रकार ॥
लागू भली प्रकार, न दी अफ़जल को फाँसी ।
फूलें हाथ-पैर यदि हो कसाब को खाँसी ॥
विवेक सिंह यों कहें, उतारी हिंसा सिर से ।
भारत में इक बार आइये बापू फिर से ॥

गुरुवार, सितंबर 30, 2010

राम जी ! बहुत मुबारकबाद !

राम जी ! बहुत मुबारकबाद !


अब वनवास न जाना होगा
बोल दो भक्तों को धन्यवाद
राम जी ! बहुत मुबारकबाद !


अपनी जन्मभूमि पर रहना
इतनी खुशी मिली, क्या कहना
कष्ट पड़ा भक्तों को सहना
सभी को देनी होगी दाद
राम जी ! बहुत मुबारकबाद !


न्याय आपके साथ कर दिया
मुकुट आपके शीश धर दिया
खुशियों से संसार भर दिया
आपकी सुनी खूब फरियाद
राम जी ! बहुत मुबारकबाद !


तीन पात ढाक के मिले हैं
अब क्या शिकवे और गिले हैं
फटे आपके सभी सिले हैं
आप भी खूब करोगे याद
राम जी ! बहुत मुबारकबाद !


अब वनवास न जाना होगा
बोल दो भक्तों को धन्यवाद
राम जी ! बहुत मुबारकबाद !

बुधवार, सितंबर 29, 2010

लो इक्कीसवीं सदी आयी

क्यों चारो ओर उदासी है ?
मन में कुछ आशंका सी है

शायद आ पहुँचा है वह क्षण
जब रक्त पिपासु बने कण-कण

विधि का विधान सर्वदा अटल
मन पूछ रहा क्या होगा कल

क्या बन्धु लड़ेंगे आपस में
यह प्रश्न समाया नस-नस में

क्या संभव है यह किसी भाँति
हो बन्द युद्ध हो जाय शांति

यदि लहू बहा तो क्या होगा
जिस ओर बहे मेरा होगा

मेरे ही पुत्रों का यह रण
जाने कैसा होगा भीषण

मैं किसकी जय कामना करूँ
अब भला कौन विधि धैर्य धरूँ

किससे अपना दुख-दर्द कहूँ
चुप हो कैसे यह पीर सहूँ

दोनों में से किसको चुन लूँ
मैं ही तो कर्ण व अर्जुन हूँ

अब नहीं महाभारत का रण
फिर चिन्तित हो तुम किस कारण

वह युगों पुराना प्रश्न कठिन
है खड़ा सामने उत्तर बिन

खाए जाता है कुतर कुतर
क्यों माँग रहा अब तक उत्तर

कुन्ती अब तक न समझ पायी
लो इक्कीसवीं सदी आयी

मंगलवार, सितंबर 28, 2010

चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है

     कविता लिखना अलग बात है, और मंच पर श्रोताओं के सामने कविता पाठ करना बिल्कुल दूसरी बात है । जैसे ब्लॉगर को टिप्पणी से खास लगाव हो जाता है,  वैसे ही  कवि को तालियाँ विशेष प्रिय होती हैं । किसी न किसी बहाने वे श्रोताओं को तालियों के लिए उकसाते रहते हैं । मंच पर कवियों की आपसी खींचतान  व एक दूसरे पर की जाने वाले टिप्पणियाँ भी कम मनोरंजक नहीं होतीं ।
कुछ इसी तरह के नज़ारे तब देखने को मिले जब पानीपत रिफाइनरी की टाउनशिप में कल रात अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ । यहाँ कवियों और कवयित्रियों ने अपने लटकों झटकों से उपस्थित कर्मचारियों को सपरिवार मोहित कर लिया ।
अलीगढ़ से आये विष्णु सक्सेना ने कवि सम्मेलन का शुभारम्भ सरस्वती वंदना से किया ।
कवि सम्मेलन का संचालन कर रहे थे सुनील जोगी । लखनऊ से आयीं डॉक्टर सुमन दुबे और जोगी जी के बीच काफी मजेदार वार्तालाप चला । जिसका श्रोताओं ने भरपूर आनंद लिया । दोनों ओर से इशारों इशारों में शब्दवाण छोड़े गए इससे माहौल खुशनुमा हो गया । सुमन दुबे ने कहा कि वे झाँसी की रानी बनकर काँटों को जमीन में दफ़ना देंगी तो सुनील जोगी महाराणा प्रताप बनने पर उतारू हो गए ।
सुमन दुबे के कण्ठ की मिठास ने सबका दिल छू लिया । उन्होंने शिकायत की कि  
लोग कहते हैं कि कोयल बनके गाना छोड़ दो ।
 इसके बाद श्री गुरु सक्सेना जी ने अपनी खास स्टाइल से श्रोताओं को हँसा हँसाकर लोटपोट कर दिया । सुनील जोगी यहाँ भी चुटकी लेने से नहीं चूके । उन्होंने गुर सक्सेना जी का परिचय कराते हुए कहा कि, " जो शाल को तह लगाने में मग्न हैं और बारात वाला सूट पहनकर आये हैं वे गुरु सक्सेना हैं । इनसे कहा गया कि चश्मा न लगाया करो कुरूप दिखते हो तो बोले,
"कि चश्मा न लगाएं तो तुम कुरूप दिखते हो ।""
 जोगी जी ने कहा इनके बारे में कहा कि
"इतने कमजोर हुए ये तेरी जुदाई से,
चींटी खींच ले जाती है इनको चारपाई से ।"
 इस पर गुरु सक्सेना ने कहा कि, "चींटी खींच ले जाती है तो किसी मकसद से ही ले जाती होगी ।" इनकी खास बात है कि कविता को तेज आवाज में शुरू करते हैं और धीमे होते जाते हैं ।
विष्णु सक्सेना का गीत  तालियों के बीच गाया गया । इनका कण्ठ भी मधुर है ।
"जिससे जितना प्यार करोगे, उतना रोओगे
दिल की जमीं पर जब फसल यादों की बोओगे"


अरुण जैमिनी के खड़े होते ही श्रोताओं के ठहाकों और तालियों से सभागार गूँजने लगा । हाँलांकि इन्होंने अपनी बहुत सुनी सुनाई राधेश्याम और सौ ग्राम सेब वाली कविता ही सुनाई लेकिन चुटुकुलों से श्रोताओं का खूब मनोरंजन किया । इनकी तो हर बात ही चुटकुला लगती है । बानगी देखिए:

सारे देश में ईसाई मिशनरी हैं । लेकिन हरियाणा में ईसाई मिशनरी क्यों नहीं है ? इसके पीछे कारण है । यहाँ भी ईसाई मिशनरी आए थे । लोगों को इकट्ठा किया, भाषण दिया । उसके बाद एक चौधरी ने पूछा "भाई नूँ बता यो जीसस कौण है ?" वे बोले कि "जीसस ईश्वर का पुत्र है" । इस पर चौधरी बोला कि "भाई हमारे यहाँ बाप के रहते बेटे को कोई नहीं पूछता । जब ईश्वर मर जाए तब अइयो । इब जाओ ।"



बुद्धिनाथ मिश्र यहाँ पिछली बार भी आये थे । उन्होंने अपने गीतों से समाँ बाँध दिया ।
डॉक्टर सीता सागर ने शहीदों की याद में मीठे कण्ठ से गीत सुनाकर माहौल को देशभक्ति मय बना दिया । शहीद भगत सिंह के जन्मदिवस के अवसर पर इन्होंने उन्हें श्रद्धांजलि दी ।
मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया राहत इंदौरी ने । इन्हें मैंने पहली बार ही सुना  ।  इन्होंने जिस मस्ती में डूबकर अपने शेर सुनाए उसमें श्रोताओं को भी डुबो दिया । सस्ते शेरों से शुरू करके धीरे धीरे जिस तरह ये ऊँचाई की तरफ ले गए वह स्टाइल बहुत भाया । एक शेर पेश है: 
"सितारों की नुमाइश में खलल पड़ता है,
चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है ।"
संचालक महोदय ने राजनीतिज्ञों की खूब टाँग खींची । अंत में श्री अशोक ’चक्रधर’ ने कार्यक्रम का समापन किया । इनका तो अंदाज ही निराला है । शब्दों के जादूगर हैं । शब्दों के अर्थ को कहाँ से कहाँ ले जाएंगे कोई पहले से सोच भी नहीं पाता । चक्रधर जी ने जहाँ शहीद भगत सिंह को याद किया वहीं स्वर्गीय श्री कन्हैयालाल नंदन जी को भी याद किया । उन्होंने आशा व्यक्त की कि हिन्दी राज करेगी । हिन्दी को केवल मनोरंजन की भाषा बनाने के बजाय इन्होंने इसे ज्ञान की भाषा बनाने पर बल दिया ।  जब कवि सम्मेलन का समापन हुआ तो बारह से ज्यादा बज गए थे ।

मित्रगण